SC/ST Act Provisions: कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा, यदि किसी व्यक्ति को फोन कॉल पर जाति आधारित अपशब्द कहे जाते हैं, तो वह SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जाएगा।
आरोपी नुरुल अरास की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई
जस्टिस जय सेनगुप्ता ने आरोपी नुरुल अरास की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। एक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा, ऐसा इसलिए क्योंकि कानून के मुताबिक, अपमान ‘पब्लिक व्यू’ (सार्वजनिक रूप से) में होना चाहिए। कोर्ट ने आरोपी को गिरफ्तारी से चार सप्ताह का संरक्षण भी प्रदान किया है।
यह है कानून और कोर्ट का तर्क?
आरोपी पर SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत मामला दर्ज किया गया था। ये धाराएं तब लागू होती हैं जब:
- किसी सदस्य को जानबूझकर अपमानित या डराया जाए।
- अपमान ‘सार्वजनिक दृष्टि’ (Public View) वाले स्थान पर किया गया हो।
अदालत ने कहा, “चूंकि कथित गालियां फोन पर दी गई थीं न कि सार्वजनिक रूप से, इसलिए प्रथम दृष्टया इस विशेष अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होते।” कोर्ट ने इसे एक ‘अजीब मामला’ बताया क्योंकि FIR में अन्य सभी धाराएं जमानती (Bailable) थीं।
अन्य राज्यों की अदालतों का अलग नजरिया
इसी विषय पर देश की अन्य अदालतों ने अलग-अलग परिस्थितियों में अपनी राय दी है:
- पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट: जाति आधारित नफरती भाषण केवल व्यक्ति की गरिमा को नहीं, बल्कि देश की एकता और सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाता है।
- तेलंगाना हाईकोर्ट: यदि विवाद निजी लेनदेन या पैसों से जुड़ा है, तो उसे जातिगत अपमान का रंग देकर आपराधिक कार्यवाही में नहीं बदला जा सकता।
निजी विवाद को विशेष कानून में न बदलें
तेलंगाना हाईकोर्ट ने हाल ही में एक बिजनेसमैन के खिलाफ कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि आरोपी का इरादा जाति के आधार पर अपमान करना नहीं था। कोर्ट ने कहा कि इवेंट मैनेजमेंट और पैसों से जुड़ा विवाद ‘निजी विवाद’ है, इसे विशेष कानून (Special Statute) के तहत केस नहीं बनाना चाहिए।
4 हफ्ते की मोहलत
कलकत्ता हाईकोर्ट ने नुरुल अरास को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत के सामने आत्मसमर्पण (Surrender) करे और नियमित जमानत मांगे। इस अवधि के दौरान पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकेगी।
C.R.M.(A) 4050 of 2025
In the matter of: Nurul Aras …Petitioner vs. State of West Bengal and Others

