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Section 498A IPC: फैमिली वेलफेयर कमेटी बनेगी, FIR के दो माह बाद ही गिरफ्तारी या पुलिस कार्रवाई संभव

Section 498A IPC: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न से जुड़ी IPC की धारा 498A के दुरुपयोग को रोकने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा बनाई गई गाइडलाइंस को मंजूरी दे दी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की 13 जून 2022 की गाइडलाइंस लागू रहेंगी

शीर्ष कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की 13 जून 2022 की गाइडलाइंस लागू रहेंगी और संबंधित अधिकारी इन्हें लागू करेंगे। चीफ जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने यह आदेश दिया। सोमवार को एक अहम फैसले में कोर्ट ने कहा कि इन गाइडलाइंस का मकसद यह है कि पति और उसके पूरे परिवार को झूठे आरोपों में फंसाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके। कोर्ट ने यह फैसला एक ऐसे केस में दिया, जिसमें पत्नी ने पति और उसके परिवार पर झूठे केस दर्ज कराए थे। पति को 109 दिन और उसके पिता को 103 दिन जेल में रहना पड़ा था।

यह हैं गाइडलाइंस के मुख्य बिंदु:

  1. FIR दर्ज होने के बाद दो महीने का “कूलिंग पीरियड” रहेगा। इस दौरान कोई गिरफ्तारी या पुलिस कार्रवाई नहीं होगी।
  2. इस अवधि में मामला फैमिली वेलफेयर कमेटी (FWC) को भेजा जाएगा। हर जिले में एक या अधिक FWC बनाई जाएंगी।
  3. FWC में कम से कम तीन सदस्य होंगे। इनमें युवा वकील, लॉ स्टूडेंट, सामाजिक कार्यकर्ता, रिटायर्ड जज या वरिष्ठ अधिकारियों की शिक्षित पत्नियां हो सकती हैं।
  4. FWC की निगरानी जिला जज या फैमिली कोर्ट के प्रधान जज करेंगे।
  5. शिकायत मिलने के बाद FWC दोनों पक्षों को बुलाकर बातचीत कराएगी। दोनों पक्षों को चार-चार बुजुर्ग लोगों के साथ आना होगा।
  6. दो महीने के भीतर FWC रिपोर्ट तैयार कर मजिस्ट्रेट या पुलिस को सौंपेगी। इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।
  7. पुलिस इस दौरान केवल सीमित जांच कर सकती है, जैसे मेडिकल रिपोर्ट, गवाहों के बयान आदि।
  8. FWC के सदस्य कभी गवाह नहीं बनेंगे। उन्हें समय-समय पर ट्रेनिंग दी जाएगी।
  9. यह काम सामाजिक सेवा के रूप में किया जाएगा। सदस्यों को मामूली मानदेय मिलेगा।
  10. ऐसे मामलों की जांच प्रशिक्षित और ईमानदार पुलिस अधिकारी ही करेंगे।
  11. अगर दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है, तो जिला जज केस को खत्म कर सकते हैं।

यह है मामला

इस केस में पत्नी ने पति और उसके परिवार पर छह अलग-अलग आपराधिक केस दर्ज कराए थे। इनमें घरेलू हिंसा (498A), हत्या की कोशिश (307), बलात्कार (376), विश्वासघात (406) और अन्य धाराएं शामिल थीं। इसके अलावा पत्नी ने तलाक, भरण-पोषण और घरेलू हिंसा के केस भी फैमिली कोर्ट में दायर किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने सभी आपराधिक केस रद्द कर दिए और संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शादी को खत्म कर दिया।

2017 में आया था फैसला, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने वापस लिया

यह फैसला 2017 के राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश केस में दिए गए निर्देशों की तरह है, जिन्हें 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने वापस ले लिया था। अब इन्हें फिर से लागू किया गया है। कोर्ट ने कहा कि जो कुछ पति और उसके पिता ने झेला, उसकी भरपाई नहीं की जा सकती, लेकिन यह फैसला समाज में संतुलन बनाने की दिशा में एक जरूरी कदम है।

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