Monday, September 21, 2026
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Individual vs Denomination: शादी धर्म छीनने का आधार नहीं हो सकती…अनुच्छेद 25 बनाम अनुच्छेद 26 पर बहस का यहां हिस्सा बनें, जान लें

Individual vs Denomination: सुप्रीम अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25(1) के तहत अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म को मानने का अधिकार ‘जन्म सिद्ध अधिकार’ है, जिसे शादी के आधार पर छीना नहीं जा सकता।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
पीठ का नेतृत्वचीफ जस्टिस सूर्यकांत (9-जजों की बेंच)।
मुख्य मुद्दाक्या धार्मिक प्रमुख के पास किसी सदस्य को निष्कासित करने की शक्ति व्यक्ति के धर्म के अधिकार के साथ सह-अस्तित्व में रह सकती है?
प्रारंभिक टिप्पणीअंतरधार्मिक विवाह के आधार पर निष्कासन भेदभावपूर्ण है।
कानूनी स्थिति1962 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है, जिसने निष्कासन की शक्ति को ‘संरक्षित धार्मिक प्रथा’ माना था।

पारसी महिलाओं के अधिकारों को लेकर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की 9-जजों की संविधान पीठ ने पारसी महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक टिप्पणी की है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा है कि दूसरे धर्म में शादी करने के आधार पर पारसी महिलाओं को समुदाय से बाहर करना (Excommunication) प्रथम दृष्टया भेदभावपूर्ण है। यह सुनवाई सबरीमाला मंदिर मामले से जुड़े उन व्यापक संवैधानिक सवालों का हिस्सा है, जिसमें विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे की जांच की जा रही है।

अंतरात्मा का अधिकार: जन्म से मिलता है, शादी से नहीं

  • जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
  • समानता का अधिकार: यदि एक पारसी पुरुष दूसरे धर्म की महिला से शादी करता है, तो उसके अधिकार सुरक्षित रहते हैं और उसके बच्चों को भी पारसी माना जाता है। लेकिन महिलाओं के साथ ऐसा नहीं होता। कोर्ट ने इसे ‘भेदभावपूर्ण वर्गीकरण’ माना।
  • धर्म और जन्म: “धर्म व्यक्ति को जन्म से मिलता है। शादी केवल एक सामाजिक अनुबंध या मिलन है, यह किसी व्यक्ति के अपने ईश्वर और आस्था के प्रति उसके जन्मजात अधिकार को खत्म नहीं कर सकती।”

अनुच्छेद 25 बनाम अनुच्छेद 26 (Individual vs Denomination)

  • वरिष्ठ अधिवक्ता दारियस खंबाटा ने कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण कानूनी तर्क रखा।
  • अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार): किसी व्यक्ति का अपने धर्म को मानने और उसका अभ्यास करने का अधिकार।
  • अनुच्छेद 26 (सामुदायिक अधिकार): किसी धार्मिक संप्रदाय (Denomination) का अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार।
  • तर्क: खंबाटा ने कहा कि “नदी अपने स्रोत से ऊँची नहीं उठ सकती।” यानी, अनुच्छेद 26 के तहत समुदाय के अधिकार किसी व्यक्ति के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकारों से बड़े नहीं हो सकते। समुदाय को किसी व्यक्ति को उसके धर्म से निकालने का ऐसा अधिकार नहीं मिल सकता जो उसके संवैधानिक मौलिक अधिकार का हनन करे।

मानव निर्मित प्रथाओं पर प्रहार

  • सुनवाई के दौरान यह बात उभर कर आई कि पारसी समुदाय में महिलाओं का निष्कासन धर्म का मूल हिस्सा नहीं, बल्कि एक “मानव निर्मित थोपी गई प्रथा” (Man-made imposition) है।
  • पीड़ित महिला की ओर से कहा गया: मैं एक आस्तिक हूँ, मैंने अपना धर्म नहीं छोड़ा है। सिर्फ इसलिए कि मैंने शादी कर ली, मुझे बाहर करना अपराध जैसा है।
  • कोर्ट ने माना कि यदि यह प्रथा जारी रहती है, तो इसके पारसी समुदाय ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों पर भी ‘भयानक परिणाम’ (Terrible consequences) हो सकते हैं।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जीत की ओर

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उन महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो अपनी पसंद से शादी करने के कारण अपने धार्मिक और सामाजिक अधिकारों को खो देती हैं। अदालत का रुख साफ है: लिंग (Gender) के आधार पर भेदभाव को ‘धार्मिक प्रथा’ की ढाल बनाकर जायज नहीं ठहराया जा सकता।

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