Succession Act: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा, वसीयत निरस्तीकरण के कारण सीमित नहीं, न्यायालय तय करेगा ‘जस्ट कॉज’।
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम पर हुई चर्चा
हाईकोर्ट ने कहा, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 263 में वसीयत (Probate) रद्द या निरस्त करने के लिए दी गई स्पष्टीकरण (a) से (e) की सूची केवल उदाहरणात्मक (illustrative) है, पूर्ण (exhaustive) नहीं। यानी इन स्पष्टीकरणों में वर्णित कारणों के अलावा भी अन्य परिस्थितियां “जस्ट कॉज” (न्यायोचित कारण) मानी जा सकती हैं, जिनके आधार पर वसीयत रद्द की जा सकती है।
इक्वाडोर में आत्महत्या वाले व्यक्ति की संपत्ति का मामला
मामला एक ऐसे व्यक्ति की संपत्ति से जुड़ा था जिसने इक्वाडोर में आत्महत्या की थी। याचिकाकर्ता ने वसीयत की वैधता को चुनौती देते हुए कहा कि वसीयत के गवाहों ने भारत में हस्ताक्षर किए, जबकि वसीयतकर्ता (testator) ने उसे विदेश में निष्पादित किया, जिससे धारा 63 का पालन नहीं हुआ। न्यायमूर्ति एम. एस. कर्णिक और न्यायमूर्ति एन. आर. बोरकर की खंडपीठ ने यह फैसला न्यायमूर्ति मनीष पिटले द्वारा किए गए संदर्भ पर सुनाया। यह संदर्भ इस प्रश्न पर था कि क्या धारा 263 में दिए गए कारण केवल वही हैं जिन पर वसीयत निरस्त की जा सकती है, या अदालत अन्य परिस्थितियों में भी ऐसा कर सकती है।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां
कोर्ट ने कहा कि धारा 263 का उद्देश्य वसीयत से जुड़ी कार्यवाही की पवित्रता बनाए रखना और धोखाधड़ी, छिपाव या प्रक्रिया संबंधी त्रुटियों के माध्यम से प्राप्त प्रॉबेट को रोकना है। पीठ ने कहा, “यदि ‘जस्ट कॉज’ को केवल स्पष्टीकरण (a) से (e) तक सीमित कर दिया जाए तो यह अन्यायपूर्ण होगा और विधायी मंशा के विपरीत जाएगा।” फैसले में कहा गया, “यदि व्याख्या को सीमित कर दिया जाए, तो यह अन्याय को जन्म देगी… ऐसा करना कानून के उस उद्देश्य को ही विफल कर देगा, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अदालत आवश्यकतानुसार ‘जस्ट कॉज’ के आधार पर वसीयत को रद्द कर सके।”
Deemed to be just cause” का अर्थ पर चर्चा
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि स्पष्टीकरण में प्रयुक्त शब्द “deemed to be just cause” का अर्थ है कि सूचीबद्ध परिस्थितियां अपने आप ‘जस्ट कॉज’ मानी जाएंगी, लेकिन अन्य परिस्थितियां भी न्याय और निष्पक्षता के आधार पर इस श्रेणी में आ सकती हैं। पीठ ने कहा, “स्पष्टीकरण (a) से (e) में न आने वाले मामलों में अदालत को प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर यह तय करना होगा कि ‘जस्ट कॉज’ मौजूद है या नहीं।”
न्यायिक विवेक सीमित नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी मामले में ‘जस्ट कॉज’ है या नहीं, यह तय करने का अधिकार अदालत का मौलिक अधिकार क्षेत्र है, जिसे सीमित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि स्पष्टीकरण केवल मुख्य धारा के अर्थ को स्पष्ट करता है, न कि उसे सीमित या विस्तृत करने के लिए है। पीठ ने न्यायमूर्ति पिटले के दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए कहा कि धारा 263 की भाषा यह दर्शाती है कि विधायिका ने अदालत को व्यापक विवेकाधिकार (wider judicial discretion) देने का इरादा रखा है।
वसीयत या प्रशासकीय पत्र निरस्त संभव
कोर्ट ने निर्णय दिया कि “स्पष्टीकरण में वर्णित कारणों के अतिरिक्त अन्य परिस्थितियाँ भी ‘जस्ट कॉज’ बन सकती हैं, जिनके आधार पर वसीयत या प्रशासकीय पत्र (Letters of Administration) को रद्द या निरस्त किया जा सकता है।”
IN THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT BOMBAY
TESTAMENTARY AND INTESTATE JURISDICTION
MISC. PETITION (L) NO. 6300 OF 2024
IN TESTAMENTARY PETITION NO. 109 OF 2021
Sarwan Kumar Jhabarmal Choudhary Versus Sachin Shyamsundar Begrajka

