Wednesday, September 30, 2026
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Justice Bhuyan’s Stand: असहमति को अपराध मानना विकसित भारत’ का मॉडल नहीं हो सकता

Justice Bhuyan’s Stand: जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट किया कि 2047 तक ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य केवल नारों से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सुधारों से ही प्राप्त किया जा सकता है।

जस्टिस भुइयां के अनुसार, विकसित भारत का मतलब केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि संपत्ति का समान वितरण, व्यक्तिगत सम्मान की रक्षा और लैंगिक समानता है।

UAPA का बढ़ता इस्तेमाल और कम सजा (Low Conviction Rate)

  • जस्टिस भुइयां ने UAPA (आतंकवाद विरोधी कानून) के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठाए।
  • डेटा की हकीकत: 2019 से 2023 के बीच हजारों गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन सजा की दर (Conviction Rate) केवल 5% के करीब है।
  • अदालतों पर बोझ: कहा, “इतनी कम सजा दर यह दिखाती है कि कानून का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल (Overuse) या दुरुपयोग (Misuse) हो रहा है। अधिकांश गिरफ्तारियां समय से पहले और बिना पर्याप्त सबूतों के की गईं, जिससे अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ा है।”

न्यायपालिका में महिलाओं की ‘बेहद कम’ भागीदारी

  • जस्टिस भुइयां ने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर चिंता जताई।
  • सब्जेक्टिव असेसमेंट: उन्होंने कहा कि जब चयन प्रक्रिया ‘ऑब्जेक्टिव’ (जैसे जिला न्यायपालिका की परीक्षाएं) होती है, तो 50% से ज्यादा महिलाएं चुनकर आती हैं। लेकिन कोलेजियम सिस्टम के ‘सब्जेक्टिव’ (व्यक्तिगत मूल्यांकन) असेसमेंट में महिलाएं पिछड़ जाती हैं।
  • आंकड़े: 1950 से अब तक सुप्रीम कोर्ट के 287 जजों में से केवल 11 महिलाएं रही हैं (सिर्फ 2%)। वर्तमान में 25 हाई कोर्ट्स में से केवल 2 महिला चीफ जस्टिस हैं।
  • रेनबो इंस्टीट्यूशन: उन्होंने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट को एक ‘इंद्रधनुषी संस्थान’ होना चाहिए, जो देश की विविधता को सही मायने में प्रतिबिंबित करे।

‘विकसित भारत’ बनाम सामाजिक बुराइयां

  • जस्टिस भुइयां ने समाज में मौजूद गहरी दरारों (Social Fault Lines) पर प्रहार किया।
  • जातिवाद पर प्रहार: “हम तब तक विकसित नहीं हो सकते जब तक माता-पिता यह कहें कि उनके बच्चे दलित महिला द्वारा बनाया गया खाना नहीं खाएंगे। या जब दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार (जैसे उन पर पेशाब करना) जैसी घटनाएं सामने आएं।”
  • असहमति का सम्मान: उन्होंने कहा कि एक विकसित राष्ट्र में बहस और असहमति (Dissent) के लिए जगह होनी चाहिए। विचारों की भिन्नता को अपराधीकरण (Criminalisation) की नजर से नहीं देखना चाहिए।

न्यायपालिका की भूमिका: न ‘आलोचक’ न ‘चीयरलीडर’

  • जस्टिस भुइयां ने जजों और सिस्टम के लिए एक लक्ष्मण रेखा भी खींची। कहा, “न्यायपालिका को न्यायपालिका ही बने रहना चाहिए; इसे न तो सरकार का शाश्वत आलोचक (Eternal Critic) होना चाहिए और न ही चीयरलीडर (Cheerleader)।”
  • पूर्व CJI बी.आर. गवई की टिप्पणी: इसी कार्यक्रम में पूर्व CJI गवई ने भी अफसोस जताया कि कोलेजियम द्वारा नाम दोहराए जाने (Reiteration) के बावजूद सरकार कई बार नियुक्तियां नहीं करती, जो कि न्यायिक आदेशों का उल्लंघन है।
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