Temple Wealth Ruling: मद्रास हाई कोर्ट (मदुरै बेंच) ने मंदिरों की आय और पुजारियों के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण दिया है।
हुंडी के कलेक्शन में ‘शेर का हिस्सा’ (Lion’s Share) मांग रहे थे
मद्रास हाई कोर्ट (मदुरै बेंच) के जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की डिवीजन बेंच ने मदुरै के प्रसिद्ध अरुलमिगु पांडी मुनीश्वरर मंदिर से जुड़े विवाद पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने पुजारियों की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें वे हुंडी के कलेक्शन में ‘शेर का हिस्सा’ (Lion’s Share) मांग रहे थे। अदालत ने साफ कहा है कि सार्वजनिक मंदिरों की ‘हुंडी’ (दान-पात्र) में आने वाला पैसा पुजारियों की निजी संपत्ति या उनकी “जागीर” (Fiefdom) नहीं है। यह पैसा भक्तों द्वारा भगवान को अर्पित किया गया है, जो सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्ति है और इसका उपयोग केवल मंदिर के रखरखाव और धार्मिक कार्यों के लिए होना चाहिए।
वंशानुगत अधिकार खत्म (Abolition of Hereditary Rights)
- अदालत ने HR&CE एक्ट, 1959 के 1970 के संशोधन का हवाला दिया।
- पुजारी अब ‘सेवक’ हैं: कानून में संशोधन के बाद अब पुजारियों का पद वंशानुगत (Hereditary) नहीं रहा। अब वे मंदिर के ‘सेवक’ (Temple Servants) माने जाएंगे और उन पर सरकारी नियम (जैसे 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु) लागू होंगे।
- कोई निजी जागीर नहीं: किसी पुराने जमाने के आदेश या परंपरा के आधार पर हुंडी के पैसे को ‘पारिवारिक संपत्ति’ की तरह वसीयत में नहीं दिया जा सकता और न ही परिवारों के बीच बांटा जा सकता है।
“भगवान के पैसे पर ऐशो-आराम” पर कोर्ट की फटकार
- कोर्ट ने पुजारियों के बीच चल रही कानूनी लड़ाई पर सख्त टिप्पणी की।
- बंदरों की लड़ाई: कोर्ट ने इसकी तुलना “रोटी के लिए लड़ते बंदरों” की कहानी से की। कोर्ट ने कहा कि पुजारी भगवान की सेवा के लिए नहीं, बल्कि अपनी विलासिता और ‘लविश लाइफस्टाइल’ के लिए भक्तों के चढ़ावे पर लड़ रहे हैं।
- 130 मुकदमे: मंदिर की आय पर कब्जे के लिए तीन परिवारों के बीच पिछले कई दशकों से 130 से अधिक कानूनी कार्यवाहियां चल रही हैं, जिससे धार्मिक माहौल प्रदूषित हुआ है।
मंदिरों की जर्जर स्थिति बनाम पुजारियों की अमीरी
- अदालत ने राज्य के अन्य मंदिरों की तुलना करते हुए “न्यायिक अंतरात्मा” (Judicial Conscience) की बात की।
- कंट्रास्ट (विरोध): एक तरफ तमिलनाडु के कई मंदिर फंड की कमी के कारण जर्जर स्थिति में हैं, जहाँ दिन की एक वक्त की पूजा भी मुश्किल से होती है। दूसरी तरफ, इस मंदिर के पुजारी हुंडी के कलेक्शन को अपनी निजी आय मानकर ऐश कर रहे हैं।
- सार्वजनिक हित: हुंडी का एक-एक पैसा जनता का है। इसे निजी अमीरी के लिए मोड़ना उस आस्था के साथ विश्वासघात है जो इस संस्थान को चलाती है।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| विषय | अदालत का निष्कर्ष |
| हुंडी कलेक्शन | यह ‘पब्लिक ट्रस्ट’ है, पुजारियों की निजी संपत्ति नहीं। |
| पुजारी का पद | अब यह वंशानुगत नहीं, बल्कि नियमों के अधीन एक ‘सेवा’ है। |
| अनुशासन | धन के दुरुपयोग के आरोपी पुजारियों के खिलाफ विभागीय जांच तेज करने का आदेश। |
| प्रबंधन | मंदिर का प्रशासन कोर्ट द्वारा गठित कमेटी के पास रहेगा ताकि पारदर्शिता बनी रहे। |
निष्कर्ष: धर्म लाभ के लिए नहीं है
मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि “धर्म धन कमाने का चोला नहीं है”। पुजारियों को मंदिर की आय में हिस्सा देने की पुरानी प्रथाएं अब आधुनिक कानून के सामने शून्य हैं। अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि भक्तों द्वारा चढ़ाया गया पैसा निजी विलासिता के बजाय मंदिर के जीर्णोद्धार और धार्मिक कल्याण के कार्यों में ही खर्च हो।

