Law officer recruitment: चंडीगढ़ नगर निगम में लॉ ऑफिसर (Law Officer) की भर्ती परीक्षा के एक पेचीदा सवाल ने सुप्रीम कोर्ट तक हलचल मचा दी।
हुआ यूं कि भर्ती परीक्षा के एक सवाल को लेकर मामला इतना उलझ गया था कि हाई कोर्ट के दो जज भी एक सही जवाब पर सहमत नहीं हो पाए। अंततः जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने इस पर फैसला सुनाया।
विवादित सवाल क्या था?
संविधान से जुड़ा सवाल था: “संविधान की कौन सी अनुसूची (Schedule) मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से मुक्त है?”
(a) सातवीं अनुसूची
(b) नौवीं अनुसूची (Ninth Schedule)
(c) दसवीं अनुसूची
(d) इनमें से कोई नहीं (None of the above)
कन्फ्यूजन की असली वजह
- भर्ती बोर्ड का पक्ष: उन्होंने Option (b) यानी ‘नौवीं अनुसूची’ को सही माना।
- उम्मीदवार का तर्क: एक कैंडिडेट ने Option (d) चुना। उसका तर्क था कि IR Coelho जैसे ऐतिहासिक फैसलों के बाद अब कोई भी अनुसूची न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह ‘अछूती’ नहीं है।
- HC का विरोधाभास: हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने बोर्ड के जवाब को सही माना, लेकिन डिवीजन बेंच ने कहा कि ‘Option D’ ही सही जवाब है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
- सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह सवाल ही ‘Ambiguous’ (अस्पष्ट) था। कोर्ट ने कहा, जब हाई कोर्ट के जज ही सही जवाब को लेकर एकमत नहीं हैं, तो लॉ ग्रेजुएट्स से यह उम्मीद करना गलत है कि वे दशकों पुराने अदालती फैसलों की व्याख्या करके एक सही विकल्प चुन लें।
- कोर्ट का विश्लेषण: एक स्टूडेंट के नजरिए से Option B सही लग सकता है, लेकिन गहरी कानूनी समझ के हिसाब से Option D भी बिल्कुल सही है।
समाधान: विन-विन सिचुएशन
किसी भी उम्मीदवार का नुकसान न हो, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक Equitable Solution (न्यायसंगत समाधान) निकाला। कोर्ट ने दोनों विकल्पों (B और D) को सही माना। चंडीगढ़ नगर निगम को आदेश दिया गया कि वे एक Supernumerary Post (अतिरिक्त पद) बनाकर दूसरे उम्मीदवार को भी नौकरी दें। जो उम्मीदवार पहले से नियुक्त है, उसकी सीनियरिटी पर कोई आंच नहीं आएगी।

