Friday, October 16, 2026
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Vacation Bench: अब 12 जून तक सिर्फ युवा वकील करेंगे बहस…सीनियर एडवोकेट्स को आराम, सुप्रीम कोर्ट रूम के अंदर की रोचक चर्चा सिर्फ यहां पढ़िए

Vacation Bench: सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीष्मकालीन अवकाश के पहले दिन एक अनोखी और सकारात्मक शुरुआत देखने को मिली।

गर्मियों की छुट्टियों को आधिकारिक तौर पर आंशिक कार्य दिवस नामित

शीर्ष अदालत की अवकाश पीठों (Vacation Benches) ने युवा वकीलों और एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड (AoRs) को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा नीतिगत फैसला लेते हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं (Senior Advocates) द्वारा मामलों की ‘मेंशनिंग’ (त्वरित सुनवाई का अनुरोध) करने और बहस करने पर पूरी तरह रोक लगा दी है। यह फैसला 1 जून से 12 जुलाई तक चलने वाले अवकाश के दौरान युवा वकीलों को अपनी प्रतिभा दिखाने और अदालत के सामने बहस करने का पर्याप्त अवसर देने के उद्देश्य से लिया गया है। गौरतलब है कि साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट के नियमों में किए गए संशोधनों के बाद अब गर्मियों की इन छुट्टियों को आधिकारिक तौर पर आंशिक कार्य दिवस (Partial Working Days) के रूप में पुनर्नामित किया गया है।

“मैं अपनी अदालत का मालिक हूं” – विभिन्न पीठों का सख्त और स्पष्ट रुख

अवकाश के पहले दिन सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों में वरिष्ठ वकीलों और न्यायाधीशों के बीच बेहद दिलचस्प और हल्के-फुल्के अंदाज में संवाद देखने को मिला।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पी. बी. वराले की पीठ

    स्पष्टता: सुबह सुनवाई शुरू होते ही जस्टिस विक्रम नाथ ने स्पष्ट कर दिया कि इस कोर्ट रूम में कोई भी सीनियर वकील मेंशनिंग नहीं करेगा।

    वरिष्ठ वकीलों की आपत्ति: वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि अदालत पूरी तरह बंद नहीं है, यह केवल आंशिक कार्य दिवस है और जिन मामलों में पिछले हफ्ते नोटिस जारी हुए थे, उनमें उन्हें पेश होना है।

    जज का कड़ा जवाब: जस्टिस नाथ अपने फैसले पर अडिग रहे और मुस्कुराते हुए कहा, यदि कोई आपत्ति है तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से अनुरोध करें। आज हमारे पास सूची में 55 मामले हैं, जो पिछले 3 वर्षों में नहीं हुआ। ये सब सीनियर्स को बाहर निकालो। जब एक अन्य वकील ने दखल देना चाहा, तो जस्टिस नाथ ने हल्के अंदाज में कहा, मैं अपनी अदालत का मालिक हूं। आप लोग कैंटीन जाइए और कुछ खाइए।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ

    रूख स्पष्ट: एक जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान इस पीठ ने भी इसी रुख को दोहराया।

    युवाओं को प्रोत्साहन: जस्टिस संजय करोल ने कहा, मैं और मेरे साथी जज पिछले तीन वर्षों से यही मानते हैं कि अवकाश का समय केवल उन वकीलों के लिए है जो ‘नामित सीनियर’ (Designated Seniors) नहीं हैं। हम बार के युवा सदस्यों को बहस करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

    मामले खारिज न करने का आश्वासन: जब सीनियर वकीलों ने चिंता जताई कि उनकी अनुपस्थिति में मामलों को खारिज न किया जाए, तो जजों ने वकीलों को आश्वस्त करते हुए कहा कि अवकाश के दौरान किसी भी मामले को खारिज नहीं किया जाता, बल्कि अगली तारीख दी जाती है या जूनियर वकीलों को सुना जाता है।

    अदालती कार्यवाही के कुछ दिलचस्प प्रसंग (Courtroom Exchanges)

    फली नरीमन का ऐतिहासिक उदाहरण: बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने एक पुराना किस्सा याद किया जब महान वकील फली एस. नरीमन को तत्कालीन जस्टिस लाहोटी ने बहस करने की अनुमति नहीं दी थी, तब नरीमन ने बुरा मानने के बजाय अपने जूनियर को पूरी बहस करने की कमान सौंप दी थी।

    सीनियर वकील द्वारा केस वापस लेना: एक महिला सीनियर एडवोकेट ने जब कोर्ट को बताया कि वे इस नियम के कारण कल से कोई केस नहीं लेंगी, तो जस्टिस करोल ने मज़ाकिया लहजे में कहा, “नहीं, आपको इसे तुरंत (आज ही) वापस लेना चाहिए।

    अधजली तैयारियों पर कोर्ट की नाराजगी: एक मामले में वकीलों ने पहले स्थगन (Adjournment) का पत्र भेजा था, जिसके कारण जजों ने फाइल नहीं पढ़ी थी। लेकिन कोर्ट रूम में वकील अचानक मेरिट पर बहस की मांग करने लगे। इस पर जस्टिस करोल ने नाराजगी जताते हुए कहा कि यह अदालत के साथ अन्याय है। आंशिक कार्य दिवसों में लोग स्थगन मांगते हैं तो जज तैयारी नहीं करते और नियमित दिनों में जब जज पूरी तैयारी करके आते हैं, तो वकील आखिरी समय पर स्थगन मांग लेते हैं।

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान व्यवस्था

    प्रशासनिक पैरामीटरविवरण (Details)
    अवकाश की अवधि1 जून से 12 जुलाई (2026)
    नया नामकरणसुप्रीम कोर्ट रूल्स (2024) में संशोधन के बाद अब इन्हें “आंशिक कार्य दिवस” (Partial Working Days) कहा जाता है।
    गठित पीठों की संख्यामुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत द्वारा मामलों के निपटारे के लिए 23 पीठों का गठन किया गया है।
    मुख्य उद्देश्यसुप्रीम कोर्ट की कानूनी प्रैक्टिस में शीर्ष वकीलों के दबदबे को थोड़ा विराम देकर जूनियर वकीलों और एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड (AoRs) को सीधे मंच प्रदान करना।

    निष्कर्ष (Takeaway)

    सुप्रीम कोर्ट का यह कदम भारतीय कानूनी प्रणाली में एक सराहनीय और दूरगामी बदलाव है। आमतौर पर शीर्ष अदालत में युवा और नए वकीलों को बड़े और नामी वरिष्ठ वकीलों की मौजूदगी के कारण अपनी बहस रखने का मौका बमुश्किल मिल पाता है। अवकाश के इन दिनों को जूनियर वकीलों के नाम करने से न केवल बार का आंतरिक विकास होगा, बल्कि युवा वकीलों का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।

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