हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और तल्ख टिप्पणियां
- “संपूर्ण न्यायपालिका का उपहास उड़ाने वाला आचरण”:आवास न मिलने पर डीसा और पालनपुर में फुटपाथ और कार में सोने की धमकी देने के आचरण पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:“यदि कोई न्यायिक अधिकारी उपयुक्त आवास न मिलने पर प्रधान जिला न्यायाधीश को धमकी दे और फुटपाथ पर सोने की चेतावनी दे, तो यह आचरण मूल रूप से पूरी न्यायपालिका का उपहास उड़ाने वाला और संस्था को खराब रोशनी में दिखाने वाला है। ऐसा आचरण अधिकारी को न्यायिक पद धारण करने के अयोग्य बनाता है।”
- मकान किराया भत्ता (HRA) बनाम अनिवार्य क्वार्टर:अदालत ने स्पष्ट किया कि जब सरकारी क्वार्टर उपलब्ध न हो, तो अधिकारी मकान किराया भत्ता (HRA) पाने के हकदार होते हैं। ऐसा कोई नियम नहीं है जो यह अनिवार्य करे कि अधिकारी को तुरंत क्वार्टर मिलना ही चाहिए।
- मौजूदा हाईकोर्ट जज के तबादले की मांग सर्वोच्च अनुशासनहीनता:विभागीय जांच (Departmental Inquiry) में पाया गया कि जज ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर एक मौजूदा हाईकोर्ट जज का तबादला करने की सिफारिश करने को कहा था। इस पर कोर्ट ने कहा:“एक न्यायिक अधिकारी द्वारा मुख्य न्यायाधीश से उच्च न्यायालय के एक मौजूदा न्यायाधीश की सिफारिश/तबादला करने का आग्रह करना सर्वोच्च स्तर की अनुशासनहीनता (Highest form of indiscipline and insubordination) है।”
- प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की दलील खारिज:अधिकारी ने आरोप लगाया था कि विभागीय जांच में उन्हें अपना पक्ष रखने का निष्पक्ष मौका नहीं मिला। हालाँकि, रिकॉर्ड से साबित हुआ कि उन्होंने बार-बार सुनवाई स्थगित करने की मांग की, जांच में भाग लेने से इनकार किया और कानूनी वकील तथा दस्तावेजों के निरीक्षण के मौकों का लाभ नहीं उठाया।
अहमदाबाद: न्यायिक सेवा (Judicial Service) के अनिवार्य अनुशासन, एक न्यायिक अधिकारी से अपेक्षित गरिमामयी आचरण, सरकारी आवास की अनुपलब्धता पर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को धमकाने, तथा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मौजूदा हाईकोर्ट जज के तबादले की मांग करने को “घोर अवज्ञा एवं अनुशासनहीनता” (Gross Indiscipline and Insubordination) करार देते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने सख्त फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति एन.एस. संजय गौड़ा और न्यायमूर्ति जे.एल. ओडेदरा की खंडपीठ ने 9 अक्टूबर 2026 को पारित अपने निर्णय में एक वरिष्ठ सिविल जज (Senior Civil Judge) की सेवा बर्खास्तगी (Dismissal from Service) के आदेश को पूरी तरह वैध ठहराते हुए उनकी रिट याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ (Full Court) की सिफारिश पर गुजरात सरकार ने उक्त अधिकारी को गंभीर कदाचार के आधार पर सेवा से बर्खास्त कर दिया था। अदालत ने माना कि ऐसा आचरण न्यायिक संस्था को सार्वजनिक रूप से कलंकित करता है और ऐसे व्यक्ति को न्यायिक पद पर बने रहने का कोई नैतिक या विधिक अधिकार नहीं है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां
1. ‘फुटपाथ पर सोने की धमकी न्यायपालिका का खुला उपहास है’
खंडपीठ ने सरकारी आवास न मिलने पर प्रधान जिला न्यायाधीश (Principal District Judge) को धमकाने के अधिकारी के आचरण की कठोर भर्त्सना करते हुए कहा: “यदि कोई न्यायिक अधिकारी प्रधान जिला न्यायाधीश को धमकाने का निर्णय लेता है और उपयुक्त आवास न मिलने पर फुटपाथ पर सोने की धमकी देता है, तो यह आचरण मूल रूप से पूरी न्यायपालिका का उपहास उड़ाने (Mocking the entire judiciary) और स्वयं संस्था को गलत रोशनी में प्रस्तुत करने जैसा है। हमारी सुविचारित राय में, ऐसा आचरण—जिस पर कोई विवाद भी नहीं है—एक न्यायिक अधिकारी को न्यायिक पद धारण करने के सर्वथा अयोग्य बनाता है और उसे सेवा में बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
2. आवास कोई वैधानिक अनिवार्य अधिकार नहीं; एचआरए (HRA) का नियम लागू:
- अदालत ने विधिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है जो यह अनिवार्य बनाता हो कि पदस्थापना के स्थान पर न्यायिक अधिकारी को सरकारी क्वार्टर उपलब्ध कराना ही होगा।
- जब सरकारी आवास उपलब्ध नहीं होता, तो न्यायिक अधिकारी नियमानुसार मकान किराया भत्ता (HRA) प्राप्त करने के हकदार होते हैं और उन्हें स्वयं निजी आवास की व्यवस्था करनी होती है।
- अदालत ने टिप्पणी की कि अधिकारी का आग्रह अत्यंत विनम्र होना चाहिए था, न कि टकरावपूर्ण और धौंस जमाने वाला।
3. ‘हाईकोर्ट जज के तबादले की मांग करना अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा’:
चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर मौजूदा हाईकोर्ट जज का तबादला करने की मांग पर खंडपीठ ने बेहद कड़ा ऐतराज जताया: “यह आचरण याचिकाकर्ता के खराब चरित्र का प्रत्यक्ष प्रमाण है और यह स्थापित करता है कि वह न्यायिक पद संभालने में पूरी तरह असमर्थ है। एक अधीनस्थ न्यायिक अधिकारी का मुख्य न्यायाधीश से यह कहना कि वे उच्च न्यायालय के एक मौजूदा न्यायाधीश के तबादले की सिफारिश करें, स्पष्ट रूप से अनुशासनहीनता और अवज्ञा की उच्चतम श्रेणी (Highest form of indiscipline and insubordination) है। यह कृत्य ही उसे न्यायिक अधिकारी बने रहने से वंचित करता है।”
4. प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की दलील खारिज:
- याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि विभागीय जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन हुआ और उन्हें अपना बचाव करने का अवसर नहीं मिला।
- हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण कर पाया कि याचिकाकर्ता बार-बार स्थगन मांगती रहीं, उन्होंने जांच कार्यवाही में भाग लेने से इनकार किया और वकील नियुक्त करने तथा जांच रिकॉर्ड का निरीक्षण करने के अवसरों का लाभ नहीं उठाया। अतः प्रक्रियागत अनियमितता का दावा पूरी तरह निराधार है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं जांच का कालक्रम
| वर्ष / चरण | घटनाक्रम एवं कदाचार का ब्योरा |
| अक्टूबर 2012 | तबादला और विवाद: याचिकाकर्ता का वडोदरा से डीसा (बनासकांठा) तबादला हुआ। क्वार्टर खाली न होने पर उन्हें निजी आवास तलाशने को कहा गया। |
| नवंबर 2012 | फुटपाथ पर सोने की धमकी: उन्होंने पालनपुर के प्रधान जिला न्यायाधीश को पत्र लिखकर फुटपाथ पर सोने, दैनिक यात्रा भत्ता लेकर रोज पालनपुर से डीसा आने-जाने, और कलेक्टर के जरिए जबरन निजी मकान अधिग्रहित कराने की मांग की। |
| देर रात परिसर में ड्रामा: | नवंबर 2012 में वे जिला अदालत परिसर में देर रात तक बैठी रहीं और अन्य न्यायिक अधिकारियों की समझाइश पर वापस लौटीं। उन्होंने डीसा कोर्ट के बाहर अपनी कार में रात बिताने की भी धमकी दी। |
| 2013 एवं 2014 | चीफ जस्टिस को आपत्तिजनक पत्र: उनके खिलाफ दो अन्य विभागीय जांचें शुरू हुईं। उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर हाईकोर्ट के एक मौजूदा जज के तबादले की मांग की और असंसदीय/अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया। |
| 20-21 दिसंबर 2023 | बर्खास्तगी की सिफारिश: जांच अधिकारी ने सभी आरोप सिद्ध पाए। हाईकोर्ट की स्टैंडिंग कमेटी (20 दिसंबर 2023) और फुल कोर्ट (21 दिसंबर 2023) ने उन्हें सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश राज्य सरकार को भेजी। |
| अक्टूबर 2026 | हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय: बर्खास्तगी आदेश के खिलाफ याचिका खारिज; बर्खास्तगी को पूर्णतः वैध ठहराया गया। |
विधिक एवं सेवा विधि विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- न्यायिक अधिकारियों के आचरण के विशेष मानक:
- सर्वोच्च न्यायालय ने ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ तथा नवल किशोर मिश्रा बनाम बिहार राज्य में स्पष्ट किया है कि न्यायिक अधिकारियों का आचरण एक सामान्य सरकारी सेवक से भिन्न होता है। उनके आचरण पर तनिक भी दाग पूरी न्यायिक प्रणाली के जन-विश्वास को नष्ट करता है।
- संविधान का अनुच्छेद 235 (अधीनस्थ न्यायपालिका पर नियंत्रण):
- उच्च न्यायालय को अधीनस्थ अदालतों और न्यायिक अधिकारियों पर प्रशासनिक और अनुशासनात्मक नियंत्रण का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
- अनुशासनहीनता, वरिष्ठों के प्रति अवज्ञाकारी रवैया, और न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन सेवा से निष्कासन (Dismissal) के लिए पर्याप्त आधार हैं।
- विभागीय जांच में विधिक अधिकार:
- जहां किसी कर्मचारी को जांच में उपस्थित होने और दस्तावेज देखने का पर्याप्त अवसर दिया गया हो, परंतु वह जानबूझकर असहयोग का रवैया अपनाए, वहां प्राकृतिक न्याय के हनन का सिद्धांत लागू नहीं होता (स्टेट बैंक ऑफ पटियाला बनाम एस.के. शर्मा, 1996)।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: वरिष्ठ सिविल जज (याचिकाकर्ता) बनाम गुजरात राज्य एवं गुजरात उच्च न्यायालय [विशेष सिविल आवेदन / रिट याचिका – गुजरात उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति एन.एस. संजय गौड़ा और न्यायमूर्ति जे.एल. ओडेदरा (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (न्यायिक अधिकारी) की ओर से: अधिवक्ता एच.पी. बक्षी एवं शिवानी आर. मोदी
- राज्य (गुजरात सरकार) की ओर से: सहायक सरकारी प्लीडर (AGP) कृष्णा देसाई
- गुजरात उच्च न्यायालय प्रशासन की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गौतम जोशी, साथ में अधिवक्ता हमेश सी. नायडू
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 226, अनुच्छेद 235 एवं अनुच्छेद 311(2)
- गुजरात सिविल सेवा (आचरण) नियम एवं गुजरात राज्य न्यायिक सेवा नियम
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक आचरण की शुचिता का सिद्धांत: एक न्यायाधीश का आचरण संदेह से परे और अनुकरणीय होना चाहिए; संस्थागत पद सोपान (Hierarchical Discipline) की अवज्ञा न्यायिक पद के सर्वथा प्रतिकूल है।
- अंतिम परिणाम: रिट याचिका खारिज; वरिष्ठ सिविल जज की बर्खास्तगी का आदेश वैध घोषित एवं बरकरार।
Women Judge: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | गुजरात उच्च न्यायालय (जस्टिस एन. एस. संजय गौड़ा और जस्टिस जे. एल. ओडेदरा) |
| याचिकाकर्ता | पूर्व वरिष्ठ सिविल जज (नाम गोपनीय/बर्खास्तगी आदेश को चुनौती) |
| मूल घटनाक्रम | अक्टूबर 2012 में वडोदरा से डीसा ट्रांसफर के बाद आवास आवंटन विवाद और अनुचित पत्राचार |
| मुख्य आरोप | फुटपाथ/कार में सोने की धमकी, हाईकोर्ट जज के ट्रांसफर की मांग, CJI/CJ को अमर्यादित पत्र |
| हाईकोर्ट का फैसला | याचिका खारिज; 2023 के बर्खास्तगी आदेश को पूरी तरह जायज ठहराया। |

