Bombay HC: मुंबई हाईकोर्ट ने जूनियर वकीलों को ₹5,000 मासिक स्टाइपेंड देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सवाल उठाए।
याचिका असली जनहित से जुड़ी नहीं लगती
चीफ जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस संदीप मारणे की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा, “यह जनहित कैसे हो सकता है? ‘सभी लॉ कैंडिडेट्स’ का मतलब पूरे समाज से नहीं है। समाज को इससे क्या लेना-देना कि आपको स्टाइपेंड मिले?अदालत ने कहा कि यह याचिका असली जनहित से जुड़ी नहीं लगती।
हम कैसे आदेश दें, भले ही हमें लगे कि आपको मिलना चाहिए?: कोर्ट
कोर्ट ने इस प्रस्ताव पर व्यावहारिक और वित्तीय सवाल भी उठाए। बेंच ने कहा, “पैसा कहां से आएगा? ₹5,000 क्यों? आपको तो ₹25,000 मिलना चाहिए। मुंबई में तो ₹45,000 मिलना चाहिए। लेकिन देगा कौन? क्या आपने इस पर सोचा है? बार काउंसिल की कौन सी कानूनी जिम्मेदारी है कि वह स्टाइपेंड दे? हम कैसे आदेश दें, भले ही हमें लगे कि आपको मिलना चाहिए?”
बार काउंसिल के पास फंड नहीं, सरकार ने मदद से किया इनकार
बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा की ओर से पेश हुए एडवोकेट उदय वरुंजीकर ने कोर्ट को बताया कि कुछ राज्यों की बार काउंसिल्स को उनकी राज्य सरकारों से मदद मिली है, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने ऐसा कोई फाइनेंशियल कॉर्पस बनाने में मदद देने से इनकार कर दिया है।
₹1.55 करोड़ की जरूरत, लेकिन संसाधन नहीं
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि बार काउंसिल ने इस योजना के लिए ₹1.55 करोड़ की जरूरत बताई है, लेकिन उसके पास इतने संसाधन नहीं हैं। बेंच ने कहा, “फंड जरूरी है और यह एक अहम पहलू है।”
अब याचिकाकर्ता खुद तीन साल की सीमा पार कर चुके
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह याचिका 2021 में दायर की गई थी, जब याचिकाकर्ता तीन साल की प्रैक्टिस की सीमा में थे, लेकिन अब वे खुद यह सीमा पार कर चुके हैं। बेंच ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, “अब तक तो आप खुद तीन साल का अनुभव ले चुके होंगे। अब आप तीन जूनियर रखें और उन्हें ₹40,000 दें। उदाहरण बनिए। यह एक सराहनीय उद्देश्य है, लेकिन इसमें व्यावहारिक दिक्कतें हैं।”
दो हफ्ते में अगली सुनवाई, याचिकाकर्ता कर सकते हैं और दलीलें
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दो हफ्ते का समय दिया है ताकि वे इस मुद्दे पर और दलीलें दे सकें। इसके बाद कोर्ट अंतिम निर्णय लेगा।

