Friday, August 21, 2026
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3-Year Practice Rule-I: सिविल जज बनने के लिए वकालत के अनुभव की शर्त 3 साल से घटाकर 1 साल; कड़े प्रशिक्षण का नया ढांचा भी तय किया

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • 31 मार्च 2027 तक अनुभव से छूट: 31 मार्च 2027 तक निकलने वाली भर्तियों में नए लॉ ग्रेजुएट्स को वकालत के बिना आवेदन करने की छूट होगी; उन्हें मान लिया जाएगा कि उनके पास 1 साल का अनुभव (Deemed Practice) है।
  • 1 अप्रैल 2027 से 1 साल का अभ्यास अनिवार्य: 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के पास कम से कम 1 साल की सक्रिय वकालत का प्रैक्टिस सर्टिफिकेट होना अनिवार्य होगा।
  • ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर और स्टाइपेंड: परीक्षा में सफल उम्मीदवारों को ‘ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर’ का पद दिया जाएगा। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) के कुल वेतन का आधा (50%) स्टाइपेंड मिलेगा।
  • 2 साल का कड़ा प्रशिक्षण सत्र:
    • 1st Year: स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी में 1 वर्ष का गहन प्रशिक्षण।
    • 2nd Year (क्लर्कशिप): 6 महीने जिला न्यायाधीश (District Judge) के अधीन और 6 महीने हाईकोर्ट के सिटिंग जज के अधीन लॉ क्लर्क के रूप में काम।
  • हाईकोर्ट जज की मूल्यांकन रिपोर्ट: 2 साल के प्रशिक्षण और क्लर्कशिप के बाद संबंधित हाईकोर्ट जज की संतोषजनक मूल्यांकन रिपोर्ट (Evaluation Report) मिलने के बाद ही नियमित जज के रूप में नियुक्ति और पूरा वेतन स्केल मिलेगा।

3-Year Practice Rule-I: न्यायिक अधिकारियों की भर्ती को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

शीर्ष अदालत ने मई 2025 के अपने उस फैसले की मूल भावना को बरकरार रखा, जिसमें न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए वकालत (Law Practice) के अनुभव को अनिवार्य किया गया था। हालांकि, अदालत ने बार में वकालत के अनिवार्य अनुभव की अवधि को 3 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष कर दिया है [भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ एवं अन्य]। अदालत ने शेष 2 वर्षों के अनुभव के विकल्प के तौर पर न्यायिक सेवा परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों के लिए राज्य न्यायिक अकादमी में 1 वर्ष का गहन प्रशिक्षण और 1 वर्ष की संरचित लॉ क्लर्कशिप (Law Clerkship) को अनिवार्य बना दिया है।

यहां पढ़ें: 3-Year Practice Rule:न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन बोले; 3 साल की वकालत का नियम शिथिल करने से ‘न्यायविद’ नहीं, केवल ‘कैरियरिस्ट’ पैदा होंगे…

पीठ और फैसला

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मई 2025 के फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं (Review Petitions) के बैच पर यह फैसला सुनाया। पीठ में बहुमत के फैसले से सहमति बनी, जबकि न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने असहमति जताते हुए मई 2025 के 3 साल के अनुभव वाले फैसले को पूरी तरह बरकरार रखने का विचार रखा।

नए भर्ती ढांचे के मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • 31 मार्च 2027 तक संक्रमणकालीन अवधि (Transition Period): 31 मार्च 2027 तक आवेदन करने वाले कानून स्नातकों (Law Graduates) को पूर्व वकालत अनुभव से छूट रहेगी। उन्हें पात्रता के उद्देश्य से 1 वर्ष की सक्रिय प्रैक्टिस पूरी मान लिया जाएगा और कोई प्रैक्टिस प्रमाण पत्र नहीं देना होगा।
  • 1 अप्रैल 2027 से नई शर्त: 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद आवेदन करने वाले सभी उम्मीदवारों के लिए बार में कम से कम 1 वर्ष की सक्रिय वकालत अनिवार्य होगी। यह वकालत ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस’ के सत्यापन के अधीन होगी, जो वास्तविक अदालती कार्यवाही में उपस्थिति के आधार पर जारी होगा।
  • चयन के बाद 2 साल का अनिवार्य प्रशिक्षण व क्लर्कशिप: सफल अभ्यर्थियों को ‘प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी’ (Trainee Judicial Officers) के रूप में नियुक्त किया जाएगा और उन्हें निम्नलिखित चरणों से गुजरना होगा:
    1. 1 वर्ष का गहन प्रशिक्षण: संबंधित राज्य न्यायिक अकादमी (State Judicial Academy) में। (यह 3 साल की शर्त के तहत 1 साल की वकालत के बराबर माना जाएगा)।
    2. 1 वर्ष की लॉ क्लर्कशिप: पहले 6 महीने प्रधान जिला न्यायाधीश/उच्चतर न्यायिक सेवा के अधीन, और अगले 6 महीने संबंधित उच्च न्यायालय के आसीन न्यायाधीश (Sitting High Court Judge) की देखरेख में। (यह भी 1 साल की वकालत के समतुल्य मानी जाएगी)।
  • मानदेय/वेतन: प्रशिक्षण और लॉ क्लर्कशिप के दौरान प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारियों को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) के कुल वेतन का आधा (50%) मानदेय मिलेगा।
  • मूल्यांकन और नियमित नियुक्ति: क्लर्कशिप पूरी होने के बाद उच्च न्यायालय के संबंधित न्यायाधीश एक विस्तृत मूल्यांकन रिपोर्ट देंगे। रिपोर्ट संतोषजनक पाए जाने पर ही प्रशिक्षु अधिकारी को नियमित पद पर नियुक्ति, पूर्ण वेतनमान और सेवा लाभ मिलेंगे।
  • समय-सीमा और समीक्षा: सभी उच्च न्यायालयों को तीन महीने के भीतर अपने संबंधित न्यायिक सेवा नियमों में संशोधन करने का निर्देश दिया गया है। यह नई व्यवस्था 5 वर्षों तक लागू रहेगी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट इसके कामकाज की समीक्षा करेगा।

मामले की पृष्ठभूमि और पुनर्विचार याचिकाएं

मई 2025 में तत्कालीन सीजेआई बी. आर. गवई, न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) परीक्षा के लिए वकीलों के पास कम से कम 3 साल की प्रैक्टिस अनिवार्य करने का फैसला सुनाया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस, अधिवक्ता चंद्र सेन यादव और अन्य द्वारा पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं:

  • याचिकाओं में 1924 से 1986 तक की विधि आयोग की रिपोर्टों और द्वितीय राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग (2022) की सिफारिशों का हवाला दिया गया, जिसमें न्यायपालिका में प्रवेश के लिए पूर्व वकालत को अनिवार्य बनाने का विरोध किया गया था या व्यापक विचार-विमर्श की सलाह दी गई थी।
  • यह भी तर्क दिया गया कि इस शर्त से संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 (समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) का उल्लंघन होता है, तथा आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले नए कानून स्नातकों के अवसर सीमित होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इन चिंताओं को संतुलित करते हुए 3 साल की प्रैक्टिस के बजाय 1 वर्ष की पूर्व प्रैक्टिस + 1 वर्ष का अकादमी प्रशिक्षण + 1 वर्ष की क्लर्कशिप का समन्वित मॉडल लागू कर दिया है।

मामले के मुख्य तथ्य और कानूनी विश्लेषण

मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट (तत्कालीन CJI बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ) ने फैसला सुनाया था कि सिविल जज की परीक्षा में बैठने के लिए वकीलों को कम से कम 3 साल की वकालत का अनुभव होना अनिवार्य है। इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं (Review Petitions) दायर की गई थीं, जिनमें तर्क दिया गया था कि यह नियम गरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के नए लॉ ग्रेजुएट्स के साथ असमानता (अनुच्छेद 14 और 16) पैदा करता है।

2:1 के बहुमत का फैसला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह ने माना कि मई 2025 के फैसले के बाद से 1 साल से अधिक समय बीत चुका है। इसलिए, कोर्ट ने वकालत की न्यूनतम अवधि 3 साल से घटाकर 1 साल कर दी और बाकी के 2 वर्षों की भरपाई के लिए 1 साल की एकेडमी ट्रेनिंग और 1 साल की ज्यूडिशियल क्लर्कशिप का मॉडल तैयार किया। (न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने मई 2025 के 3-वर्षीय नियम को बरकरार रखते हुए अपनी असहमति जताई)।

हाईकोर्ट्स को 3 महीने का अल्टीमेटम शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि वे तीन महीने के भीतर अपने संबंधित न्यायिक सेवा नियमों (Judicial Service Rules) में संशोधन करें। यह पूरी योजना 5 वर्षों के लिए संचालित होगी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट इसके कामकाजी प्रभाव का आकलन करेगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बिंदु

  1. संक्रमण काल (Transition Period – 31 मार्च 2027 तक)
    • अनुभव की छूट: 31 मार्च 2027 तक परीक्षा में बैठने वाले कानून स्नातकों (Law Graduates) के लिए वकालत के अनुभव की शर्त लागू नहीं होगी। उन्हें स्वतः 1 वर्ष का वकालत अनुभव मान (Deemed) लिया जाएगा।
    • ट्रेनिंग अनिवार्य: हालांकि, चयन के बाद उन्हें भी निर्धारित ट्रेनिंग और क्लर्कशिप प्रक्रिया से गुजरना होगा।
  2. 1 अप्रैल 2027 के बाद के नियम
    • उम्मीदवारों के पास न्यूनतम 1 वर्ष का सक्रिय वकालत अनुभव (Active Law Practice) होना अनिवार्य होगा, जिसका प्रमाण पत्र (Certificate of Practice) सत्यापन के आधार पर जारी किया जाएगा।
  3. चयन के बाद का 2 वर्षीय प्रशिक्षण मॉडल (Trainee Judicial Officer)
    • वर्ष 1 (स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी): सफल उम्मीदवारों को ‘प्रशिक्षणार्थी न्यायिक अधिकारी’ (Trainee Judicial Officer) कहा जाएगा और वे राज्य न्यायिक अकादमी में 1 साल का गहन प्रशिक्षण लेंगे।
    • वर्ष 2 (6+6 महीने की क्लर्कशिप)
      • पहले 6 महीने: जिला न्यायाधीश (District Judge / HJS) के अधीन क्लर्कशिप।
      • अगले 6 महीने: उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश (Sitting High Court Judge) के अधीन क्लर्कशिप।
    • वेतन/मानदेय: प्रशिक्षण और क्लर्कशिप के दौरान उम्मीदवारों को ‘प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट’ (JMFC) के कुल वेतन का आधा (50%) मानदेय मिलेगा।
  4. अंतिम नियुक्ति
    • क्लर्कशिप पूरी होने पर संबंधित हाई कोर्ट जज Trainee Officer की प्रगति पर एक मूल्यांकन रिपोर्ट (Evaluation Report) देंगे। रिपोर्ट संतोषजनक पाए जाने पर ही नियमित कैडर में नियुक्ति होगी और पूर्ण वेतनमान मिलेगा।
  5. भविष्य की समीक्षा
    • सभी उच्च न्यायालयों को 3 महीने के भीतर अपने सेवा नियमों (Judicial Service Rules) में संशोधन करने का निर्देश दिया गया है। यह नई व्यवस्था 5 वर्षों के लिए लागू होगी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट इसके प्रभावों की समीक्षा करेगा।

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठCJI सूर्य कांत, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (2:1 बहुमत)
मामलाभूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ व अन्य (Review Petition)
मुख्य बदलावपूर्व वकालत अनुभव 3 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष; चयन के बाद 1 वर्ष ट्रेनिंग + 1 वर्ष क्लर्कशिप जोड़ी गई।
प्रभावी तिथि31 मार्च 2027 तक प्रैक्टिस से छूट; 1 अप्रैल 2027 से 1 साल की प्रैक्टिस अनिवार्य।

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