हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणियाँ (Key Observations)
- संविधान और न्याय प्रणाली का सम्मान:खंडपीठ ने टिप्पणी की:“उच्चतम न्यायालय में निर्णय को चुनौती देना हमेशा आपका अधिकार है, लेकिन यदि आपको संविधान और संवैधानिक व्यवस्था पर विश्वास है, तो आप यह नहीं कह सकते कि ‘हम आदेश को लागू नहीं करेंगे, हम अपील दायर नहीं करेंगे’ और ट्वीट्स तथा सोशल मीडिया के माध्यम से निर्णय को चुनौती देने का एक नया तरीका अपनाएंगे।”
- समय काटने की रणनीति:मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा ने कहा कि सरकार अदालत को सख्त कदम उठाने के लिए मजबूर कर रही है।“यह एक असामान्य मामला है… कोई राज्य अदालत के सामने तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने में किस हद तक जा सकता है, यह हमारे सामने स्पष्ट है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रयास केवल सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कानूनी उपाय करने की आड़ में समय खरीदने का है।”
- कर्मचारियों और पेंशनभोगियों का हित:पीठ ने स्पष्ट किया कि कोर्ट किसी सरकार के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन सेवानिवृत्त कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा कर रहा है जो सालों से अपने बकाये का इंतजार कर रहे हैं।
चंडीगढ़: राज्य सरकार के सेवारत कर्मचारियों और सेवानिवृत्त पेंशनरों के बकाया महंगाई भत्ते (Dearness Allowance – DA) व महंगाई राहत (Dearness Relief – DR) के भुगतान, न्यायिक आदेशों के अनुपालन की संवैधानिक बाध्यता, और अदालती फैसलों के खिलाफ सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाने की प्रवृत्ति पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्टने अत्यंत सख्त और तल्ख रुख अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायिक फैसले को सोशल मीडिया या ट्वीट्स के माध्यम से चुनौती देने का नया तरीका किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत ने मुख्य सचिव को आड़े हाथों लेते हुए संकेत दिया कि यदि राज्य ने अदालती आदेश को लागू करने में टालमटोल जारी रखी, तो अदालत को मुख्य सचिव और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कदम उठाने के लिए विवश होना पड़ेगा। उच्च न्यायालय ने पंजाब सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के नाम पर लगातार “आंख-मिचौली” (Hide and seek) खेलने और समय काटने की कोशिशों पर कड़ा ऐतराज जताया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं तल्ख न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘ट्वीट्स और सोशल मीडिया से फैसले को चुनौती देने का अनोखा तरीका अस्वीकार्य’ मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने राज्य सरकार के रुख पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा: “सर्वोच्च न्यायालय में आदेश को चुनौती देना हमेशा आपका विधिक अधिकार है। परंतु यदि आपका संविधान और संवैधानिक व्यवस्था (Constitutional Scheme) में तनिक भी विश्वास है, तो आप यह नहीं कह सकते कि ‘हम आदेश को लागू भी नहीं करेंगे, हम अपील भी पूरी नहीं करेंगे’—और ट्वीट्स व सोशल मीडिया के माध्यम से अदालती फैसले को चुनौती देने का एक अनोखा तरीका (Novel method of challenging judgment through tweets) निकाल लेंगे। यदि आप ऐसा करने जा रहे हैं, तो हम इसकी कतई सराहना नहीं कर सकते।”
2. ‘हम सरकार के खिलाफ नहीं, वर्षों से इंतजार कर रहे बुजुर्ग पेंशनरों के पक्ष में हैं’: न्यायालय ने मामले की मानवीय और सामाजिक-कल्याणकारी महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा:
“हम यहां किसी एक सरकार के खिलाफ या पक्ष में नहीं बैठे हैं। हम यहां सेवानिवृत्त बुजुर्ग कर्मचारियों (Retired People) की रक्षा के लिए बैठे हैं। वे आपके अपने लोग हैं, वे आपके सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं जो वर्षों से अपने वैधानिक बकाये का इंतजार कर रहे हैं।”
3. सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में एक महीने से डिफेक्ट्स (खामियां) न सुधारने पर सवाल: अदालत ने पाया कि सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में एक महीने से अधिक समय से ‘दोषों/डिफेक्ट्स’ (Defects) के साथ अटकी हुई है और बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद सरकार उन आपत्तियों को दूर नहीं करा रही है:
- अदालत ने टिप्पणी की:“यदि आप ऐसा नहीं कर रहे हैं, तो आप हमें कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। या तो आप किसी सोची-समझी योजना (Some design or scheme) के तहत काम कर रहे हैं, क्योंकि ऐसा कोई कारण समझ नहीं आता कि तीन अवसरों के बावजूद आपने अपनी अपील को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (Listed) कराने योग्य क्यों नहीं बनाया।”
4. झूठे हलफनामे पर एडवोकेट जनरल को फटकार:
- जब मुख्य सचिव के.पी. सिन्हा ने दावा किया कि एक और एसएलपी दायर की गई है, तो अदालत ने अपने कर्मचारियों से तुरंत सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपील की स्थिति चेक कराई और पाया कि केवल ई-फाइलिंग की औपचारिकता हुई है।
- खंडपीठ ने राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) मनिंदरजीत सिंह बेदी से तीखा सवाल किया:“मिस्टर एडवोकेट जनरल, आप अपने मुख्य सचिव को किस तरह की कानूनी सलाह दे रहे हैं? क्या राज्य यह चाहता है कि अदालत हलफनामे पर गलत/झूठे बयान देने के लिए मुख्य सचिव के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई शुरू करे? अब बहुत आंख-मिचौली हो चुकी है (Enough of hide and seek has happened already)।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: 3 अगस्त 2026 का ऐतिहासिक फैसला
- हाईकोर्ट का मूल आदेश (3 अगस्त 2026):
- पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में पंजाब सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया था कि वह अपने सभी कर्मचारियों और पेंशनरों को महंगाई भत्ते (DA) और महंगाई राहत (DR) की सभी लंबित किस्तों का भुगतान उसी दर पर करे, जिस दर पर राज्य में सेवारत अखिल भारतीय सेवाओं (IAS/IPS/IFS) के अधिकारियों को दिया जा रहा है।
- अनुत्पादक खर्चों और सरकारी विज्ञापनों पर रोक:
- हाईकोर्ट ने अपने मूल फैसले में यह भी आदेश दिया था कि जब तक कर्मचारियों और पेंशनरों के बकाये का पूर्ण भुगतान नहीं हो जाता, तब तक सरकार प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर विज्ञापन अभियानों जैसे किसी भी अनुत्पादक खर्च (Unproductive Expenditures) का सहारा नहीं लेगी।
- अनुपालन रिपोर्ट में विफलता और 31 अगस्त की समय-सीमा:
- अदालत ने मुख्य सचिव को 31 अगस्त तक अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
- आदेश का पालन न होने पर कर्मचारी संघों ने अवमानना व निष्पादन अर्जियां दाखिल कीं, जिनकी सुनवाई के दौरान मुख्य सचिव व्यक्तिगत रूप से पेश हुए।
उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश
- सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से आधिकारिक रिपोर्ट तलब: हाईकोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से पंजाब सरकार द्वारा दायर एसएलपी/अपील की सटीक और आधिकारिक विधिक स्थिति (Status Report) तलब करे।
- समय काटने की रणनीति पर कड़ा रुख: अदालत ने अपने आदेश में दर्ज किया कि राज्य सरकार कानूनी उपचार प्राप्त करने की आड़ में केवल समय खरीदने (Buying time) का प्रयास कर रही है और अदालत के समक्ष तथ्यों को गलत तरीके से पेश (Misrepresenting facts) कर रही है।
- सुनवाई स्थगित: मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने आगे की कठोर कार्रवाई पर विचार करने हेतु सुनवाई अगले दिन (मंगलवार) के लिए तय कर दी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: कर्मचारी संघ/पेंशनर्स बनाम पंजाब राज्य व अन्य [अवमानना एवं अनुपालन विविध आवेदन – पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- पंजाब राज्य की ओर से: मनिंदरजीत सिंह बेदी (महाधिवक्ता / Advocate General, Punjab)
- प्रशासनिक उपस्थिति: के.पी. सिन्हा (मुख्य सचिव, पंजाब सरकार)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 11 व 12 (अदालती आदेशों की जानबूझकर अवहेलना पर दंड)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना तथा अवमानना के लिए दंडित करने की शक्तियां)
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार — राज्य संवर्ग के कर्मचारियों और अखिल भारतीय सेवा अधिकारियों के बीच डीए समानता)
- अनुच्छेद 136 (सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका – उचित प्रक्रिया की अनिवार्यता)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक आदेशों के सम्मान का सिद्धांत — ‘जब तक किसी सक्षम अपीलीय अदालत (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा किसी न्यायिक आदेश पर औपचारिक रोक (Stay) नहीं लगाई जाती, तब तक राज्य कार्यपालिका उस आदेश का पालन करने के लिए पूर्णतः विधिक रूप से बाध्य है; अपील लंबित होने का बहाना बनाकर आदेश के अनुपालन से नहीं बचा जा सकता।’
- वर्तमान स्थिति: पंजाब सरकार के टालमटोल पर हाईकोर्ट की सख्त चेतावनी; सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से वास्तविक अपील स्थिति रिपोर्ट तलब; मामले की त्वरित सुनवाई जारी।
Courts Act:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित न्यायालय | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (P&H High Court) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा एवं न्यायमूर्ति रोहित कपूर |
| प्रतिवादी | पंजाब सरकार (मुख्य सचिव के.पी. सिन्हा के माध्यम से) |
| मूल आदेश (3 अगस्त) | पंजाब सरकार को कर्मचारियों/पेंशनभोगियों को IAS/IPS अधिकारियों की तर्ज पर पूरा बकाया DA/DR जारी करने और विज्ञापनों पर फालतू खर्च न करने का निर्देश। |
| हाईकोर्ट की टिप्पणी | “अदालत के फैसले को ट्वीट्स के जरिए चुनौती नहीं दिया जा सकता; सरकार केवल समय काटने की कोशिश कर रही है।” |

