सुप्रीम कोर्ट की मुख्य और तीखी टिप्पणियाँ
1. अपराधियों में खौफ पैदा करने की सख्त जरूरत
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने पुलिस व्यवस्था और कानून-व्यवस्था के तंत्र पर सवाल उठाते हुए मौखिक टिप्पणी की: “आपको अपराध करने की प्रवृत्ति रखने वाले व्यक्ति के मन में डर या खौफ पैदा करने की जरूरत है। जब तक आप उस गुंडे या असामाजिक तत्व के मन में यह खौफ पैदा नहीं करेंगे कि ‘अब कुछ किया तो मारे जाएंगे’, तब तक आप ऐसे अपराधों को नहीं रोक पाएंगे… छेड़छाड़ की शिकार हर लड़की हमारी बहन और माँ है। यह दिल्ली पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है, ऐसी घटनाओं को कतई न होने दें।”
2. “अपराध होने के बाद क्या किया, उससे ज्यादा जरूरी अपराध रोकना है”
पीठ ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों (जैसे मेट्रो, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सार्वजनिक पार्क, और स्कूल-कॉलेज के आसपास) में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्राथमिकता होनी चाहिए: “महत्वपूर्ण यह है कि अपराध को रोका जाए, न कि यह कि अपराध होने के बाद आप क्या करते हैं। आपने अपनी पूरी कोशिश की, आरोपी पकड़े गए और उनका ट्रायल होगा, लेकिन महत्वपूर्ण वे क्षेत्र हैं जहाँ हमें काम करने की आवश्यकता है। हमें मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि दिल्ली में हर युवा लड़की रात 10 या 11 बजे भी सुरक्षित महसूस करे, चाहे वह मेट्रो से यात्रा कर रही हो या सड़क पर पैदल चल रही हो।”
3. अवैध ढाबों/रेस्तरां और सीसीटीवी निगरानी (War Rooms) पर सवाल
- 2012 के निर्भया कांड का जिक्र: कोर्ट ने अवैध रूप से शराब परोसने वाले खाने-पीने के अड्डों पर चिंता जताई और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से पूछा कि वर्ष 2012 के निर्भया मामले में भी अपराधियों ने ऐसे ही ढाबे पर शराब पी थी। ऐसे संवेदनशील इलाकों और अवैध अड्डों पर तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए।
- सीसीटीवी वार रूम्स (Continuous Monitoring): कोर्ट ने कहा कि केवल सीसीटीवी कैमरे लगाना काफी नहीं है जब तक कि अलग-अलग वॉर रूम के जरिए उनकी लगातार लाइव मॉनिटरिंग (सतत निगरानी) न की जा रही हो।
प्रशासन और सॉलिसिटर जनरल (SG) का पक्ष
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) ने पीठ को आश्वासन दिया कि केंद्र और दिल्ली सरकार इस मुद्दे को बिल्कुल भी प्रतिकूल (Adversarial) नहीं मान रही हैं।
- उन्होंने बताया कि दिल्ली पुलिस, एमसीडी (MCD), महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और अन्य हितधारकों के साथ उच्चस्तरीय बैठकें की गई हैं और वे सीसीटीवी, लाइटिंग तथा सुरक्षा बढ़ाने पर एक विस्तृत हलफनामा और सुझाव दाखिल करेंगे।
- अदालत द्वारा नियुक्त न्याय मित्र (Amicus Curiae) लिज़ मैथ्यू ने कोर्ट को बताया कि बीट पेट्रोलिंग (Beat Patrolling) में लगभग 39% पद खाली हैं और शिष्टाचार एंटी-ईव टीज़िंग स्क्वाड (Shishtachar Squad) का सही क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है, जिसे तुरंत दुरुस्त करने की जरूरत है।
नई दिल्ली: दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में महिलाओं और नाबालिग बच्चियों के खिलाफ लगातार सामने आ रही बलात्कार एवं सामूहिक दुष्कर्म की वीभत्स घटनाओं पर देश की सर्वोच्च अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून का प्रवर्तन केवल कागजी योजनाओं या अपराध घटित होने के बाद की जाने वाली औपचारिक गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रह सकता; पुलिस और प्रशासन का पहला दायित्व अपराध को घटित होने से पहले ही रोकना (Prevention of Crime) है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने सार्वजनिक पार्कों में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म और चलती स्लीपर बस के भीतर बच्ची से यौन उत्पीड़न की हालिया घटनाओं पर लिए गए स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस और संबंधित नागरिक प्राधिकारियों को जमीनी स्तर पर व्यापक सुरक्षा इंतजाम करने का आदेश दिया। अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि समाज में असामाजिक तत्वों के भीतर कानून और पुलिस का इतना कड़ा खौफ (Fear and Fright) होना चाहिए कि वे किसी भी महिला या बच्ची की ओर बुरी नजर उठाने से पहले कांप उठें।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘गुंडों के दिमाग में ऐसा खौफ होना चाहिए कि अब कुछ किया तो बचेंगे नहीं’ न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पुलिस व्यवस्था को झकझोरते हुए मौखिक रूप से अत्यंत तल्ख टिप्पणी की: “आपको उस व्यक्ति या असामाजिक तत्व के जेहन में एक खौफ और डर पैदा करने की सख्त जरूरत है जो अपराध करने की प्रवृत्ति रखता है। जब तक आप उस गुंडे या समाज-विरोधी तत्व के दिमाग में यह डर पैदा नहीं करेंगे कि ‘अब कुछ किया तो मर जाएंगे’, तब तक आप ऐसे जघन्य अपराधों के होने को रोक नहीं पाएंगे। प्रताड़ित की जाने वाली हर बच्ची हमारी बहन है, हमारी मां है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली पुलिस के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है; ऐसी घटनाओं को बिल्कुल भी होने की अनुमति न दें।”
2. ‘अपराध होने के बाद की कार्रवाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है अपराध को रोकना’: पीठ ने अभियोजन और पुलिस तंत्र के पारंपरिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा:
- अदालत ने कहा कि अपराध घटित होने के बाद पुलिस ने आरोपियों को पकड़ लिया और उन पर मुकदमा चलेगा, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वे कौन से क्षेत्र हैं जहां पहले से काम करके अपराध को टाला जा सकता था।
- न्यायमूर्ति पारदीवाला ने रेखांकित किया:“हमें मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में प्रत्येक युवती या महिला रात को 10 या 11 बजे भी पूरी तरह सुरक्षित महसूस करे—चाहे वह मेट्रो से यात्रा कर रही हो, बस में हो या सड़कों पर पैदल चल रही हो।”
3. केवल सीसीटीवी लगाना काफी नहीं, ‘वॉर रूम’ से 24×7 रियल-टाइम मॉनिटरिंग जरूरी: अदालत में उपस्थित दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से सीधी बातचीत करते हुए अदालत ने निगरानी प्रणाली की प्रभावकारिता पर सवाल उठाए:
- न्यायमूर्ति पारदीवाला ने पूछा कि यदि सीसीटीवी कैमरों की विभिन्न ‘वॉर रूम’ (War Rooms) से चौबीसों घंटे निगरानी (Continuous monitoring) नहीं हो रही है, तो वे कैमरे कैसे मददगार होंगे?
- अदालत ने उदाहरण दिया कि कोई संदिग्ध व्यक्ति पार्क के भीतर गया और अपराध को अंजाम देकर बाहर निकल गया; फुटेज बाद में केवल साक्ष्य बनेगी, लेकिन वास्तविक समय में उस अपराध को रोका कैसे जाएगा?
- अदालत ने न्यायपालिका का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे उच्च न्यायालयों में वॉर रूम बने हैं जो हर कोर्ट की गतिविधि पर नजर रखते हैं, वैसे ही दिल्ली पुलिस के पास कौन सा त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र (Quick Response Mechanism) है?
4. अवैध ढाबों/शराब की दुकानों पर सख्ती और 2012 के ‘निर्भया’ कांड की याद: न्यायमूर्ति पारदीवाला ने राजधानी में अनधिकृत भोजनालयों/ढाबों पर अवैध शराब परोसे जाने और असामाजिक तत्वों के जमावड़े पर गहरी चिंता जताई: “हमें बताया गया है कि पूरी दिल्ली में हजारों ऐसे अवैध और अनाधिकृत भोजनालय चल रहे हैं जहां सभी असामाजिक तत्व इकट्ठा होते हैं और अवैध रूप से शराब उपलब्ध कराई जाती है। क्या आप जानते हैं कि 2012 में क्या हुआ था? रिकॉर्ड से पता चलता है कि सभी पांचों दोषियों ने ऐसे ही एक भोजनालय में खाना खाया था, शराब पी थी, उसके बाद बस में चढ़े और उस वीभत्स अपराध को अंजाम दिया। क्या आपको ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर उन अवैध ढाबों पर तत्काल कार्रवाई शुरू नहीं करनी चाहिए?”
सुनवाई का घटनाक्रम: एमिकस क्यूरी और सॉलिसिटर जनरल की दलीलें
- न्याय मित्र (Amicus Curiae) की रिपोर्ट और प्रशासनिक विफलताएं:
- वरिष्ठ अधिवक्ता लिज़ मैथ्यू ने न्यायालय को बताया कि राजधानी में बीट पेट्रोलिंग (Beat Patrolling) का तंत्र पूरी तरह से प्रशासनिक विफलता का शिकार है।
- नीतियां कागजों पर मौजूद हैं लेकिन जमीन पर लागू नहीं होतीं। उन्होंने बताया कि दिल्ली पुलिस की बीट पेट्रोलिंग यूनिट्स में लगभग 39% पद रिक्त (Vacant) पड़े हैं।
- उन्होंने उल्लेख किया कि ‘शिष्टाचार एंटी-ईव टीजिंग स्क्वॉड’ के तहत डीसीपी को संवेदनशील हॉटस्पॉट्स की पहचान करनी थी, लेकिन इसकी जमीनी स्थिति शून्य है।
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का पक्ष:
- केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट की चिंताओं से पूरी तरह सहमत है।
- उन्होंने कहा कि उन्होंने दिल्ली पुलिस, दिल्ली सरकार (GNCTD), नगर निगम (MCD) और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक की है।
- एसजी मेहता ने स्पष्ट किया: “केवल सिस्टम का होना ही काफी नहीं है; हमें यह साबित करना होगा कि वह प्रभावी ढंग से काम कर रहा है।” उन्होंने बताया कि सीसीटीवी, स्ट्रीट लाइटिंग और हॉटस्पॉट्स का पूरा डेटा हलफनामे के रूप में अदालत में दाखिल किया जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी प्रमुख तात्कालिक निर्देश
- संवेदनशील सार्वजनिक स्थलों की 24×7 निगरानी:
- दिल्ली मेट्रो स्टेशनों, बस टर्मिनलों, रेलवे स्टेशनों, सबवे और सार्वजनिक पार्कों में बीट पेट्रोलिंग को तत्काल प्रभाव से सघन और निरंतर बनाया जाए।
- पीसीआर (PCR) वैनों के हॉल्टिंग पॉइंट्स को सुदृढ़ करना:
- पुलिस कंट्रोल रूम वैनों के ठहराव स्थलों (Halting Points) को रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों में तैनात किया जाए।
- आगामी त्योहारों के मद्देनजर अतिरिक्त सतर्कता:
- त्योहारी सीजन के चलते बाजारों, भीड़भाड़ वाले इलाकों और संवेदनशील रास्तों पर महिला सुरक्षा हेतु विशेष सतर्कता दल तैनात किए जाएं।
- नेशनल डेटाबेस ऑन सेक्सुअल ऑफेंडर्स (NDSO) की ट्रैकिंग:
- एनसीआरबी (NCRB) द्वारा बनाए गए यौन अपराधियों के राष्ट्रीय डेटाबेस की नियमित ट्रैकिंग और निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जाए।
- पुलिस-जनता संवाद:
- स्थानीय निवासियों और आरडब्ल्यूए (RWA) की शिकायतों को पुलिस गंभीरता से ले, विशेषकर पार्कों और सुनसान स्थानों पर असामाजिक तत्वों की आवाजाही को लेकर।
- ज्यादतियों से बचने की सलाह:
- न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने आगाह किया कि सुरक्षा और निगरानी बढ़ाते समय पुलिस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आम नागरिकों के प्रति कोई अनावश्यक ज्यादती या उत्पीड़न न हो।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: इन री: दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं की सुरक्षा एवं यौन अपराधों की रोकथाम [स्वतः संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 5 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- न्यायालय द्वारा नियुक्त न्याय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता लिज़ मैथ्यू
- केंद्र सरकार / दिल्ली पुलिस की ओर से: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- प्रशासनिक उपस्थिति: दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 21 (महिलाओं और बच्चों के गरिमापूर्ण, भयमुक्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार)
- अनुच्छेद 32 (सर्वोच्च न्यायालय की स्वतः संज्ञान एवं मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन की संवैधानिक अधिकारिता)
- अनुच्छेद 14 व 15 (समानता एवं महिलाओं के पक्ष में विशेष सुरक्षात्मक दायित्व)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) [बलात्कार, सामूहिक दुष्कर्म और शीलभंग से संबंधित धाराएं]
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act)
- भारत का संविधान:
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997, सुप्रीम कोर्ट) — ‘महिलाओं के मौलिक अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा हेतु कार्यपालिका के शून्य में अदालती दिशानिर्देशों का बाध्यकारी होना।’
- अपर्णा भट बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2021, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यौन अपराधों के मामलों में पीड़ितों की सुरक्षा, संस्थागत संवेदनशीलता और पूर्व-निवारक कदमों की अनिवार्यता।’
- वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने तात्कालिक उपायों पर संक्षिप्त अंतरिम आदेश पारित करते हुए मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 13 नवंबर 2026 को नियत की है।
Fear In Minds: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित न्यायालय | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
| मामला | दिल्ली-एनसीआर में बढ़ती यौन हिंसा और महिलाओं की सुरक्षा पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) |
| न्याय मित्र (Amicus Curiae) | वरिष्ठ अधिवक्ता लिज़ मैथ्यू (Senior Advocate Liz Mathew) |
| मुख्य मुद्दा | अपराध घटने के बाद कार्रवाई के बजाय अपराध को रोकने (Preventive Patrol & Surveillance) पर जोर। |

