Thursday, October 8, 2026
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Sahyadri Tiger Reserve: क्या आपको पता है…टाइगर रिजर्व क्षेत्र से होकर 228 बच्चे स्कूल जाते हैं; सरकार की ‘चौंकाने वाली बेरुखी’ को पढ़िए

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (कोल्हापुर सर्किट बेंच)
पीठन्यायमूर्ति शर्मिला यू. देशमुख एवं न्यायमूर्ति नीरज पी. धोटे
याचिकाकर्ताहरीश भीमराव कांबले (जनहित याचिका)
संबंधित क्षेत्रसह्याद्रि टाइगर रिजर्व (STR) क्षेत्र, महाराष्ट्र
मुख्य मुद्दावन्यजीव प्रभावित क्षेत्र में 228 छात्रों के लिए सुरक्षित स्कूल परिवहन और RRT तैनाती में विफलता

कोल्हापुर/मुंबई: बॉम्बे उच्च न्यायालय की कोल्हापुर सर्किट बेंच ने सह्याद्री टाइगर रिजर्व (STR) के वन्यजीव-संवेदनशील क्षेत्रों में 8 गांवों के 228 स्कूली बच्चों को सुरक्षित परिवहन मुहैया न कराने पर महाराष्ट्र सरकार, जिला कलेक्टर और वन विभाग को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने प्रशासन के इस उदासीन रवैये को “चौंकाने वाली संवेदनहीनता” (Appalling Apathy) करार दिया।

न्यायमूर्ति शर्मिला यू. देशमुख और न्यायमूर्ति नीरज पी. धोटे की खंडपीठ हरीश भीमराव कांबले द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL), अंतरिम आवेदन और अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

पीठ की तीखी टिप्पणियां

अदालत ने बच्चों की जान जोखिम में डालकर स्कूल जाने की स्थिति पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए कहा: कक्षा 6 में पढ़ने वाला एक छोटा बच्चा शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन 30 किलोमीटर तक की यात्रा करता है और परिवहन सुविधा के अभाव में 4 घंटे पैदल चलता है। राज्य सरकार की संवेदनहीनता स्तब्ध करने वाली है। शिक्षा के लिए इतनी लंबी दूरी तय करने वाले छात्रों के लिए न्यूनतम परिवहन सुविधा तक उपलब्ध न कराकर बच्चों की सुरक्षा की पूरी तरह अनदेखी की गई है।

मुख्य बिंदु व जनहित याचिका की मांगें

  • 228 छात्रों पर जंगली जानवरों का खतरा: 8 गांवों के 228 छात्र 5 अलग-अलग स्कूलों में पढ़ने जाते हैं और रास्ते में लगातार जंगली जानवरों (बाघ, तेंदुए आदि) के हमलों के गंभीर जोखिम का सामना करते हैं।
  • 2 अप्रैल के अदालती आदेश की अवहेलना: हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल को ही निर्देश दिया था कि जिला कलेक्टर और वन विभाग 7 दिनों के भीतर जोखिम वाले स्कूलों की पहचान करें और बच्चों के लिए सुरक्षित परिवहन व समर्पित क्विक रिस्पांस टीम (RRT) की तैनाती करें।
  • एक भी कदम न उठाने पर नाराजगी: 19 अगस्त की सुनवाई में अदालत ने पाया कि 2 अप्रैल के आदेश के बावजूद न तो खतरनाक स्कूलों की पहचान की गई, न बस/वाहन लगाए गए और न ही प्रशासन ने कोई अनुपालन हलफनामा दाखिल किया।
  • RTE कानून और संविधान के तहत सुरक्षा का दायित्व: याचिकाकर्ता ने आरटीई (RTE) नियमावली के नियम 6, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 38V और संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) का हवाला देते हुए छात्रों की सुरक्षा और शित्तूर-वारुण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर एक एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस तैनात करने की मांग की है।

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उच्च न्यायालय का अंतिम निर्देश और चेतावनी

पीठ ने जिला कलेक्टर और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताते हुए आदेश दिया:

  1. एक सप्ताह में स्पष्टीकरण हलफनामा: जिला कलेक्टर और वन विभाग को 2 अप्रैल के आदेश का पालन न करने के कारणों पर एक सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया।
  2. सख्त न्यायिक कार्रवाई की चेतावनी: अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि अधिकारियों का स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं पाया गया, तो अदालत उनके खिलाफ बेहद सख्त कदम उठाने के लिए बाध्य होगी।

मामले की मुख्य पृष्ठभूमि और हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणियां

  1. बच्चों की जान को जोखिम और प्रतिदिन 4 घंटे पैदल सफर
    • याचिका के अनुसार, सह्याद्रि टाइगर रिजर्व क्षेत्र के 8 गांवों के 228 छात्र 5 अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाई के लिए जाते हैं।
    • क्षेत्र में जंगली जानवरों (बाघ, तेंदुए आदि) के हमलों का लगातार खतरा बना रहता है। परिवहन की कोई सुविधा न होने के कारण 6ठी कक्षा के छोटे बच्चों को 30 किलोमीटर तक की दूरी तय करने के लिए रोजाना 4 घंटे पैदल चलना पड़ता है।
    • हाईकोर्ट की टिप्पणी: “6ठी कक्षा का बच्चा पढ़ने के लिए रोजाना 4 घंटे पैदल चलने को मजबूर है। राज्य सरकार की उदासीनता स्तब्ध करने वाली है। शिक्षा के लिए इतनी लंबी दूरी तय करने वाले बच्चों की सुरक्षा की सरकार को कोई चिंता नहीं है।”
  2. 2 अप्रैल के अदालती आदेशों की अनदेखी
    • हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल 2026 को ही अंतरिम आदेश जारी कर जिला कलेक्टर और वन विभाग को 7 दिनों के भीतर खतरनाक स्कूलों की पहचान करने के निर्देश दिए थे।
    • कोर्ट ने आदेश दिया था कि बच्चों के आने-जाने के समय (सुबह 6 से शाम 6 बजे तक) रैपिड रिस्पांस टीम (RRT) के संरक्षण में सुरक्षित स्कूल वाहन चलाए जाएं और एंबुलेंस की व्यवस्था की जाए।
    • 19 अगस्त की सुनवाई में कोर्ट ने पाया कि महीनों बीत जाने के बाद भी जिला प्रशासन और वन विभाग ने एक भी निर्देश का पालन नहीं किया और न ही अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दाखिल किया।
  3. शिक्षा के अधिकार (RTE Rules) और जीवन के अधिकार (Article 21) का उल्लंघन
    • याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि RTE नियमों के तहत सुरक्षित स्कूल मार्ग प्रदान करना राज्य की वैधानिक जिम्मेदारी है।
    • इसके अलावा, संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life) और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 38V के तहत नागरिकों को वन्यजीवों के खतरों से बचाना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है।

हाईकोर्ट की कड़ी चेतावनी

  • एक सप्ताह के भीतर जवाब-तलब: कोर्ट ने जिला कलेक्टर और वन विभाग को एक सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल कर यह बताने का आदेश दिया है कि 2 अप्रैल के आदेश का पालन क्यों नहीं किया गया।
  • कड़े अदालती एक्शन की चेतावनी: पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि अधिकारियों का स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं रहा, तो अदालत अवमानना याचिका के तहत उनके खिलाफ सख्त न्यायिक कार्रवाई करेगी।
  • मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त 2026 तय की गई है।

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