Sunday, August 23, 2026
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Right to Marry: विवाह का अधिकार एक मानवाधिकार है; मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 में संशोधन की आवश्यकता बताई

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
पीठन्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति
मुख्य प्रावधानहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 15 (Section 15)
प्रमुख सिद्धांत‘Right to Marry’ एक मानवाधिकार है; स्टे (Stay) के बिना केवल अपील लंबित होना पुनर्विवाह में बाधक नहीं बनना चाहिए।

चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने तलाक के बाद पुनर्विवाह (Remarriage) से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर पुनर्विचार का आह्वान करते हुए कहा है कि विवाह का अधिकार एक बुनियादी मानवाधिकार (Human Right) है। अदालत ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति को तलाक की डिक्री के खिलाफ अपील लंबित रहने के कारण वर्षों तक पुनर्विवाह के लिए अनिश्चितता में इंतजार करने को मजबूर नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम. डी. सुमति की खंडपीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 15 में विधायी संशोधन का सुझाव दिया और पत्नी द्वारा पुनर्विवाह कर लिए जाने के बाद पति की अपील को निष्प्रभावी (Infructuous) मानते हुए खारिज कर दिया।

पीठ की मुख्य टिप्पणी एवं संशोधन का सुझाव

अदालत ने 13 अगस्त 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा: शर्तों के अधीन ही सही, विवाह का अधिकार एक मानवाधिकार है… हमारा सम्मानपूर्वक सुझाव है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 में संशोधन की आवश्यकता है। केवल समय-सीमा के भीतर अपील दायर कर देना ही पर्याप्त नहीं होना चाहिए, बल्कि अपीलकर्ता को इसके बाद दो महीने के भीतर तलाक की डिक्री पर अंतरिम रोक (Interim Stay) भी प्राप्त करनी चाहिए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह कानून में स्वयं ऐसी दो महीने की शर्त नहीं जोड़ रही है क्योंकि यह वैधानिक प्रावधान को फिर से लिखने जैसा होगा, बल्कि वह विधायिका को संशोधन का सुझाव दे रही है। पीठ ने रेखांकित किया कि वैवाहिक अपीलों के निपटारे में सालों लग जाते हैं और किसी वैध पुनर्विवाह को लंबी अपीलीय प्रक्रिया के अनिश्चित परिणाम पर निर्भर छोड़ना न्यायसंगत नहीं है।

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मामले की पृष्ठभूमि

  • विवाह और पारिवारिक विवाद: पक्षकारों का विवाह 3 जून 2001 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था और उनके दो बच्चे हैं। 15 अगस्त 2015 को पत्नी बच्चों के साथ ससुराल छोड़कर अलग रहने लगी।
  • पारिवारिक अदालत का तलाक आदेश (मार्च 2021): पत्नी ने क्रूरता और परित्याग (Cruelty and Desertion) के आधार पर पारिवारिक अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसने 3 मार्च 2021 को तलाक की डिक्री मंजूर कर दी।
  • पति की अपील और प्रक्रियागत देरी: पति ने हाईकोर्ट में समय पर अपील दाखिल की, लेकिन सुनवाई में पैरवी न होने के कारण अपील 5 नवंबर 2025 को खारिज (Dismissed for non-prosecution) हो गई। बाद में 30 मार्च 2026 को अपील को दोबारा बहाल (Restore) कराया गया।
  • पत्नी का पुनर्विवाह: तलाक की डिक्री पर कोई अंतरिम रोक न होने के कारण पत्नी ने 27 अगस्त 2021 को पुनर्विवाह कर लिया, जिसे 2 सितंबर 2021 को पंजीकृत भी करा लिया गया।

उच्च न्यायालय के प्रमुख निष्कर्ष

  1. धारा 15 और सुप्रीम कोर्ट की नजीरें: उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों (एन. राजेंद्रन बनाम एस. वल्ली, कृष्णावेणी राय बनाम पंकज राय और लीला गुप्ता बनाम लक्ष्मी नारायण) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब तक तलाक की डिक्री पर कोई स्टे नहीं होता, तब तक डिक्री प्रभावी रहती है। इसके अलावा, जब कोई अपील पैरवी के अभाव (Default) में खारिज हो जाती है, तो धारा 15 के तहत पुनर्विवाह पर लगी रोक समाप्त हो जाती है।
  2. क्रूरता और परित्याग के आधार की पुष्टि: हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत के निष्कर्षों को सही ठहराया। अदालत ने पाया कि पति द्वारा पत्नी के चरित्र पर संदेह करना, सुरक्षा गार्ड से पूछताछ करना और फोन पर बात करने को लेकर बेटी से पूछताछ करना मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। साथ ही, पत्नी के घर छोड़ने के बाद पति द्वारा सुलह का कोई प्रयास न करना और बच्चों के भरण-पोषण की उपेक्षा करना ‘संरचनात्मक परित्याग’ (Constructive Desertion) है।
  3. अपील निष्प्रभावी: चूंकि पत्नी ने वैध रूप से दूसरा विवाह कर लिया था और मूल तलाक का आदेश कानूनी रूप से सही पाया गया, इसलिए अदालत ने पति की अपील को निष्प्रभावी मानकर खारिज कर दिया।

मामले के मुख्य बिंदु और हाईकोर्ट के सुझाव

  1. धारा 15 (Section 15, HMA) में संशोधन का सुझाव
    • वर्तमान नियम: धारा 15 के तहत तलाक के बाद पक्षकार तब तक दूसरा विवाह नहीं कर सकते जब तक कि अपील की अवधि समाप्त न हो जाए या दायर अपील खारिज न हो जाए।
    • कोर्ट का सुझाव: पीठ ने सुझाव दिया कि संसद को धारा 15 में संशोधन करना चाहिए। केवल निर्धारित समय सीमा के भीतर अपील दायर करना ही पुनर्विवाह को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं होना चाहिए, बल्कि अपीलकर्ता को अपील दायर करने के 2 महीने के भीतर तलाक की डिक्री पर अंतरिम स्थगन (Interim Stay) हासिल करना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
  2. अनिश्चितता से राहत और मानवाधिकार
    • अदालत ने टिप्पणी की कि वैवाहिक मामलों की अपीलों को तय होने में वर्षों लग जाते हैं। किसी के पुनर्विवाह के अधिकार को इतने वर्षों तक अधर में लटका कर रखना न्यायसंगत नहीं है।
    • चूंकि पति की अपील प्रक्रिया के दौरान खारिज हो गई थी और इस बीच पत्नी ने अगस्त 2021 में दूसरा विवाह कर लिया था, इसलिए कोर्ट ने अपील को निष्प्रभावी (Infructuous) माना।
  3. क्रूरता और परित्याग के निष्कर्षों को रखा बरकरार
    • हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले से सहमति जताई कि पति द्वारा पत्नी के चरित्र पर संदेह करना, गार्ड से पूछताछ करना और बेटी के फोन कॉल की निगरानी करना मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) की श्रेणी में आता है।
    • पत्नी द्वारा अगस्त 2015 में घर छोड़ने के बाद पति द्वारा उसे वापस लाने का कोई प्रयास न करना और बच्चों के भरण-पोषण से मुंह मोड़ना ‘परित्याग’ (Constructive Desertion) को साबित करता है।
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