Sunday, August 23, 2026
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Constructive Civic Participation: रेलवे सब-वे के लिए संघर्ष करने वाले तमिलनाडु के नागरिक की सुप्रीम कोर्ट ने की सराहना, क्यों हुआ जरा पढ़ें

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • सच्ची जनहित याचिका का उदाहरण: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आजकल PIL का इस्तेमाल निजी स्वार्थों के लिए अधिक हो रहा है, लेकिन यह मामला वास्तविक जनहित और नागरिक जागरूकता का एक बेहतरीन उदाहरण है।
  • 20 साल पुरानी समस्या: वाणियमबाडी और केथनदापट्टी रेलवे स्टेशनों के बीच का रेलवे फाटक शहर को दो भागों में बांटता है। 2007 से यह परियोजना ओवरब्रिज से अंडरब्रिज और अब सबवे के रूप में लटकी हुई थी।
  • 6 महीने की समय सीमा: नॉर्दर्न/नॉर्दर्न रेलवे (Southern Railway) को जमीन मिलते ही टेंडर के बाद 6 महीने के भीतर अपना निर्माण कार्य पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं।
  • तमिलनाडु सरकार को आदेश: राज्य सरकार को भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में तेजी लाने और आवश्यक स्वीकृतियां जल्द से जल्द प्रदान करने का निर्देश दिया गया है।
  • सकारात्मक नागरिक भागीदारी की मिसाल: शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता मदुरै फारूक अहमद ने कई वर्षों तक किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि वानियमबाड़ी के आम निवासियों और दैनिक यात्रियों को राहत दिलाने के लिए यह मुद्दा उठाया।
  • निजी स्वार्थ वाली पीआईएल (PIL) से अलग: पीठ ने टिप्पणी की कि आजकल अदालतों में जनहित याचिका के नाम पर अक्सर ऐसी याचिकाएं आती हैं जो किसी वास्तविक सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करतीं, लेकिन वर्तमान मामला एक सच्चे जनहित का उदाहरण है।
  • परियोजना को पूरा करने की समय-सीमा: सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को रुकी हुई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में तेजी लाने और दक्षिणी रेलवे (Southern Railway) को जमीन मिलने के 6 महीने के भीतर अपना काम पूरा करने का निर्देश दिया।

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने वानियमबाड़ी में रेलवे सबवे के निर्माण के लिए वर्षों तक लगातार कानूनी संघर्ष करने वाले तमिलनाडु के एक नागरिक के प्रयासों की सराहना करते हुए इसे “सकारात्मक नागरिक भागीदारी” का उत्कृष्ट उदाहरण बताया है [मदुरै फारूक अहमद बनाम प्रमुख सचिव, सरकार एवं अन्य]।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वार्थ से परे हटकर समुदाय के व्यापक हित के लिए सार्वजनिक प्राधिकारियों और अदालतों से संवाद बनाए रखने वाले सजग नागरिक लोकतंत्र की वास्तविक ताकत हैं।

मामले की पृष्ठभूमि और 20 साल का इंतजार

  • समस्या का मूल: यह मामला वानियमबाड़ी और केथंडापट्टी रेलवे स्टेशनों के बीच स्थित एक लेवल क्रॉसिंग से जुड़ा है। यह रेलवे लाइन वानियमबाड़ी शहर को पूर्वी और पश्चिमी दो हिस्सों में विभाजित करती है, जिसके कारण बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों और यात्रियों को आवागमन में गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
  • 2007 से योजनाओं में बदलाव:
    • नवंबर 2007 में तमिलनाडु सरकार ने ₹13 करोड़ की अनुमानित लागत से दक्षिणी रेलवे के साथ 50-50 लागत साझाकरण आधार पर रोड ओवर ब्रिज (ROB) के निर्माण की प्रशासनिक मंजूरी दी थी।
    • बाद में घनी आबादी वाले क्षेत्र में भारी भूमि अधिग्रहण और अत्यधिक लागत को देखते हुए परियोजना को रोड अंडर ब्रिज (RUB) और अंततः ‘लिमिटेड यूज सबवे’ (Limited Use Subway) में बदल दिया गया।
  • मद्रास हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक: परियोजना में लगातार देरी होने पर फारूक अहमद ने मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका का निपटारा कर दिया कि इसे लंबित रखने के लिए निरंतर न्यायिक निगरानी की आवश्यकता होगी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

उच्च न्यायालय व रेलवे का पक्ष

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान:

  • दक्षिणी रेलवे का बयान: रेलवे ने अदालत को बताया कि टेंडर प्रक्रिया में 7 बोलीदाताओं ने भाग लिया है और राज्य सरकार द्वारा आवश्यक भूमि उपलब्ध कराते ही अनुबंध आवंटन के 6 महीने के भीतर रेलवे अपने हिस्से का निर्माण कार्य पूरा कर देगा।
  • 20 साल की देरी पर अदालत का संज्ञान: अदालत ने पाया कि यह जनहित परियोजना लगभग 20 वर्षों से विभिन्न रूपों में केवल फाइलों और चर्चाओं में अटकी रही है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश

  1. भूमि अधिग्रहण में तेजी: तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया गया कि वह लंबित भूमि अधिग्रहण और आवश्यक स्वीकृतियों को तेजी से पूरा करे।
  2. 6 महीने में निर्माण: अनुबंध आवंटन और जमीन मिलने के 6 महीने के भीतर दक्षिणी रेलवे अपना निर्माण कार्य पूरा करे।
  3. अनुपालन हलफनामा: राज्य सरकार और रेलवे दोनों को 8 महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

इस मामले में याचिकाकर्ता मदुरै फारूक अहमद ने अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से (In-person) उपस्थित होकर अपनी बात रखी।

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जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  1. ‘सच्ची जनहित याचिका और पब्लिसिटी-सीकिंग में अंतर’
    • पीठ ने कहा कि आजकल रिट अदालतों में अक्सर ऐसी जनहित याचिकाएं (PILs) आती हैं, जिनका उद्देश्य किसी वास्तविक सार्वजनिक कारण को आगे बढ़ाना नहीं होता।
    • सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “अपीलकर्ता ने दिखाया है कि कैसे एक जागरूक और निष्ठावान नागरिक सार्वजनिक अधिकारियों और संवैधानिक अदालतों के साथ जिम्मेदार जुड़ाव के माध्यम से पूरे समुदाय को प्रभावित करने वाले मुद्दे पर ध्यान आकर्षित कर सकता है।”
  2. 20 साल से लंबित प्रोजेक्ट पर सख्त निर्देश
    • वाणियमबाडी और केथांदपत्ती रेलवे स्टेशनों के बीच का लेवल क्रॉसिंग शहर के दो हिस्सों को जोड़ता है, जिससे रोजाना हजारों लोग गुजरते हैं।
    • 2007 में यहां फ्लाईओभर (ROB) की मंजूरी मिली थी, जिसे बाद में भूमि अधिग्रहण और लागत के कारण ‘लिमिटेड यूज़ सबवे’ (Limited Use Subway) में बदल दिया गया।
  3. समयबद्ध निर्माण का आदेश
    • दक्षिण रेलवे (Southern Railway) ने कोर्ट को बताया कि निविदाएं (Tenders) प्राप्त हो चुकी हैं और जमीन मिलते ही 6 महीने में काम पूरा कर दिया जाएगा।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को रुकी हुई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया और प्रशासनिक अनुमतियों को तुरंत पूरा करने का निर्देश दिया। दोनों पक्षों को 8 महीने में अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दाखिल करने का आदेश दिया गया है।

Constructive Civic Participation: मामले के मुख्य तथ्य और कानूनी विश्लेषण

यह मामला वाणियमबाडी शहर में रेलवे ट्रैक के दोनों ओर रहने वाले हजारों नागरिकों और यात्रियों की आवाजाही से जुड़ा है। 2007 में तमिलनाडु सरकार ने ₹13 करोड़ की लागत से रोड ओवर ब्रिज (ROB) की प्रशासनिक स्वीकृति दी थी, लेकिन भारी भूमि अधिग्रहण और उच्च लागत के कारण परियोजना पहले अंडरब्रिज (RUB) और बाद में लिमिटेड यूज़ सबवे (Subway) में बदल गई।

याचिकाकर्ता मदुरै फारूक अहमद ने खुद (In Person) अदालत में अपना पक्ष रखते हुए इस परियोजना को तेजी से पूरा करने की मांग की। मद्रास हाईकोर्ट द्वारा याचिका का निपटारा किए जाने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने याचिकाकर्ता की सराहना करते हुए कहा: अपीलकर्ता ने यह दिखाया है कि कैसे एक सतर्क और निष्कपट नागरिक सार्वजनिक अधिकारियों और अदालतों के साथ जिम्मेदार जुड़ाव के माध्यम से समाज को प्रभावित करने वाले मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित कर सकता है। ऐसे प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और रेलवे अधिकारियों को आपसी समन्वय के साथ काम करने और 8 महीने के भीतर अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है।

Constructive Civic Participation: केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता
अपीलकर्तामदुरै फारूक अहमद (Madurai Farooq Ahmed – स्वयमेव पेश हुए)
विषयवाणियमबाडी (तमिलनाडु) में रेलवे सबवे निर्माण एवं भूमि अधिग्रहण
मुख्य बिंदुजनहित याचिकाओं के दुरुपयोग के बीच वास्तविक और रचनात्मक नागरिक प्रयासों की सराहना।
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