मुख्य निष्कर्ष (Key Findings)
- वयस्कता एकमात्र पैमाना नहीं: कोर्ट ने माना कि CrPC की धारा 125(1)(c) के तहत, यदि कोई संतान (चाहे वह वयस्क ही क्यों न हो) किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या विकलांगता के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो पिता उसकी देखभाल के लिए बाध्य है।
- पूर्व-निर्धारित समय सीमा गलत: फैमिली कोर्ट द्वारा यह पूर्व-निर्धारित करना गलत था कि 18 वर्ष का होते ही भरण-पोषण समाप्त हो जाएगा। इसे भविष्य में उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही तय किया जा सकता है।
- आदेश में संशोधन: हाईकोर्ट ने 18 साल की समय-सीमा वाली शर्त को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि यह राशि 18 वर्ष के बाद भी तब तक जारी रहेगी, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि बच्चा स्वयं कमाने और अपना गुजारा करने में सक्षम हो गया है।
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई बच्चा शारीरिक या मानसिक अक्षमता अथवा दिव्यांगता से पीड़ित है और स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो केवल 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने (वयस्क होने) मात्र से उसका गुजारा भत्ता पाने का अधिकार स्वतः समाप्त नहीं हो सकता। अदालत ने माना कि मुख्य विचारणीय बिंदु यह होगा कि क्या वयस्क होने के बाद वह व्यक्ति अपनी आजीविका कमाने और स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम है या नहीं।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकल पीठ ने दुर्ग फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया, जिसमें पिता को CrPC की धारा 125 के तहत केवल वयस्क होने तक ही ₹7,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
दिव्यांग संतान के भरण-पोषण के अधिकार पर अदालत ने कहा: “केवल वयस्क होने (18 वर्ष की आयु प्राप्त करने) को अपने आप में ऐसी परिस्थिति नहीं माना जा सकता जिसके परिणामस्वरूप उस बच्चे का भरण-पोषण पाने का अधिकार स्वतः समाप्त हो जाए, जो किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या दिव्यांगता से पीड़ित है और स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है।”
अदालत ने आगे रेखांकित किया: “प्रासंगिक विचार यह होगा कि क्या वयस्कता प्राप्त करने के बाद ऐसा व्यक्ति स्वयं का भरण-पोषण करने और अपनी आजीविका कमाने में सक्षम है। भरण-पोषण बंद करने के लिए आवेदक की आयु ही एकमात्र निर्धारक कारक नहीं हो सकती।”
मामले की पृष्ठभूमि
- आवेदक की स्थिति: आवेदक ‘ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर’ (Autism Spectrum Disorder) और ‘स्पीच डिसऑर्डर’ (Speech Disorder) से पीड़ित है, जिसके कारण उसे विशेष शिक्षा, निरंतर देखभाल और नियमित चिकित्सा सहायता की आवश्यकता है।
- याचिकाकर्ता की दलील: आवेदक की ओर से तर्क दिया गया कि उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए वयस्क होने के बाद भी उसे आर्थिक सहायता और देखभाल की आवश्यकता रहेगी। इसलिए, जब तक वह अपनी शारीरिक या मानसिक स्थिति के कारण भरण-पोषण करने में असमर्थ रहता है, तब तक उसे गुजारा भत्ता मिलना चाहिए।
- फैमिली कोर्ट का आदेश: दुर्ग की कुटुंब अदालत ने ऑटिज्म और स्पीच डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे को उसके पिता से ₹7,000 प्रतिमाह भरण-पोषण दिलाने का आदेश दिया था, लेकिन शर्त लगाई थी कि यह राशि केवल उसके 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक ही देय होगी।
- पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision): बच्चे ने अपनी माँ के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया कि उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति को देखते हुए उसे वयस्क होने के बाद भी निरंतर देखभाल, विशेष शिक्षा और चिकित्सा सहायता की आवश्यकता रहेगी। इसलिए जब तक वह आत्मनिर्भर नहीं होता, तब तक भरण-पोषण जारी रहना चाहिए।
- भरण-पोषण की राशि: याचिकाकर्ता ने राशि बढ़ाने की भी मांग की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत द्वारा तय ₹7,000 की राशि को न्यायसंगत मानते हुए उसमें बदलाव करने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट द्वारा दिए गए मुख्य आधार
- स्वतः समाप्ति का पूर्व-निर्धारण अनुचित: हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट का यह पूर्व-निर्धारित करना उचित नहीं था कि 18 वर्ष की आयु होते ही भरण-पोषण बंद हो जाएगा। इसका मूल्यांकन उस समय उपलब्ध परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।
- राशि में कोई बदलाव नहीं: भरण-पोषण की ₹7,000 प्रति माह की राशि को बढ़ाने की मांग पर अदालत ने माना कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि में कोई स्पष्ट अवैधता या विकृति नहीं है, इसलिए इसमें संशोधन की आवश्यकता नहीं है।
- शर्त को हटाया गया: अदालत ने आदेश से उस प्रतिबंधात्मक शर्त को हटा दिया, जिसके तहत भरण-पोषण को केवल वयस्क होने तक सीमित किया गया था।
अंतिम आदेश
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि:
- ₹7,000 प्रति माह की भरण-पोषण राशि आवेदक के वयस्क होने के बाद भी निरंतर जारी रहेगी।
- यह राशि तब तक देय होगी जब तक कि साक्ष्यों से यह साबित न हो जाए कि आवेदक अपनी आजीविका कमाने और स्वयं का भरण-पोषण करने में पूरी तरह सक्षम हो गया है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने अपने आदेश में कहा: “किसी ऐसे बच्चे के मामले में जो शारीरिक या मानसिक असामान्यता या विकलांगता से पीड़ित है और अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, केवल वयस्कता की आयु प्राप्त कर लेना ही स्वतः भरण-पोषण का अधिकार समाप्त होने का आधार नहीं बन सकता। मुख्य विचारणीय बात यह होगी कि क्या वह व्यक्ति आजीविका कमाने में सक्षम है या नहीं।”
Child Maintenance: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Chhattisgarh High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा (Chief Justice Ramesh Sinha) |
| कानून/धारा | दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 एवं फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 19(4) |
| बच्चे की स्थिति | ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (Autism Spectrum Disorder) एवं वाक् विकार (Speech Disorder) |
| अदालत का फैसला | 18 वर्ष की पाबंदी हटाई; बच्चा जब तक कमाने योग्य नहीं होता, तब तक पिता को ₹7,000/माह देना होगा। |

