Friday, August 28, 2026
HomeLaw Firms & Assoc.Lack of Integrity: 8 साल बाद न्यायिक अधिकारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का...

Lack of Integrity: 8 साल बाद न्यायिक अधिकारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश किया रद्द; सजा को बताया अत्यधिक कठोर व असंगत, पढ़िए आदेश

उच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष (Key Findings)

  • कोई भ्रष्टाचार या नैतिक पतन नहीं: पीठ ने स्पष्ट किया कि सिद्ध हुए आरोपों में भ्रष्टाचार (Corruption), ईमानदारी की कमी (Lack of Integrity), नैतिक पतन (Moral Turpitude) या व्यक्तिगत लाभ के लिए पद के दुरुपयोग का कोई आरोप नहीं था।
  • कम उम्र और प्रोबेशन की स्थिति: घटना के समय याचिकाकर्ता बहुत युवा न्यायिक अधिकारी थे, जिनका पहला प्रशिक्षण चरण ही पूरा हुआ था और वे प्रोबेशन पर थे।
  • ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत: कोर्ट ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द कर पुनः सेवा में लेने का आदेश दिया, लेकिन 8 साल तक बाहर रहने की अवधि का कोई पिछला बकाया वेतन (Back Wages) नहीं देने का फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि इतने वर्षों तक पद से दूर रहना ही सिद्ध आरोपों के लिए अपने आप में पर्याप्त सजा है।
  • प्रशिक्षण पूरा करने का निर्देश: जज की वरिष्ठता (Seniority) उनके पुनः कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से तय होगी और उन्हें बचा हुआ न्यायिक प्रशिक्षण पूरा करना होगा।

हैदराबाद: तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक निचली अदालत के जज को जबरन अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) देने के वर्ष 2018 के आदेश को रद्द कर दिया है।

न्यायमूर्ति पी. सैम कोशी और न्यायमूर्ति नरसिंह राव नंदिकोंडा की खंडपीठ ने 18 अगस्त को यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार, सत्यनिष्ठा की कमी, नैतिक अधमता (Moral Turpitude) या व्यक्तिगत लाभ के लिए पद के दुरुपयोग का कोई आरोप नहीं था। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ साबित हुए कदाचार के मुकाबले दी गई सजा “अत्यधिक कठोर और चौंकाने वाली हद तक असंगत” (Unduly Harsh and Shockingly Disproportionate) थी। उच्च न्यायालय ने उन्हें सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है, हालांकि उन्हें सेवा से बाहर रहने की अवधि का पिछला वेतन (Back Wages) नहीं मिलेगा।

उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां

सजा की मात्रा और आनुपातिकता पर अदालत ने कहा:

“आरोपी अधिकारी पर लगाई गई सजा साबित हुए कदाचार के मुकाबले अत्यधिक कठोर और चौंकाने वाली हद तक असंगत है। आरोपों में भ्रष्टाचार, सत्यनिष्ठा की कमी, नैतिक पतन, व्यक्तिगत लाभ के लिए न्यायिक पद के दुरुपयोग या किसी बेईमान इरादे का कोई आरोप शामिल नहीं है।”

न्यायिक आचरण के मानकों पर पीठ ने रेखांकित किया: “सजा को रद्द करने का अर्थ न्यायिक अधिकारी के आचरण को सही ठहराना नहीं है। प्रत्येक न्यायिक अधिकारी का आचरण—अदालत के भीतर और बाहर—हमेशा गरिमा, संयम, निष्पक्षता और शालीनता के उच्चतम मानकों के अनुरूप होना चाहिए। बदलते समाज के नाम पर न्यायिक आचरण के मानकों को शिथिल नहीं किया जा सकता।”

Also Read; Title Of Law Firm: लॉ फर्म का नाम पारिवारिक संपत्ति नहीं…सोमब्रत मंडल को ‘फॉक्स एंड मंडल’ से संबंध का दावा करने से स्थायी रूप से रोका

मामले की पृष्ठभूमि: 2014 का चेकपोस्ट विवाद

  • परिवीक्षाधीन अधिकारी: याचिकाकर्ता ने आंध्र प्रदेश न्यायिक सेवा में जूनियर सिविल जज के रूप में सेवा शुरू की थी और न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण के प्रथम चरण के बाद द्वितीय अतिरिक्त जूनियर सिविल जज के पद पर तैनात थे।
  • 18 मार्च 2014 की घटना: चुनाव आचार संहिता (Model Code of Conduct) के तहत जांच के दौरान पुलिसकर्मियों ने चेकपोस्ट पर उनकी आधिकारिक गाड़ी को रोका था। न्यायिक अधिकारी की पहचान उजागर होने पर पुलिसकर्मियों ने खेद भी जताया था, लेकिन कथित तौर पर जज ने उनके साथ अशिष्ट और अनुचित व्यवहार किया।
  • विभागीय जांच व सजा: उच्च न्यायालय ने अधिकारी के खिलाफ 6 आरोप (Articles of Charge) तय कर विभागीय जांच शुरू की। जांच अधिकारी ने केवल 2 आरोपों को साबित माना। हालांकि, अनुशासनात्मक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) ने असहमति जताते हुए 4 जनवरी 2018 को उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति की बड़ी सजा दे दी।
  • 2014 की घटना: मार्च 2014 में चुनाव के दौरान मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) के तहत पुलिस अधिकारियों ने जज के वाहन को चेक पोस्ट पर रोका था। आरोप था कि परिचय देने के बाद पुलिस द्वारा खेद जताने के बावजूद जज ने पुलिसकर्मियों के साथ अभद्र और असंसदीय व्यवहार किया।
  • जांच अधिकारी की रिपोर्ट: जांच अधिकारी (Inquiry Officer) ने 6 में से केवल 2 आरोपों को सिद्ध माना था। हालांकि, अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने असहमति जताते हुए अन्य आरोपों को भी सिद्ध मान लिया और 4 जनवरी 2018 को उन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया।
  • हाईकोर्ट द्वारा जांच का मूल्यांकन: हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस चेकिंग से जुड़ा व्यवहार दुराचार (Misconduct) की श्रेणी में आता है क्योंकि एक जज से उच्च स्तर के संयम और गरिमा की अपेक्षा की जाती है। लेकिन टोल कर्मचारियों को रोकने या अदालत से अनुपस्थित रहने से जुड़े अन्य आरोपों को खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट का साक्ष्यों का विश्लेषण

  1. दो आरोपों की पुष्टि: अदालत ने पाया कि चेकपोस्ट पर पुलिसकर्मियों के साथ अशिष्ट व्यवहार का कदाचार साबित हुआ था। एक जिम्मेदार लोकसेवक और जज के रूप में उनसे पुलिस के साथ सहयोग और गरिमापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा थी।
  2. अन्य आरोपों की अस्वीकृति: टोल कर्मचारियों को कथित रूप से रोकने और अदालत से अनुपस्थित रहने के अन्य आरोपों पर जांच अधिकारी की रिपोर्ट से असहमति जताने का अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास कोई ठोस आधार या साक्ष्य नहीं था।
  3. कम उम्र और करियर का शुरुआती चरण: अदालत ने इस बात पर विचार किया कि वे करियर के बिल्कुल शुरुआती चरण (प्रोबेशन) में थे और बिना किसी बेईमान इरादे के हुए इस आचरण के लिए ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ जैसी चरम सजा कानूनन टिकने योग्य नहीं है।

अंतिम आदेश व बहाली की शर्तें

तेलंगाना उच्च न्यायालय ने 4 और 5 जनवरी 2018 के अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेशों को रद्द करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  • सेवा में बहाली: न्यायिक अधिकारी को उनके पद पर तत्काल बहाल किया जाए।
  • नो वर्क, नो पे (No Work, No Pay): उन्हें सेवा से बाहर रहे 8 वर्षों का पिछला वेतन (Back Wages) या कोई मौद्रिक/सेवा लाभ नहीं मिलेगा। अदालत ने टिप्पणी की कि इतने वर्षों तक पद से दूर रहना ही साबित कदाचार के लिए पर्याप्त दंड माना जा सकता है।
  • वरिष्ठता व शेष प्रशिक्षण: उनकी वरिष्ठता (Seniority) बहाली की तारीख से तय की जाएगी और उन्हें अपने न्यायिक प्रशिक्षण का शेष चरण पूरा करना होगा।

तेलंगाना हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति पी. सैम कोशी और न्यायमूर्ति नरसिंह राव नंदीकोंडा की पीठ ने अपने आदेश में कहा: “दी गई सजा स्थापित दुराचार की तुलना में अत्यधिक कठोर और चौंकाने वाली रूप से असंगत है। आरोपों में भ्रष्टाचार, निष्ठा की कमी या नैतिक पतन जैसी कोई बात शामिल नहीं है। यद्यपि बेंच पर और बेंच से बाहर हर न्यायिक अधिकारी का आचरण हमेशा गरिमा, संयम और निष्पक्षता के उच्चतम मानकों के अनुरूप होना चाहिए।”

एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालततेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court)
पीठासीन पीठन्यायमूर्ति पी. सैम कोशी एवं न्यायमूर्ति नरसिंह राव नंदीकोंडा
याचिकाकर्ताद्वितीय अतिरिक्त जूनियर सिविल जज (आंध्र प्रदेश न्यायिक सेवा)
विवाद का कारण2014 में पुलिस चेकिंग के दौरान दुर्व्यवहार का आरोप व अनुशासनात्मक कार्रवाई
अदालत का अंतिम आदेश2018 का compulsory retirement आदेश रद्द; सेवा में बहाली, लेकिन पिछला वेतन नहीं।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
light rain
32 ° C
32 °
32 °
74 %
2.6kmh
87 %
Fri
34 °
Sat
33 °
Sun
31 °
Mon
30 °
Tue
28 °

Recent Comments