Monday, September 14, 2026
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Defame Matter: सद्भावना से की गई पुलिस शिकायत मानहानि नहीं है; गुजरात हाईकोर्ट ने मानहानि परिवाद खारिज करने के फैसले को रखा बरकरार

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

  • बुनियादी साक्ष्यों का अभाव (Evidentiary Gap): हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने वह मूल पुलिस आवेदन ही कोर्ट के समक्ष पेश नहीं किया, जिसके आधार पर मानहानि का दावा किया जा रहा था:“स्पष्ट रूप से, विवादित भूमि के संबंध में प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा दिया गया कथित मूल आवेदन याचिकाकर्ता द्वारा रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया। इसलिए, वह मुख्य आधार (Edifice) ही गायब है, जिस पर याचिकाकर्ता मानहानि का दावा कर रहा है।”गुजरात हाईकोर्ट
  • आवश्यक पक्षकार को न जोड़ना: अदालत ने पाया कि जिस व्यक्ति (चंपक वसावा) पर फेसबुक पर आवेदन और तस्वीरें अपलोड करने का आरोप था, उसे मजिस्ट्रेट के सामने मामले में पक्षकार (Impleaded) ही नहीं बनाया गया था।
  • गुड फेथ (Good Faith) में शिकायत मानहानि नहीं: अदालत ने यह भी माना कि यदि कोई व्यक्ति अपने कानूनी अधिकारों की रक्षा या शिकायत निवारण के लिए पुलिस के समक्ष आवेदन देता है, तो उसे सद्भावना से की गई कार्रवाई माना जाता है और यह सीधे तौर पर मानहानि के दायरे में नहीं आता।

अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट ने आपराधिक मानहानि (Defamation under Section 499/500 IPC) के आवश्यक विधिक तत्वों, सबूत के भार और पुलिस शिकायतों की कानूनी स्थिति पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति जे.एल. ओडेदरा की एकल पीठ ने नर्मदा जिले के देदियापाड़ा स्थित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) और नर्मदा सत्र न्यायालय द्वारा परिवाद खारिज करने के समवर्ती आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका को विचारहीन मानते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी कानूनी प्राधिकारी या पुलिस के समक्ष सद्भावपूर्वक दिया गया शिकायती आवेदन मानहानि की श्रेणी में नहीं आता। इसके अलावा, जिस मूल शिकायत के आधार पर मानहानि का दावा किया गया हो, उसे रिकॉर्ड पर पेश न करना और सामग्री को सोशल मीडिया पर प्रसारित करने वाले व्यक्ति को आरोपी न बनाना मानहानि के मुकदमे की पूरी बुनियाद को ही ध्वस्त कर देता है [विजयभाई जयसिंगभाई वसावा बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य]।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. कथित मानहानिकारक आवेदन ही रिकॉर्ड से नदारद केस में साक्ष्य की बुनियादी खामी (Evidentiary Gap) को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा: “स्पष्ट रूप से, प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा विवादित भूमि के संबंध में पुलिस को दिया गया कथित मूल आवेदन याचिकाकर्ता द्वारा रिकॉर्ड पर प्रस्तुत ही नहीं किया गया। इसे पुनरीक्षण (Revision) कार्यवाहियों के दौरान भी रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया। इसलिए, वह मूल आधार (Edifice) ही गायब है जिसके दम पर याचिकाकर्ता यह दावा कर रहा है कि प्रतिवादी संख्या 2 ने उसकी मानहानि की है।”

2. आवश्यक पक्षकारों का अभाव और समाचार रिपोर्टों में नाम न होना

  • सोशल मीडिया प्रचारक पक्षकार नहीं: याचिकाकर्ता का आरोप था कि वसावा चंपक नामक व्यक्ति ने पुलिस आवेदन और तस्वीरें फेसबुक पर अपलोड की थीं। अदालत ने नोट किया कि उस व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद में पक्षकार (आरोपी) बनाया ही नहीं गया था।
  • समाचार पत्रों में नाम का अभाव: ‘गुजरात समाचार’ और ‘संदेश’ में छपी जिन खबरों को आधार बनाया गया, उनमें याचिकाकर्ता का नाम तक नहीं था और न ही यह साबित हुआ कि वे खबरें प्रतिवादी संख्या 2 के कहने पर प्रकाशित कराई गई थीं।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (नर्मदा जिले का भूमि विवाद)

  • विवादित भूमि: नर्मदा जिले के देदियापाड़ा तालुका स्थित बंदिशेरवान गांव में कंपार्टमेंट नंबर 396, प्लॉट नंबर 2 (रकबा 2 हेक्टेयर 60 वर्ग मीटर) की भूमि को लेकर विजयभाई वसावा (याचिकाकर्ता) और राजेशभाई वसावा (प्रतिवादी संख्या 2) के बीच विवाद था।
  • परिवाद का आधार: याचिकाकर्ता ने आईपीसी की धारा 500 (मानहानि) के तहत परिवाद दाखिल कर आरोप लगाया कि राजेशभाई ने पुलिस में झूठी शिकायत की थी कि याचिकाकर्ता और उसके साथियों के इशारे पर मवेशियों ने खेत में खड़ी फसल को चरकर नष्ट कर दिया।
  • सोशल मीडिया व प्रेस का आरोप: याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उक्त शिकायत को फेसबुक पर प्रसारित किया गया और स्थानीय समाचार पत्रों में छपवाया गया, जिससे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची।

निचली अदालतों के निष्कर्ष (CrPC धारा 203 के तहत निस्तारण)

  • एसीजेएम देदियापाड़ा का आदेश: मजिस्ट्रेट ने पाया कि मूल पुलिस शिकायत रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई है, समाचार पत्रों में याचिकाकर्ता का नाम नहीं है, और आरोप सही हैं या गलत यह पुलिस जांच का विषय है। अतः CrPC की धारा 203 (Dismissal of Complaint) के तहत परिवाद खारिज कर दिया गया।
  • सत्र न्यायालय का रुख: नर्मदा के सत्र न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए माना कि प्रथम दृष्टया मानहानि का कोई संज्ञेय आधार स्थापित नहीं हुआ है।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  1. निगरानी आदेशों की पुष्टि: उच्च न्यायालय ने माना कि निचली अदालतों द्वारा परिवाद को खारिज करने के फैसले में कोई प्रक्रियात्मक या वैधानिक त्रुटि नहीं है।
  2. याचिका खारिज: प्राथमिक साक्ष्यों के अभाव और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को देखते हुए आपराधिक मानहानि की जांच को पुनर्जीवित करने की मांग वाली याचिका पूरी तरह खारिज कर दी गई।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: आपराधिक पुनरीक्षण / विविध आवेदन (आपराधिक मानहानि परिवाद)
  • प्रासंगिक कानून: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 एवं धारा 500 (मानहानि); दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 203 (परिवाद की खारिजी)
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.एल. ओडेदरा (गुजरात उच्च न्यायालय)

Defame Matter: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतगुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति जे. एल. ओडेदरा (Justice J. L. Odedra)
संबंधित कानूनभारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 500 (मानहानि) और CrPC की धारा 203
मुख्य मुद्दाक्या पुलिस में की गई शिकायत और समाचार पत्रों की रिपोर्ट के आधार पर मानहानि का केस बनता है?
अदालत का फैसलायाचिका खारिज; मूल शिकायत रिकॉर्ड पर न होने और प्राथमिक साक्ष्यों के अभाव में मानहानि का केस नहीं बनता।
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