Monday, September 14, 2026
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Maintenance To Wife: कानूनन तलाकशुदा महिला भी भरण-पोषण की हकदार है जब तक वह पुनर्विवाह न कर ले; तलाक से पूर्व पत्नी के भरण-पोषण का दायित्व समाप्त नहीं होता

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

  • तलाकशुदा पत्नी भी कानूनी रूप से ‘पत्नी’ है: अदालत ने कहा कि कानून का स्पष्ट उद्देश्य है कि विवाह भंग होने से पति का वैधानिक कर्तव्य खत्म नहीं होता:“विवाह का विघटन, भले ही पति द्वारा हासिल की गई तलाक की डिक्री के जरिए हुआ हो, पूर्व पत्नी को भरण-पोषण देने के उसके वैधानिक दायित्व को स्वतः समाप्त नहीं करता, जब तक कि वह पुनर्विवाह न कर ले या अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।”कलकत्ता हाईकोर्ट
  • बालिग बेटी का भरण-पोषण भत्ता रद्द: कोर्ट ने पाया कि 2019 में याचिका दायर होने से पहले ही बेटी अक्टूबर 2017 में वयस्क (Major) हो चुकी थी। CrPC/BNSS के तहत एक बालिग बच्चा तभी भरण-पोषण का दावा कर सकता है जब वह किसी शारीरिक या मानसिक अक्षमता/विकलांगता के कारण अपना खर्च चलाने में असमर्थ हो। चूंकि बेटी स्वस्थ थी, इसलिए उसके लिए ₹2,000 का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर (Without Jurisdiction) माना गया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनविवाहित हिंदू बेटी पर्सनल लॉ के तहत सिविल कोर्ट में अलग से दावा कर सकती है।
  • 50% बकाया (Arrears) जमा करने की शर्त: कोर्ट ने पति की गिरफ्तारी/रिकवरी वारंट पर रोक लगाते हुए उसे निर्देश दिया कि वह केवल पत्नी के हिस्से के वास्तविक बकाया का 50% हिस्सा 4 सप्ताह के भीतर कोर्ट में जमा कराए।

कोलकाता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC की धारा 125 / BNSS की धारा 144) के तहत भरण-पोषण (Maintenance) के वैधानिक सिद्धांतों पर एक स्पष्ट फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति उदय कुमार की एकल पीठ ने पति की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए पत्नी के पक्ष में तय ₹1,500 प्रति माह के अंतरिम भरण-पोषण को बरकरार रखा, किंतु बालिग एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ बेटी के नाम पर दिए जा रहे ₹2,000 के मासिक भरण-पोषण को क्षेत्राधिकार से बाहर मानते हुए पूरी तरह निरस्त (Set Aside) कर दिया। अदालत ने दोहराया है कि विवाह विच्छेद (तलाक की डिक्री) हो जाने मात्र से पति का अपनी पूर्व पत्नी के प्रति भरण-पोषण का कानूनी दायित्व स्वतः समाप्त नहीं हो जाता, बशर्ते महिला ने पुनर्विवाह न किया हो और वह अपना खर्च वहन करने में असमर्थ हो।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. तलाक से वैधानिक भरण-पोषण का अधिकार समाप्त नहीं होता विधायिका के उद्देश्य और वैधानिक परिभाषा की व्याख्या करते हुए न्यायमूर्ति उदय कुमार ने कहा: “विधायिका की मंशा बिल्कुल स्पष्ट है: विवाह का विघटन—भले ही वह पति द्वारा प्राप्त एकपक्षीय (Ex-parte) डिक्री के माध्यम से हुआ हो—पूर्व पत्नी के भरण-पोषण के वैधानिक दायित्व को स्वतः समाप्त नहीं करता, बशर्ते वह अविवाहित (Unmarried) रहे और अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।”

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण कानून के तहत “पत्नी” (Wife) की परिभाषा में वह तलाकशुदा महिला भी शामिल है, जिसने दूसरा विवाह नहीं किया है।

2. बालिग और स्वस्थ संतान को CrPC धारा 125 के तहत भरण-पोषण नहीं

  • अदालत ने रेखांकित किया कि आपराधिक प्रक्रिया के तहत बालिग संतान (Major Child) केवल तभी भरण-पोषण की हकदार होती है जब वह किसी शारीरिक या मानसिक दुर्बलता अथवा चोट के कारण अपना भरण-पोषण करने में अक्षम हो।
  • चूंकि बेटी अक्टूबर 2017 में ही बालिग हो चुकी थी और पूरी तरह स्वस्थ थी, इसलिए 2019 के आदेश में उसे ₹2,000 प्रति माह देना क्षेत्राधिकार से परे (Wholly without jurisdiction) था।
  • हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अविवाहित हिंदू पुत्री हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) के तहत सक्षम दीवानी अदालत (Civil Court) में भरण-पोषण का स्वतंत्र दावा कर सकती है।

3. पुनरीक्षण (Revision) में ‘मिनी ट्रायल’ नहीं हो सकता

  • पति ने दावा किया था कि वह बेरोजगार है और अपनी वृद्ध मां की पेंशन पर जी रहा है, जबकि पत्नी ने उसके व्यवसाय जारी रखने का दावा किया।
  • अदालत ने माना कि आय और संपत्तियों से जुड़े विवादित तथ्यात्मक प्रश्नों का निस्तारण ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर होगा; पुनरीक्षण अदालत में ऐसा मिनी-ट्रायल संभव नहीं है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (1995 से 2026 तक का विवाद)

  • विवाह व पारिवारिक विवाद: पक्षकारों का विवाह 1995 में हुआ था और उनके दो बच्चे थे। 2018 में विवाद बढ़ने पर मारपीट और एसिड हिंसा के आरोपों में पुलिस केस दर्ज हुआ।
  • भरण-पोषण आदेश (2019): मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2019 को ₹3,500 प्रति माह का अंतरिम गुजारा भत्ता तय किया (पत्नी के लिए ₹1,500 और बेटी के लिए ₹2,000)।
  • एकपक्षीय तलाक (2022): पति ने अलग से विवाह विच्छेद की याचिका दाखिल की और 20 जून 2022 को एकपक्षीय तलाक की डिक्री प्राप्त कर ली (जिसे रद्द कराने की पत्नी की अर्जी लंबित है)।
  • एक्ज़ीक्यूशन व वारंट (2024): बकाया राशि जमा न होने पर ट्रायल कोर्ट ने पति के तलाक के आधार पर प्रक्रिया रोकने के तर्कों को खारिज कर दिया और अप्रैल 2024 में डिस्ट्रेस वारंट (Distress Warrants) जारी किए, जिसे पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश और बकाया राशि पर निर्देश

  1. पत्नी का भरण-पोषण बरकरार: पत्नी को ₹1,500 प्रति माह का अंतरिम गुजारा भत्ता मिलता रहेगा।
  2. बेटी का आदेश व वारंट रद्द: बेटी के ₹2,000 के भरण-पोषण, उससे जुड़े निष्पादन मामलों और डिस्ट्रेस वारंट को पूरी तरह निरस्त कर दिया गया।
  3. 50% वास्तविक बकाये का भुगतान:
    • अदालत ने पति के खिलाफ जारी दंडात्मक वारंट और निष्पादन प्रक्रिया पर इस शर्त के साथ रोक लगाई कि वह 4 सप्ताह के भीतर पत्नी के हिस्से के वास्तविक बकाये (Arrears) का 50% हिस्सा ट्रायल कोर्ट में जमा कराए।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (भरण-पोषण व निष्पादन आदेश को चुनौती)
  • प्रासंगिक कानून: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (एवं BNSS की धारा 144); हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20
  • पीठ: न्यायमूर्ति उदय कुमार (कलकत्ता उच्च न्यायालय)

Maintenance To Wife: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति उदय कुमार (Justice Uday Kumar)
संबंधित प्रावधानदंड प्रक्रिया संहिता (CrPC की धारा 125) / BNSS की धारा 144
मुख्य मुद्दाक्या तलाक (Divorce) के बाद पूर्व पत्नी और बालिग संतान भरण-पोषण के हकदार हैं?
अदालत का फैसलापत्नी का ₹1,500 भरण-पोषण बहाल; बालिग बेटी का ₹2,000 का भत्ता रद्द; 50% बकाया जमा करने का निर्देश।

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