हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
- ‘फंक्शनल टेस्ट’ (Function Test) का सिद्धांत: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत किसी संस्था के खिलाफ रिट जारी होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह संस्था सरकारी है या गैर-सरकारी, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि क्या विवादित कार्य किसी सार्वजनिक कर्तव्य (Public Duty/Function) से जुड़ा है।
- बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ नहीं है: पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के संगीता राय बनाम नई दिल्ली बार एसोसिएशन (2026) के फैसले का हवाला देते हुए कहा:“बार एसोसिएशन और उसके सदस्यों के बीच का संबंध संविदात्मक (Contractual) और उसके अपने नियमों के तहत विनियमित होता है। सदस्यता से जुड़ा कोई भी विवाद बार एसोसिएशन का सार्वजनिक कार्य नहीं माना जा सकता, जिससे कि यह मामला हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र में आ सके।” — इलाहाबाद हाईकोर्ट
- स्टेट और बार काउंसिल को पक्षकार बनाने से स्थिति नहीं बदलती: अदालत ने यह भी साफ किया कि याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और यूपी बार काउंसिल को प्रतिवादी (Opposite Parties) बनाया था, लेकिन चूंकि उनके खिलाफ कोई स्वतंत्र राहत या विफलता का आरोप नहीं था, इसलिए इससे याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
लखनऊ/प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोअर् ने बार एसोसिएशनों के आंतरिक विवादों और संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार की सीमाओं पर एक अत्यंत स्पष्ट और महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सेंट्रल बार एसोसिएशन, तहसील गोला गोकर्ण नाथ (जिला लखीमपुर खीरी) द्वारा अपने पूर्व अध्यक्ष को 1 वर्ष के लिए निष्कासित किए जाने के आदेश (प्रेस रिलीज) के खिलाफ दायर रिट याचिका को गैर-पोषणीय मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने व्यवस्था दी है कि किसी बार एसोसिएशन की सदस्यता (Membership) या किसी सदस्य के निलंबन/निष्कासन (Debarment) से जुड़ा विवाद विशुद्ध रूप से एक ‘निजी विवाद’ (Private Dispute) होता है और इसमें किसी सार्वजनिक कर्तव्य या लोक चरित्र (Public Character) का निर्वहन शामिल नहीं होता। परिणामस्वरूप, ऐसे आंतरिक विवादों को चुनौती देने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय (Maintainable) नहीं है।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. सदस्यता विवाद निजी प्रकृति का, कोई सार्वजनिक कार्य नहीं अनुच्छेद 226 के दायरे और ‘फंक्शन टेस्ट’ (Function Test) की व्याख्या करते हुए खंडपीठ ने कहा: “इस न्यायालय का यह मानना है कि वर्तमान रिट याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत विचारणीय नहीं है, क्योंकि अनिवार्य रूप से किसी बार एसोसिएशन की सदस्यता के मुद्दे से संबंधित कोई भी विवाद निजी प्रकृति का होता है और इसमें कोई सार्वजनिक चरित्र शामिल नहीं होता है। किसी स्वैच्छिक बार एसोसिएशन और उसके सदस्यों के बीच का पारस्परिक संबंध अनिवार्य रूप से संविदात्मक (Contractual) और उसके अपने नियमों के तहत विनियमित होता है।”
2. परमादेश रिट (Writ of Mandamus) जारी नहीं की जा सकती
- अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय संगीता राय बनाम नई दिल्ली बार एसोसिएशन (2026) का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ या सार्वजनिक निकाय नहीं है।
- इसलिए, उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 की शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी बार एसोसिएशन के खिलाफ परमादेश (Mandamus) की रिट जारी नहीं कर सकता।
3. वैधानिक निकायों को पक्षकार बनाने से याचिका पोषणीय नहीं हो जाती
- पीठ ने साफ किया कि याचिकाकर्ता द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को केवल औपचारिक प्रतिवादी (Proforma Respondent) बना देने से याचिका की पोषणीयता का दोष दूर नहीं होता, क्योंकि उनके खिलाफ स्वतंत्र रूप से कोई राहत या निष्क्रियता का आरोप नहीं लगाया गया था।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (गोला गोकर्ण नाथ बार का विवाद)
- विवाद की उत्पत्ति: याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में पंजीकृत एक प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता और सेंट्रल बार एसोसिएशन, गोला गोकर्ण नाथ (लखीमपुर खीरी) के पूर्व अध्यक्ष हैं।
- विवादित आदेश: 12 जून 2026 को बार एसोसिएशन ने एक प्रेस रिलीज जारी कर याचिकाकर्ता को एसोसिएशन की सदस्यता से एक वर्ष के लिए निष्कासित (Debar) कर दिया था।
- याचिकाकर्ता की दलील: याचिकाकर्ता का आरोप था कि उन्होंने निष्पक्ष चुनाव कराने के बाद नवनिर्वाचित पदाधिकारियों की अवैध गतिविधियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई थीं, जिसके प्रतिशोध में उन्हें निष्कासित किया गया और सार्वजनिक प्रेस विज्ञप्ति से उनकी प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंची।
- प्रतिवादियों का विरोध: मुख्य स्थायी वकील (CSC) ने याचिका की पोषणीयता पर प्रारंभिक आपत्ति जताते हुए तर्क दिया कि यह एक पंजीकृत सोसाइटी का विशुद्ध आंतरिक और निजी विवाद है, जिसके लिए वैकल्पिक कानूनी उपचार उपलब्ध हैं।
विवाद निस्तारण के लिए विधिक उपचार (वैकल्पिक फोरम)
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन (जो सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत संस्था है) से जुड़े ऐसे विवादों के लिए सदस्य के पास निम्नलिखित कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं:
- सक्षम दीवानी न्यायालय (Competent Civil Court): सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दाखिल करना।
- सोसाइटी रजिस्ट्रार (Registrar of Societies): सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के तहत सक्षम रजिस्ट्रार के समक्ष शिकायत दर्ज कराना।
- एसोसिएशन के उपनियम (Bye-laws): बार एसोसिएशन के संविधान या बायलॉज में नामित आंतरिक अपीलीय निकाय/प्राधिकारी का दरवाजा खटखटाना।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- रिट याचिका खारिज: अदालत ने अनुच्छेद 226 के तहत याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए निरस्त कर दिया।
- वैकल्पिक कानूनी उपचार की छूट: याचिकाकर्ता को छूट दी गई कि वह अपनी शिकायतों के निवारण के लिए सक्षम सिविल कोर्ट या सोसाइटी रजिस्ट्रार के समक्ष उपयुक्त कानूनी कार्यवाही शुरू कर सकते हैं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: रिट याचिका (बार एसोसिएशन सदस्यता निष्कासन आदेश को चुनौती)
- प्रासंगिक कानून: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 एवं अनुच्छेद 12; सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 (Societies Registration Act, 1860)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता रमेंद्र कुमार मिश्रा
- प्रतिवादियों की ओर से: मुख्य स्थायी वकील (Chief Standing Counsel)
- पीठ: न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
Bar News:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ/प्रयागराज पीठ) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ एवं न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी |
| संबंधित प्रावधान | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 (रिट अधिकार क्षेत्र) |
| मुख्य विधिक मुद्दा | क्या बार एसोसिएशन द्वारा किसी वकील को सदस्यता से 1 वर्ष के लिए निष्कासित करने के खिलाफ रिट याचिका विचारणीय (Maintainable) है? |
| अदालत का निर्णय | याचिका गैर-विचारणीय (Not Maintainable) मानकर खारिज; सिविल कोर्ट या सोसाइटी रजिस्ट्रार के समक्ष जाने की छूट। |

