घरेलू भूमिकाओं पर हाईकोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
- कमाई और घर संभालने को मिले समान सम्मान: अदालत ने हमारी सांस्कृतिक संरचना का उल्लेख करते हुए कहा:“हमारी संस्कृति में परिवार एक मौलिक इकाई है। पैसा कमाने की जिम्मेदारी और घर को संभालने/चलाने की जिम्मेदारी दोनों ही समान रूप से सम्मान की हकदार हैं।”
- ‘हाउस-हस्बैंड’ की अवधारणा और करियर में संतुलन: पीठ ने ध्यान दिलाया कि कई बार महिलाओं को ऐसा लगता है कि विवाह उनके करियर और अवसरों के बीच बाधा बन रहा है। कोर्ट ने कहा:“यदि पति घरेलू जिम्मेदारियों में खुलकर हाथ बटाना शुरू कर दें, तो यह स्थिति बदल सकती है। जब ‘हाउसवाइफ’ की अवधारणा हो सकती है, तो ‘हाउस-हस्बैंड’ की अवधारणा भी अस्तित्व में आ सकती है। यदि यह एक सामाजिक मानदंड बन जाए, तो इससे शादियां बचेंगी और पारिवारिक ढांचा मजबूत होगा।”
- ‘Homemaker’ एक जेंडर-न्यूट्रल (लिंग-तटस्थ) शब्द है: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘होममेकर’ (घर निर्माता) शब्द किसी एक लिंग के लिए सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी बार-बार माना है कि घर के कामकाज और देखभाल के कार्य का एक बहुत बड़ा आर्थिक मूल्य (Economic Value) होता है।
आपसी सहमति से फैसला और वित्तीय शर्तें
मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों (पति और पत्नी) के बीच आपसी सहमति बन गई:
- पत्नी को ₹2.5 करोड़ की राशि: पति, पत्नी को ₹2.5 करोड़ का भुगतान करने पर सहमत हुआ, जिसमें से ₹1.5 करोड़ तीन महीने के भीतर सीधे पत्नी के बैंक खाते में जमा कराए जाएंगे।
- बच्चों के लिए ₹1 करोड़: दंपत्ति के दो बच्चों (जिनका जन्म 2012 और 2016 में हुआ था) के भविष्य और कल्याण के लिए एक वर्ष के भीतर प्रत्येक बच्चे के नाम पर ₹50-50 लाख की FD/जमा राशि तय की गई।
- तलाक की मंजूरी: हाईकोर्ट ने आपसी सहमति के आधार पर दोनों के विवाह को समाप्त करते हुए तलाक की डिग्री प्रदान कर दी।
मदुरै: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ ने विवाह संस्था, परिवार में लैंगिक समानता (Gender Equality), और घरेलू कार्यों के आर्थिक व सामाजिक मूल्यांकन पर एक प्रगतिशील और विचारोत्तेजक विधिक टिप्पणी की है।
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति की खंडपीठ ने तिरुवन्नामलाई के एक डॉक्टर दंपती के बीच चल रहे लंबे वैवाहिक विवाद से उपजी अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह अवलोकन किया। कार्यवाही के दौरान दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर अदालत ने आपसी सहमति से विवाह विच्छेद (Divorce by Mutual Consent) का आदेश पारित किया, जिसके तहत पति अपनी पत्नी को ₹2.5 करोड़ की स्थायी गुजारा भत्ता/सैटलमेंट राशि और दोनों बच्चों के नाम ₹50-50 लाख की सावधि जमा (FD) कराएगा। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वैवाहिक जीवन में आजीविका कमाने और घर-परिवार संभालने की जिम्मेदारियां दोनों ही समान सम्मान की हकदार हैं। यदि समाज में ‘गृहिणी’ (Housewife) का अस्तित्व हो सकता है, तो पुरुषों द्वारा घरेलू जिम्मेदारियां संभालने वाले ‘हाउस हसबैंड’ (House-husband) की अवधारणा भी पूरी तरह स्वाभाविक और संभव है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन एवं सामाजिक-विधिक अंतर्दृष्टि
1. ‘आजीविका कमाने और घर संभालने का दायित्व समान सम्मान का हकदार’
खंडपीठ ने भारतीय समाज में परिवार की संरचना और कार्य-विभाजन का दार्शनिक विश्लेषण करते हुए कहा: “हमारी संस्कृति में परिवार एक बुनियादी इकाई है। आय अर्जित करने (Earning an income) की जिम्मेदारी और घर-परिवार का प्रबंधन व रखरखाव (Maintaining the household) करने की जिम्मेदारी—दोनों ही समान सम्मान की हकदार हैं। आज महिलाएं कई बार विवाह को अपने करियर के अवसरों में एक बाधा के रूप में देखती हैं, जिसके कारण अविवाहित रहने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। यह स्थिति बदल सकती है यदि पति घरेलू जिम्मेदारियों को साझा करें। यदि एक ‘हाउसवाइफ’ की भूमिका हो सकती है, तो एक ‘हाउस-हसबैंड’ की भूमिका भी उतनी ही प्रासंगिक रूप से अस्तित्व में रह सकती है। यदि ऐसी व्यवस्था एक सामाजिक मानदंड (Social Norm) बन जाए, तो यह विवाह को मजबूत करने और परिवार की संरचना को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।”
2. ‘होममेकर’ (Homemaker) शब्द पूरी तरह लैंगिक रूप से तटस्थ
- खंडपीठ ने रेखांकित किया कि ‘होममेकर’ शब्द किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है।
- अदालत ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के उन विभिन्न पूर्ववर्ती निर्णयों का संदर्भ दिया जिनमें एक पत्नी द्वारा गृहिणी के रूप में किए जाने वाले चौबीसों घंटे के अनुत्पादक माने जाने वाले कार्यों के आर्थिक मूल्य (Economic Value) को वैधानिक रूप से मान्यता दी गई है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं पारस्परिक समझौता
- विवाह और करियर: दोनों पक्षकार पेशे से डॉक्टर हैं। वर्ष 2011 में जब वे पुडुचेरी के श्री वेंकटेश्वर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में कार्यरत थे, तब उनका विवाह हुआ था।
- पारिवारिक खींचतान:
- वर्ष 2012 में उनके पहले बेटे का जन्म हुआ। इसके बाद पति ने कार्डियोलॉजी में उच्च अध्ययन (DM/Super-speciality) किया, जबकि पत्नी बच्चे की देखभाल के लिए अपने मायके में रही।
- 2016 में उनकी दूसरी संतान का जन्म हुआ। कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 में वे साथ रहे, परंतु करियर और घरेलू अपेक्षाओं के चलते उनके संबंधों में गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए।
- पारिवारिक अदालत का रुख: पत्नी ने थेनी (Theni) की फैमिली कोर्ट में वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) की अर्जी लगाई, जबकि पति ने तलाक की याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट द्वारा दोनों अर्जियां खारिज किए जाने के बाद दोनों ने हाईकोर्ट की मदुरै पीठ में अलग-अलग अपीलें दाखिल की थीं।
- सहमति से विवाह विच्छेद और वित्तीय शर्तें:
- हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने माना कि विवाह पूरी तरह टूट चुका है। बच्चों के सर्वोत्तम कल्याण और भविष्य को ध्यान में रखते हुए पति कुल ₹2.5 करोड़ देने पर सहमत हुआ।
- भुगतान की शर्तें:
- पति आदेश की प्रति प्राप्त होने के 3 महीने के भीतर ₹1.5 करोड़ सीधे पत्नी के बैंक खाते में जमा करेगा।
- शेष राशि के रूप में, दोनों नाबालिग बच्चों के नाम 1 वर्ष के भीतर ₹50-50 लाख सावधि जमा (FD) के रूप में सुरक्षित किए जाएंगे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डॉक्टर दंपती वैवाहिक सिविल विविध अपील [C.M.A. (MD) – मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै खंडपीठ)]
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) की धारा 13-B (आपसी सहमति से तलाक)
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 (दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन) एवं धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता व भरण-पोषण)
- पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 19 (अपील क्षेत्राधिकार)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 और 15 (लैंगिक समानता एवं रूढ़िवादी जेंडर भूमिकाओं से मुक्ति)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- कीर्ति व अन्य बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2021, सुप्रीम कोर्ट 3-जज पीठ) — ‘शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि गृहिणी (Homemaker) द्वारा घर में किए जाने वाले कार्यों का वास्तविक आर्थिक मूल्य होता है; घरेलू श्रम को किसी भी प्रकार से वित्तीय उपार्जन से कमतर नहीं आंका जा सकता।’
- शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन (2023, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘विवाह के असाध्य रूप से टूटने (Irretrievable Breakdown of Marriage) पर आपसी सहमति से सम्मानजनक विदाई और बच्चों के वित्तीय संरक्षण का सिद्धांत।’
- पीठ: न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति (मद्रास उच्च न्यायालय, मदुरै पीठ)
- अंतिम निर्णय: आपसी सहमति के आधार पर तलाक मंजूर; वित्तीय शर्तों के साथ अपीलें निस्तारित।
House husband: मामले का विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति |
| पक्षकार | तिरुवन्नामलाई का एक डॉक्टर दंपत्ति (विवाह 2011) |
| मूल विवाद | पत्नी द्वारा दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) और पति द्वारा तलाक की मांग |
| अंतिम फैसला | आपसी सहमति (Mutual Consent) से तलाक मंजूर; ₹3.5 करोड़ का वित्तीय निपटारा |

