Saturday, September 26, 2026
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Retiral Dues: अवकाश नकदीकरण सेवानिवृत्ति पर देय बकाए का अभिन्न हिस्सा है; भुगतान में अनुचित देरी पर कर्मचारी को ब्याज मिलना उसका विधिक हक

हाईकोर्ट का मुख्य आदेश और निष्कर्ष

  1. लीव एनकैशमेंट निश्चित रूप से Retiral Due है: हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि लीव एनकैशमेंट सेवानिवृत्ति देयताओं का हिस्सा है। सेवानिवृत्ति के समय कर्मचारी के खाते में जमा बची हुई छुट्टियों (Unavailed Leave) के बदले मिलने वाला पैसा सेवानिवृत्ति पर ही देय होता है।
  2. ब्याज की क्षतिपूर्ति प्रकृति: अदालत ने ट्रिब्यूनल के उस रुख की पुष्टि की कि जब सेवानिवृत्ति बकाए के भुगतान में अकारण देरी की जाती है, तो उस पर लगने वाला ब्याज कर्मचारी को हुई असुविधा की भरपाई (Compensation) के रूप में होता है।
  3. अपील में हस्तक्षेप से इनकार: पीठ ने पाया कि केंद्र सरकार ने ट्रिब्यूनल के मूल आदेशों को चुनौती नहीं दी थी और जब अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने की समय-सीमा खत्म होने वाली थी, तब हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के पेंशनरी एवं सेवानिवृत्ति परिलाभों (Retiral Benefits), विशेष रूप से अवकाश नकदीकरण (Leave Encashment) के भुगतान में प्रशासनिक देरी पर ब्याज के वैधानिक अधिकार को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी है कि किसी कर्मचारी के खाते में बची अप्रयुक्त छुट्टियों के बदले मिलने वाला अवकाश नकदीकरण निर्विवाद रूप से ‘सेवानिवृत्ति बकाया’ (Retiral Dues) के दायरे में आता है, और इसके भुगतान में हुए अत्यधिक विलंब की भरपाई के लिए कर्मचारी को प्रतिकरात्मक ब्याज (Compensatory Interest) दिया जाना पूरी तरह न्यायसंगत व अनिवार्य है।

न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति निवेदिता अनिल शर्मा की खंडपीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश के खिलाफ भारत संघ (Union of India) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। खंडपीठ ने माना कि अधिकरण के उस निर्देश में हस्तक्षेप करने का कोई विधिक आधार नहीं है जिसमें केंद्र सरकार को ब्याज सहित बकाए के भुगतान का आदेश दिया गया था।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन

1. ‘अवकाश नकदीकरण सेवानिवृत्ति बकाया का अभिन्न हिस्सा, उत्तर अनिवार्यतः सकारात्मक ही होगा’ केंद्र सरकार द्वारा यह दलील दिए जाने पर कि संबंधित सेवा नियमों में अवकाश नकदीकरण पर अलग से ब्याज देने का कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है, खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया: “इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि अवकाश नकदीकरण ‘सेवानिवृत्ति बकाए’ (Retiral Dues) के दायरे में आता है। यह भुगतान किसी कर्मचारी के खाते में जमा बिना उपयोग की गई छुट्टियों के एवज में उसकी सेवानिवृत्ति के समय ही देय होता है। अधिकरण ने संबंधित अधिकारियों से विशेष रूप से यह सवाल किया था कि क्या अवकाश नकदीकरण सेवानिवृत्ति बकाए का हिस्सा है या नहीं, और आदेश से यह स्पष्ट नहीं होता कि इस प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर दिया गया था। हमारी दृष्टि में, इस प्रश्न का उत्तर अनिवार्य रूप से सकारात्मक (In the affirmative) ही होना चाहिए।”

2. देरी पर ब्याज दंडात्मक नहीं, प्रतिकरात्मक (Compensatory in nature) है

  • अदालत ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के इस विधिक निष्कर्ष की पुष्टि की कि जब सेवानिवृत्ति परिलाभों को जारी करने में प्रशासनिक स्तर पर अनुचित और अत्यधिक देरी की जाती है, तो कर्मचारी ब्याज के रूप में क्षतिपूर्ति पाने का पूर्ण हकदार बन जाता है।
  • ऐसा ब्याज कोई दंड नहीं है, बल्कि उस वित्तीय नुकसान की भरपाई है जो समय पर राशि न मिलने के कारण कर्मचारी ने झेली है।

3. पूर्ववर्ती आदेशों को चुनौती न दिए जाने का संज्ञान

  • खंडपीठ ने रेखांकित किया कि केंद्र सरकार ने न तो अधिकरण के मूल आदेश (4 अक्टूबर 2023) को समय पर चुनौती दी थी, और न ही 20 अप्रैल 2026 के उस स्पष्टीकरण आदेश को चुनौती दी थी जिसमें साफ कहा गया था कि अवकाश नकदीकरण ‘सेवानिवृत्ति बकाए’ की परिभाषा में शामिल है।
  • जब अनुपालन रिपोर्ट पेश करने की समय-सीमा समाप्त होने वाली थी, तब अधिकरण के आदेश के करीब एक महीने बाद 2 सितंबर को यह रिट याचिका आनन-फानन में दायर की गई। अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में केवल देरी करने का प्रयास माना।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विवाद

  • 30 नवंबर 2021 को सेवानिवृत्ति: प्रतिवादी कर्मचारी 30 नवंबर 2021 को सरकारी सेवा से अधिवर्षिता (Superannuation) पर सेवानिवृत्त हुआ था।
  • कैट (CAT) का मूल आदेश: अधिकरण ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे कर्मचारी के वेतन का पुनर्गठन (Pay Re-fixation) करें, उसकी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति परिलाभों को संशोधित करें और विलंब की अवधि के लिए सामान्य भविष्य निधि (GPF) की दरों पर ब्याज का भुगतान करें।
  • अनुपालन याचिका और केंद्र की आपत्ति: जब अन्य बकायों के साथ अवकाश नकदीकरण पर ब्याज नहीं दिया गया, तो कर्मचारी ने अनुपालन अर्जी लगाई। केंद्र ने तर्क दिया कि सेवा नियमावली में लीव इनकैशमेंट पर ब्याज का कोई स्पष्ट वैधानिक नियम नहीं है।
  • अधिकरण की सख्त चेतावनी: अधिकरण ने दिल्ली हाईकोर्ट के ही पूर्ववर्ती फैसले भारत संघ बनाम विजय कुमार गुप्ता (6 अगस्त 2025) पर भरोसा करते हुए केंद्र सरकार की दलील खारिज कर दी और हर्जाने की चेतावनी देते हुए अंतिम अनुपालन हलफनामा पेश करने का अंतिम अवसर दिया था, जिसके खिलाफ केंद्र हाईकोर्ट पहुंचा था।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: भारत संघ (Union of India) बनाम सेवानिवृत्त कर्मचारी [W.P.(C) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
  • संबंधित पूर्ववर्ती आदेश: केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), प्रधान पीठ, नई दिल्ली (आदेश तिथि: 4 अक्टूबर 2023, 20 अप्रैल 2026 एवं अनुपालन आदेश)
  • प्रासंगिक कानून एवं सेवा नियम:
    • केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम [CCS (Pension) Rules] एवं सीसीएस (अवकाश) नियम, 1972 का नियम 39 (सेवानिवृत्ति पर अर्जित अवकाश का नकदीकरण)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 एवं अनुच्छेद 300A (पेंशन और सेवानिवृत्ति परिलाभ संपत्ति का अधिकार हैं, कोई सरकारी अनुग्रह नहीं)
    • प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 19 एवं 27 (आदेशों का निष्पादन)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • भारत संघ बनाम विजय कुमार गुप्ता (दिल्ली उच्च न्यायालय, 6 अगस्त 2025) — ‘अवकाश नकदीकरण के भुगतान में अकारण देरी होने पर जीपीएफ दरों के समतुल्य ब्याज देय होगा।’
    • डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ (1983, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) एवं स्टेट ऑफ झारखंड बनाम जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव (2013, सुप्रीम कोर्ट) — ‘पेंशन, ग्रेच्युटी और अवकाश नकदीकरण किसी नियोक्ता का इनाम या खैरात नहीं हैं; वे संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संरक्षित संपत्ति का अधिकार हैं जिनका समय पर भुगतान न होना अवैध है।’
    • एस.के. दुआ बनाम हरियाणा राज्य (2008, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि सेवा नियमों में देरी पर ब्याज का स्पष्ट प्रावधान न भी हो, तब भी संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्राकृतिक न्याय के आधार पर ब्याज का दावा किया जा सकता है।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति निवेदिता अनिल शर्मा (दिल्ली उच्च न्यायालय)
  • अंतिम परिणाम: भारत संघ की रिट याचिका खारिज (Petition Dismissed); अधिकरण द्वारा निर्धारित जीपीएफ ब्याज दर के अनुपालन का रास्ता साफ।

Retiral Dues: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
पीठ के न्यायाधीशन्यायमूर्ति सी. हरिशंकर एवं न्यायमूर्ति निवेदिता अनिल शर्मा
याचिकाकर्ताकेंद्र सरकार (Union of India)
मूल मुद्दासेवानिवृत्ति के समय लीव एनकैशमेंट के विलंबित भुगतान पर ब्याज की मांग
हाईकोर्ट का फैसलाकेंद्र सरकार की याचिका खारिज; CAT के आदेश को सही ठहराया

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