हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ और सख्त चेतावनी
- जवाब न देने पर याचिकाओं को मंजूर करने की चेतावनी:सरकारी वकील द्वारा फिर से दो सप्ताह का समय मांगने पर पीठ ने कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा:“जब अदालत किसी जनहित याचिका (PIL) का संज्ञान लेती है और राज्य को जवाब दाखिल करने का निर्देश देती है, तो सरकार का हलफनामा रिकॉर्ड पर होना ही चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो हम इन PILs को स्वीकार करना शुरू कर देंगे, तब आपको समझ आएगा।”
- देरी के जिम्मेदार अधिकारी से होगी जुर्माना राशि की वसूली:अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पक्षकार 4 से अधिक अवसर मिलने के बाद भी आपत्ति दर्ज कराने में विफल रहते हैं, तो उन पर लागत लगाई जाएगी और “यह जुर्माना राशि देरी के लिए जिम्मेदार संबंधित अधिकारी (Person responsible for non-filing) के वेतन/जेब से वसूल की जाएगी।”
बेंगलुरु: राज्य बजट में घोषित विकास योजनाओं के तहत सत्तारूढ़ दल बनाम विपक्षी विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में बजटीय आवंटन में कथित राजनीतिक भेदभाव (Discriminatory Fund Allocation), संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार, और जनहित याचिकाओं (PIL) में राज्य सरकार द्वारा बार-बार समय मांगने के बावजूद प्रति-शपथ पत्र (Statement of Objections) दाखिल न करने की प्रशासनिक सुस्ती पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
जामखंडी से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधायक जगदीश शिवय्या गुडगुंटी द्वारा दायर रिट याचिका
न्यायमूर्ति अनु शिवरामन और न्यायमूर्ति के.एस. भरत कुमार की खंडपीठ ने जामखंडी से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधायक जगदीश शिवय्या गुडगुंटी द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य के वित्त विभाग (Finance Department) पर ₹2,000 का हर्जाना (Costs) लगाया। खंडपीठ ने यह राशि एडवोकेट्स क्लर्क्स एसोसिएशन (Advocates Clerks Association) में जमा कराने और आपत्ति विवरण के साथ जमा रसीद पेश करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि 4 से अधिक अवसर लेने के बाद भी जवाब न देने पर हर्जाने की राशि देरी के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी से व्यक्तिगत रूप से वसूल की जाएगी। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार अदालती आदेशों के बावजूद अपना जवाब दाखिल नहीं करती है, तो अदालत सीधे याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाने के लिए बाध्य होगी।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘हलफनामा दाखिल न करने का कोई औचित्य नहीं—अन्यथा पीआईएल स्वीकार करना शुरू कर देंगे’ न्यायमूर्ति अनु शिवरामन और न्यायमूर्ति के.एस. भरत कुमार की खंडपीठ ने राज्य सरकार की लापरवाही पर सख्त नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा:“बार-बार समय दिए जाने के बावजूद प्रतिवादी-राज्य द्वारा अपनी आपत्तियां/हलफनामा दाखिल न करने का पूरी तरह से कोई विधिक औचित्य (Absolutely no justification) नहीं है। एक बार जब न्यायालय किसी मामले का संज्ञान ले लेता है और आपसे जवाब दाखिल करने के लिए कहता है, तो सरकार का हलफनामा रिकॉर्ड पर होना ही चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो हम इन जनहित याचिकाओं को सीधे स्वीकार करना (Start allowing these PILs) शुरू कर देंगे, तब आपको समझ आएगा।”
2. विशेष अदालती निर्देश के बाद भी अनुपालन न होने पर सवाल:
- पीठ ने सरकारी वकील द्वारा पुनः दो सप्ताह का समय मांगे जाने पर सवाल किया कि जब अदालत का सीधा निर्देश था, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ:“जब इस न्यायालय का हलफनामा दाखिल करने का स्पष्ट निर्देश था, तो फिर इसे रिकॉर्ड पर क्यों नहीं लाया जा रहा है?”
3. देरी के जिम्मेदार अधिकारी से हर्जाना वसूलने की चेतावनी:
- खंडपीठ ने भविष्य के लिए कड़ा प्रशासनिक व न्यायिक मानदंड तय करते हुए चेतावनी दी:“जिन मामलों में चार से अधिक अवसर (More than four opportunities) लिए जा चुके हैं और फिर भी कोई आपत्ति दाखिल नहीं की गई है, वहां हम हर्जाना लगाएंगे। और यह हर्जाना किसी सार्वजनिक कोष से नहीं, बल्कि जवाब दाखिल न करने के लिए जिम्मेदार संबंधित अधिकारी (Person responsible for non-filing) से व्यक्तिगत रूप से वसूला जाना चाहिए।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: सीएमआईडीपी (CMIDP) में पक्षपात का आरोप
- याचिकाकर्ता और चुनावी क्षेत्र:
- याचिका जामखंडी (Jamkhandi) विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक जगदीश शिवय्या गुडगुंटी द्वारा दायर की गई है।
- बजटीय घोषणा और फंड आवंटन में भेदभाव का आरोप:
- याचिका के अनुसार, कर्नाटक सरकार द्वारा 2025–26 के राज्य बजट में घोषित ₹8,000 करोड़ के मुख्यमंत्री अवसंरचना विकास कार्यक्रम (Chief Minister’s Infrastructure Development Programme – CMIDP) के तहत धन का आवंटन मनमाने और पक्षपातपूर्ण तरीके से किया गया।
- आरोप है कि:
- विपक्षी दलों (भाजपा आदि) के विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों को केवल ₹25 करोड़ प्रति क्षेत्र आवंटित किए गए।
- जबकि सत्तारूढ़ दल के विधायकों का प्रतिनिधित्व करने वाले विधानसभा क्षेत्रों को दोगुना, यानी ₹50 करोड़ प्रति क्षेत्र दिए गए।
- संवैधानिक समानता पर आघात:
- याचिका में तर्क दिया गया है कि सार्वजनिक कोष और राज्य का खजाना करदाताओं का पैसा है। राज्य सरकार सत्तारूढ़ बनाम विपक्षी दल के आधार पर विकास कार्यों के फंड में ऐसा मनमाना भेदभाव नहीं कर सकती, क्योंकि इससे विपक्षी क्षेत्रों के नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं।
- अदालती आदेशों की लगातार अनदेखी:
- उच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2025 को ही राज्य सरकार को प्रति-शपथ पत्र (Statement of Objections) दाखिल करने का निर्देश दिया था।
- इसके बाद मामला कई बार सूचीबद्ध हुआ, परंतु सरकार ने जवाब नहीं दिया।
- 17 फरवरी 2026 को अदालत ने राज्य को अंतिम अवसर (Final Opportunity) दिया था, परंतु उसके बाद भी 4 तारीखें बीत जाने पर भी कोई जवाब रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया।
उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश
- ₹2,000 का हर्जाना: राज्य के वित्त विभाग पर अदालती निर्देशों का बार-बार उल्लंघन करने के लिए ₹2,000 का हर्जाना लगाया गया।
- क्लर्क्स एसोसिएशन में जमा का आदेश: यह राशि एडवोकेट्स क्लर्क्स एसोसिएशन (Advocates Clerks Association) के खाते में जमा कराई जाएगी और भुगतान की औपचारिक रसीद आपत्तियों के साथ संलग्न करनी होगी।
- अंतिम समय-सीमा: राज्य को अपना विस्तृत आपत्ति विवरण रिकॉर्ड पर दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का अंतिम अवसर प्रदान किया गया।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता एवं मनमानेपन के विरुद्ध संरक्षण):
- सर्वोच्च न्यायालय ने ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) में प्रतिपादित किया था कि समता और मनमानापन एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं।
- लोक कल्याणकारी राज्य द्वारा विकास योजनाओं और सार्वजनिक निधियों (Public Funds) का वितरण पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और आवश्यकता-आधारित होना चाहिए। राजनीतिक संबद्धता के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के बीच बजट आवंटन में 50% की कटौती करना प्रथम दृष्टया अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
- संविधान का अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार):
- उच्च न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि वह कार्यपालिका की वित्तीय नीतियों में मनमाने भेदभाव पाए जाने पर हस्तक्षेप करे और समान आवंटन के निर्देश जारी करे।
- अदालती प्रक्रिया में सरकार की जवाबदेही:
- जब संवैधानिक अदालत राज्य को नोटिस जारी करती है, तो कार्यपालिका का यह अनिवार्य दायित्व होता है कि वह समयबद्ध रूप से तथ्यात्मक हलफनामा पेश करे। जवाब न देने की स्थिति में अदालत याचिका के अनकहे तथ्यों को सत्य मानकर एकतरफा राहत देने का अधिकार रखती है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: जगदीश शिवय्या गुडगुंटी बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [रिट याचिका (PIL) – कर्नाटक उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति अनु शिवरामन और न्यायमूर्ति के.एस. भरत कुमार (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 6 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (विधायक) की ओर से: अधिवक्ता अनीश जोस एंटनी
- प्रतिवादी (कर्नाटक राज्य/वित्त विभाग) की ओर से: सरकारी वकील (Government Advocate)
- प्रासंगिक कानून एवं नीतियां:
- कर्नाटक मुख्यमंत्री अवसंरचना विकास कार्यक्रम (CMIDP) (राज्य बजट 2025–26)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार एवं राज्य कार्रवाई में गैर-भेदभाव)
- अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- कर्नाटक उच्च न्यायालय रिट नियम (आपत्ति हलफनामा दाखिल करने की समय-सीमाएं)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सार्वजनिक धन के वितरण में समानता का सिद्धांत — ‘लोक निधियों का उपयोग किसी राजनीतिक दल के लाभ के लिए नहीं किया जा सकता; निर्वाचित प्रतिनिधियों की राजनीतिक पृष्ठभूमि के आधार पर बुनियादी विकास कार्यों में भेदभाव असंवैधानिक है।’
- वर्तमान स्थिति: वित्त विभाग पर ₹2,000 का हर्जाना; जवाब दाखिल करने के लिए 2 सप्ताह का अंतिम अवसर; अनुपालन न करने पर याचिकाकर्ता के पक्ष में सीधे आदेश पारित करने की चेतावनी।
Respond Time: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति अनु शिवरामन एवं न्यायमूर्ति के. एस. भरत कुमार) |
| याचिकाकर्ता | जगदीश शिवैया गुडागुंटी (जमखंडी से भाजपा विधायक) |
| प्रतिवादी | कर्नाटक राज्य सरकार (वित्त विभाग) |
| मुख्य मुद्दा | CMIDP बजट आवंटन में सत्ताधारी बनाम विपक्ष के विधायकों के क्षेत्रों के साथ भेदभाव के आरोप। |
| कोर्ट का रुख | जवाब दाखिल न करने पर ₹2,000 का जुर्माना, 2 सप्ताह का अंतिम मौका और अधिकारियों से हर्जाना वसूलने की चेतावनी। |

