हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियाँ
- अदालत में वकीलों द्वारा बाधा बर्दाश्त नहीं:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वकील अदालत के अधिकारी (Officers of the Court) होते हैं और उनका दायित्व गरिमा बनाए रखना है:“न्याय प्रशासन में धमकी देकर, तेज आवाज में न्यायिक अधिकारी को संबोधित करके और उन्हें आदेश पारित करने से रोककर हस्तक्षेप करना गंभीर कृत्य हैं। किसी भी वकील द्वारा न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना किसी भी परिस्थिति में सहन नहीं किया जा सकता।”
- दिखावे की बिना शर्त माफ़ी (Paper Apology) खारिज:दोनों वकीलों द्वारा मांगी गई बिना शर्त माफी को कोर्ट ने कानून के शिकंजे से बचने का एक सोचा-समझा पैंतरा बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा:“माफी ऐसी होनी चाहिए जो वास्तविक पश्चाताप से भरी हो, न कि सजा से बचने की कोई रणनीति। ऐसी खोखली माफी केवल ‘कागजी माफी’ (Paper Apology) कहलाती है।”
नागपुर/मुंबई: खुली अदालत में न्यायिक अधिकारियों के प्रति अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण, अदालत के अधिकारी (Officer of the Court) के रूप में वकीलों के अनिवार्य विधिक दायित्वों, मातहत न्यायपालिका के न्यायाधीशों को डराने-धमकाने (Intimidation) के प्रयासों, तथा सजा से बचने के लिए मांगी जाने वाली रणनीतिक या खोखली माफी (Hollow / Paper Apology) के विधिक मूल्य पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने एक अत्यंत कड़ा और मिसाल कायम करने वाला फैसला सुनाया है।
एडवोकेट सागर दुर्गादास राठौड़ और उनके पिता एडवोकेट दुर्गादास डी. राठौड़ को आपराधिक अवमानना का दोषी
न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के और न्यायमूर्ति राज डी. वाकोडे की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट जज (न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी) पर चिल्लाने और उन्हें भ्रष्टाचार की झूठी शिकायत करने की धमकी देने के मामले में पिता-पुत्र वकील द्वय—एडवोकेट सागर दुर्गादास राठौड़ और उनके पिता एडवोकेट दुर्गादास डी. राठौड़—को न्यायालय की आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का दोषी ठहराया। पीठ ने दोनों वकीलों द्वारा बाद में मांगी गई बिना शर्त माफी को कानूनी शिकंजे से बचने का एक सोचा-समझा पैंतरा बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने दोनों अवमाननाकर्ताओं पर ₹2,000-₹2,000 का अर्थदंड लगाने के साथ-साथ उच्च न्यायालय के लोक कल्याण खाते में ₹50,000-₹50,000 (कुल ₹1 लाख) का हर्जाना (Costs) जमा करने का आदेश दिया। इसके अलावा, खंडपीठ ने दोनों वकीलों के खिलाफ विधिक लाइसेंस रद्द करने या अन्य दंडात्मक कदम उठाने हेतु मामले को बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा की अनुशासनात्मक समिति को संदर्भित कर दिया। उच्च न्यायालय ने दो-टूक व्यवस्था दी है कि किसी भी परिस्थिति में वकील द्वारा न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न किया जाना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘अदालत के अधिकारी द्वारा न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना असहनीय’ न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के और न्यायमूर्ति राज डी. वाकोडे की खंडपीठ ने वकीलों के आचरण पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा:“धमकियां देकर, ऊंचे स्वर में न्यायिक अधिकारी को संबोधित करके और उन्हें आदेश पारित करने से रोककर न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करना निश्चित रूप से अत्यंत गंभीर कृत्य (Definitely serious acts) है। विशेष रूप से तब, जब ऐसे कृत्य किसी अधिवक्ता द्वारा किए गए हों जो स्वयं अदालत का अधिकारी (Officer of the Court) है; उसका कर्तव्य है कि वह अदालत की गरिमा को बढ़ावा दे और यह सुनिश्चित करे कि उपस्थित अन्य सभी लोग भी मर्यादा बनाए रखें। किसी अधिवक्ता द्वारा न्यायिक प्रक्रिया में बाधा (Obstruction in judicial process) किसी भी परिस्थिति में बर्दाश्त नहीं की जा सकती।”
2. कानूनी कार्रवाई से बचने की रणनीति वाली माफी केवल “कागजी माफी” (Paper Apology): अवमाननाकर्ताओं द्वारा पेश की गई बिना शर्त माफी को खारिज करते हुए खंडपीठ ने माफी के विधिक मानकों को स्पष्ट किया:
- अदालत ने कहा कि माफी की सत्यनिष्ठा पर कोई संदेह नहीं होना चाहिए; उसमें वास्तविक पश्चाताप (Remorse and Repentance) की भावना झलकनी चाहिए, न कि केवल सजा से बचने की कोई सुविचारित रणनीति।
- पीठ ने कड़े शब्दों में कहा:“यदि माफी खोखली (Hollow) हो, उसमें कोई पछतावा या आत्मग्लानि न हो, या यदि यह केवल कानून की कठोरता से बचने का एक हथियार मात्र हो, तो ऐसी माफी को स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसी माफी को केवल ‘कागजी माफी’ (Paper Apology) ही कहा जा सकता है।”
3. ट्रायल कोर्ट के जजों को धमकाने से न्यायपालिका का मनोबल गिरता है:
- उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि जिला व तालुका स्तर के मजिस्ट्रेट न्याय प्रणाली की रीढ़ हैं।
- यदि स्थानीय बार के पदाधिकारी या प्रभावशाली वकील प्रतिकूल आदेश होने पर जजों को खुले कोर्ट रूम में भ्रष्टाचार की झूठी शिकायतें दर्ज कराने की धमकी देंगे, तो इससे न्यायिक अधिकारियों का मनोबल टूटेगा (Demoralises judges) और पूरी न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: आरणी (Arni) कोर्ट रूम का 2021 का घटनाक्रम
- घटना का संदर्भ और पृष्ठभूमि:
- घटना वर्ष 2021 की है, जो महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के आरणी स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) की अदालत में घटी थी।
- घटना के समय वरिष्ठ अधिवक्ता दुर्गादास डी. राठौड़ आरणी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष (President of the Bar Association) के प्रतिष्ठित पद पर आसीन थे, जबकि उनके पुत्र सागर राठौड़ भी उसी अदालत में वकालत करते थे।
- गैर-जमानती वारंट और दबाव की राजनीति:
- मजिस्ट्रेट ने अदालत में पेश न होने वाले एक अनुपस्थित अभियुक्त के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया था।
- अभियुक्त को अदालत में व्यक्तिगत रूप से हाजिर किए बिना, दोनों वकीलों ने मजिस्ट्रेट पर दबाव बनाया कि वारंट को तुरंत रद्द (Cancel) किया जाए।
- कोर्ट रूम में हंगामा और भ्रष्टाचार की धमकी:
- जब न्यायिक अधिकारी ने कानून सम्मत रुख अपनाते हुए आरोपी की पेशी के बिना वारंट वापस लेने से स्पष्ट इनकार कर दिया, तो दोनों वकीलों ने खुली अदालत में मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं।
- दोनों ने जज पर तेज आवाज में चिल्लाना शुरू कर दिया और खुली अदालत में धमकी दी कि यदि उन्होंने उनकी मांग नहीं मानी, तो वे जज के खिलाफ भ्रष्टाचार (Corruption Complaints) की झूठी शिकायतें दर्ज कराएंगे।
- हाईकोर्ट को आपराधिक अवमानना संदर्भ (Reference):
- मजिस्ट्रेट ने इस गंभीर कदाचार और धमकी को रिकॉर्ड करते हुए न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15(2) के तहत बॉम्बे हाईकोर्ट को आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करने के लिए औपचारिक संदर्भ भेजा।
उच्च न्यायालय द्वारा जारी दंडात्मक निर्देश
- आपराधिक अवमानना के तहत दोषसिद्धि: दोनों वकीलों—सागर राठौड़ और दुर्गादास राठौड़—को न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 के तहत आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया जाता है।
- अर्थदंड (Fine): दोनों अवमाननाकर्ताओं को दो सप्ताह के भीतर ₹2,000-₹2,000 का जुर्माना जमा करने का आदेश दिया गया।
- ₹1,00,000 का दंडात्मक हर्जाना (Costs):
- दोनों वकीलों को ₹50,000-₹50,000 (कुल ₹1 लाख) की राशि बॉम्बे हाईकोर्ट के लोक कल्याण खाते (Public Welfare Account) में जमा कराने का निर्देश दिया गया।
- बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्देश:
- उच्च न्यायालय ने मामले के संपूर्ण अभिलेख बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा (BCMG) की अनुशासनात्मक समिति (Disciplinary Committee) को अग्रेषित करने का आदेश दिया ताकि पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) के तहत दोनों वकीलों के लाइसेंस पर उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सके।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
- धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना): किसी भी ऐसे कृत्य या बात को आपराधिक अवमानना माना जाता है जो किसी अदालत के प्राधिकार को कलंकित करती है या कम करती है, अथवा न्यायिक कार्यवाही के निष्पक्ष संचालन या न्याय प्रशासन में बाधा (Obstruction) डालती है।
- धारा 12 का स्पष्टीकरण (माफी का नियम): यदि अदालत संतुष्ट हो कि माफी वास्तविक और सद्भावपूर्वक है, तो सजा से छूट मिल सकती है; परंतु जहां माफी केवल दंड से बचने की औपचारिकता हो, वहां अदालत उसे अस्वीकार करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 35:
- धारा 35 राज्य बार काउंसिल को यह शक्ति देती है कि वह किसी अधिवक्ता द्वारा किए गए पेशेवर या अन्य कदाचार (Professional or other misconduct) के मामलों को अनुशासनात्मक समिति को सौंपे, जो जांच के बाद वकील को फटकार लगा सकती है, निलंबित कर सकती है या उसका नाम रोल से हमेशा के लिए हटा सकती है।
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम (न्यायालय के प्रति अधिवक्ता का कर्तव्य):
- अध्याय II, भाग VI के अनुसार: अधिवक्ता का अनिवार्य कर्तव्य है कि वह अदालत के प्रति सम्मानजनक रवैया बनाए रखे और किसी भी न्यायिक अधिकारी को धमकाने या उस पर अनुचित दबाव डालने से पूरी तरह विरत रहे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: साजिदुज्जमां मोहम्मद हनीफ शाहिद बनाम सागर राठौड़ व अन्य [आपराधिक अवमानना याचिका – बॉम्बे उच्च न्यायालय (नागपुर पीठ)]
- पीठ: न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के और न्यायमूर्ति राज डी. वाकोडे (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) की ओर से: अधिवक्ता जे.एम. गांधी
- अवमाननाकर्ता 1 (सागर राठौड़) की ओर से: अधिवक्ता राहुल मिर्जा
- अवमाननाकर्ता 2 (दुर्गादास राठौड़) की ओर से: अधिवक्ता एस.पी. भंडारकर एवं अथर्व खडसे
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c), धारा 12 एवं धारा 15(2)
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 (पेशेवर कदाचार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय की अवमानना हेतु दंडित करने की शक्तियां)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- एम.बी. संगी बनाम मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (1991, सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायिक अधिकारियों पर चिल्लाना या उनके अधिकार को चुनौती देना न्याय के मंदिर को अपवित्र करना है; बार के सदस्यों द्वारा ऐसी धमकियों से कड़ाई से निपटना अनिवार्य है।’
- टी. मोहनाकृष्णन बनाम मुख्य न्यायाधीश, मद्रास उच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिए मांगी गई देर से और बनावटी माफी अदालत की अवमानना से मुक्ति का आधार नहीं बन सकती।’
- अंतिम परिणाम: दोनों अधिवक्ता आपराधिक अवमानना के दोषी करार; ₹2,000-₹2,000 का जुर्माना; ₹1 लाख का कुल हर्जाना लोक कल्याण खाते में जमा करने का आदेश; अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु बार काउंसिल को मामला प्रेषित।
Paper Apology:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय – नागपुर पीठ |
| दोषी अवमाननाकर्ता | एडवोकेट दुर्गादास राठौड़ (पूर्व अध्यक्ष, अरणी बार एसोसिएशन) और उनके वकील बेटे सागर राठौड़ |
| घटनाक्रम | 2021 में अरणी (Arni) स्थित प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) की अदालत में न्यायाधीश को धमकी देना |
| सजा एवं शास्ति | ₹2,000-₹2,000 का जुर्माना, ₹50,000-₹50,000 (कुल ₹1 लाख) की लीगल कॉस्ट और बार काउंसिल को रेफरल |

