उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- बिना किसी वैध कारण के सहवास से इनकार करना ‘क्रूरता’:पीठ ने 5 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में कहा:“रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो यह सुझाव दे कि दोनों में से कोई भी पक्ष विवाह को संपन्न करने में असमर्थ (Incapable) था। रिकॉर्ड से संकेत मिलता है कि वे स्वेच्छा से एक-दूसरे के साहचर्य से दूर रहे। इस मामले में क्रूरता दांपत्य अधिकारों के इनकार और विवाह के असंपन्न रहने से उत्पन्न हुई है।”
- विवाह का अपूरणीय विच्छेद (Irretrievable Breakdown of Marriage):हाईकोर्ट ने नोट किया कि दंपत्ति 2004 के बाद से केवल एक महीना साथ रहे। अदालत और दोनों वकांलों ने मध्यस्थता के जरिए समझौते का प्रयास किया, लेकिन कोई सहमति नहीं बन सकी। अदालत ने माना कि यह विवाह व्यावहारिक रूप से मृत हो चुका है और इसका अपूरणीय विच्छेद हो चुका है।
- ₹10 लाख का स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony):पति की वित्तीय क्षमता और पत्नी के कामकाजी होने के तथ्यों का संतुलन बनाते हुए हाईकोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह पत्नी को ₹10 लाख का स्थायी गुजारा भत्ता 15 नवंबर 2026 से 4 किश्तों में अदा करे।
कोलकाता: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 13(1)(ia) के तहत ‘मानसिक क्रूरता’ (Mental Cruelty), विवाह के पूर्ण न होने (Non-Consummation of Marriage), दांपत्य अधिकारों से एकतरफा इनकार (Denial of Conjugal Rights), तथा विवाह के अपरिवर्तनीय रूप से टूटने (Irretrievable Breakdown of Marriage) के विधिक आधारों पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
बिना किसी शारीरिक अक्षमता के विवाह कभी पूर्ण नहीं हुआ, जो मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है
न्यायमूर्ति देबांगसु बसाक और न्यायमूर्ति अर्यक दत्त की खंडपीठ ने पारित अपने विस्तृत आदेश में फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर यह फैसला सुनाया। पीठ ने विवाह विच्छेद को मंजूरी देते हुए पति को अपनी कामकाजी पत्नी को चार समान मासिक किस्तों में ₹10 लाख का स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) देने का निर्देश दिया, जिसकी पहली किस्त 15 नवंबर 2026 से देय होगी। अदालत ने 22 साल पुराने वैवाहिक बंधन को समाप्त करते हुए पति की तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली है। अदालत ने पाया कि 2004 में शादी के बाद दोनों मुश्किल से एक महीना साथ रहे और बिना किसी शारीरिक अक्षमता के विवाह कभी पूर्ण (Consummate) नहीं हुआ, जो मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘विवाह पूर्ण न होने का कोई वैध कारण नहीं; दोनों स्वेच्छा से अलग हुए’
न्यायमूर्ति देबांगसु बसाक और न्यायमूर्ति अर्यक दत्त की खंडपीठ ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए दर्ज किया: “विवाह के पूर्ण न होने (Marriage not being consummated) का कोई वैध कारण रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है। रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि दोनों पक्षों में से कोई भी विवाह को पूर्ण करने में शारीरिक रूप से अक्षम (Incapable of consummating the marriage) था। उपलब्ध साक्ष्य स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि वे स्वेच्छा से एक-दूसरे के दांपत्य साहचर्य से अलग हो गए थे।”
2. शारीरिक संबंध और दांपत्य अधिकारों से इनकार मानसिक क्रूरता है:
पीठ ने स्पष्ट किया कि दांपत्य जीवन में बिना किसी उचित कारण के शारीरिक निकटता से निरंतर इनकार करना दूसरे जीवनसाथी के लिए घोर मानसिक प्रताड़ना का गठन करता है: “वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में उत्पन्न हुई क्रूरता दांपत्य अधिकारों से इनकार और विवाह के पूर्ण न होने (Denial of conjugal rights and non-consummation of marriage) से ही उत्पन्न हुई है।”
3. विवाह का अपरिवर्तनीय रूप से टूटना (Irretrievable Breakdown):
- अदालत ने नोट किया कि 2004 में शादी के बाद दोनों मुश्किल से एक महीना साथ रहे। इसके बाद एक अदालती आदेश के तहत थोड़े समय के लिए एक छत के नीचे रहने के दौरान भी उनके बीच कोई सहवास (Cohabitation) नहीं हुआ।
- अदालत ने दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा सुलह कराने के अथक प्रयासों की सराहना की, परंतु माना कि 22 साल के लंबे अलगाव और कटुता के बाद अब इस विवाह का केवल एक विधिक ढांचा शेष रह गया है, जो पूरी तरह टूट चुका है।
4. स्थायी गुजारा भत्ते का निर्धारण (₹10 लाख):
- अदालत ने पाया कि पत्नी स्वयं लाभकारी रोजगार में संलग्न (Gainfully Employed) है।
- पति की वित्तीय क्षमता, उसकी संपत्तियों और पत्नी की आत्मनिर्भरता को संतुलित करते हुए अदालत ने ₹10 लाख की एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता राशि तय की, जिसे 15 नवंबर 2026 से शुरू होकर चार मासिक किस्तों में अदा करना होगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: शादी के एक महीने बाद अलगाव
| विवरण | तथ्य एवं कालक्रम |
| विवाह की तिथि | अप्रैल 2004 में दोनों का विवाह संपन्न हुआ था। |
| सहवास की अवधि | शादी के बाद दोनों बमुश्किल एक महीने तक पति-पत्नी के रूप में एक साथ रहे; उसके बाद पत्नी घर छोड़कर अलग रहने लगी। |
| पति के आरोप | पति का दावा था कि पत्नी ने शारीरिक संबंध बनाने से साफ इनकार कर दिया था। पति के अनुसार, पत्नी का कहना था कि शारीरिक संबंध बनाने से उसका फिगर खराब (Shapeless) हो जाएगा और उसके बाद कोई उसकी ओर आकर्षित नहीं होगा। |
| हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम प्रवास | पूर्व में हाईकोर्ट के एक आदेश के तहत दोनों को एक निश्चित अवधि के लिए साथ रहने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, उस दौरान भी उनके बीच कोई सहवास नहीं हुआ और पति वास्तव में अलग ही रहा। |
| तलाक का वाद | पति ने जुलाई 2016 में क्रूरता और परित्याग (Cruelty and Desertion) के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। |
| पत्नी का बचाव | पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि पति ने क्रूरता और विवाह पूर्ण न होने की सटीक तारीखें और विशिष्ट विवरण नहीं दिए हैं। हालांकि, जिरह (Cross-examination) के दौरान पत्नी ने स्वीकार किया कि उनके बीच कभी सहवास नहीं हुआ था। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) (क्रूरता):
- समर घोष बनाम जया घोष (2007, सुप्रीम कोर्ट) में स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, यदि कोई जीवनसाथी बिना किसी शारीरिक अक्षमता या चिकित्सीय कारण के लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने से एकतरफा इनकार करता है, तो यह मानसिक क्रूरता का पुख्ता आधार बनता है।
- विवाह का पूर्ण होना (Consummation of Marriage):
- विवाह को पूर्ण माना जाने के लिए प्राकृतिक और सामान्य यौन संबंध आवश्यक है। यदि शादी के पहले दिन से ही किसी पक्ष द्वारा बिना किसी वैध कारण के सहवास से इनकार किया जाए, तो यह विवाह के उद्देश्य को ही विफल कर देता है।
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता):
- तलाक की डिक्री पारित करते समय अदालत को दोनों पक्षों की आय, उनकी संपत्तियों, आचरण और परिस्थितियों को देखते हुए स्थायी गुजारा भत्ता तय करने का पूर्ण क्षेत्राधिकार प्राप्त है। पत्नी के कामकाजी होने के बावजूद वैवाहिक स्थिति के सम्मानजनक अंत के लिए एकमुश्त राशि का निर्धारण न्यायसंगत माना गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: वैवाहिक अपील (तलाक की डिक्री) [कलकत्ता उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति देबांगसु बसाक और न्यायमूर्ति अर्यक दत्त (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 5 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता (पति) की ओर से: अधिवक्ता कौशल पॉल
- प्रतिवादी (पत्नी) की ओर से: अधिवक्ता प्रांतक घोष
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 13(1)(ia) (क्रूरता के आधार पर तलाक) एवं धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता व भरण-पोषण)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- समर घोष बनाम जया घोष (2007, SC) — ‘बिना किसी चिकित्सकीय कारण के वैवाहिक सहवास और शारीरिक संबंधों से लगातार इनकार करना मानसिक क्रूरता है।’
- अंतिम परिणाम: अपील स्वीकार; 22 साल पुराने अप्रभावी विवाह को समाप्त करते हुए तलाक की डिक्री मंजूर; पति को 15 नवंबर 2026 से 4 किस्तों में ₹10 लाख स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश।
Breakdown of Marriage: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) |
| पीठ | जस्टिस देवांग्शु बसाक एवं जस्टिस आर्यक दत्त |
| विवाह वर्ष | अप्रैल 2004 (एक साथ केवल 1 महीना रहे) |
| मुख्य आधार | विवाह का असंपन्न होना (Non-consummation of marriage) एवं मानसिक क्रूरता |
| अदालत का फैसला | तलाक की डिग्री मंजूर; पति को ₹10 लाख स्थायी अलमोनी देने का आदेश। |

