Thursday, October 15, 2026
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Foreigner Missing: दो महिलाओं को सीमा पार बांग्लादेश धकेला गया और वे अब तक लापता; जानिए असम सरकार और केंद्र पर हाईकोर्ट क्यों है सख्त

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और तल्ख टिप्पणियां

  1. फॉरेन्सिक जांच के आदेश:अदालत ने संदेह जताया कि पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने के समय FT का आदेश तैयार ही नहीं था। हाईकोर्ट ने असम सरकार को निर्देश दिया कि यदि आवश्यक हो तो FT के कंप्यूटर को जप्त कर फॉरेन्सिक विशेषज्ञों के पास भेजा जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि आदेश वास्तव में किस तारीख और समय पर टाइप/तैयार किया गया था।
  2. 24 घंटे में देश छोड़ने का आदेश “हास्यास्पद” (Farcical):नगांव के जिला आयुक्त (DC) ने 2 जून को Immigrants (Expulsion from Assam) Act, 1950 के तहत आदेश जारी कर जहानारा को 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब महिला पहले से ही माटिया डिटेंशन सेंटर में पुलिस की हिरासत में बंद थी, तब उसे 24 घंटे में देश छोड़ने का आदेश देना पूरी तरह से “असंगत और हास्यास्पद” (Absurd and Farcical) था।
  3. अनुच्छेद 21 विदेशियों/गैर-नागरिकों पर भी लागू होता है:राज्य सरकार ने दलील दी थी कि ‘घोषित विदेशी’ नागरिक अधिकारों के हकदार नहीं होते। पीठ ने ‘रॉय वी. डी. बनाम केरला राज्य’ सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि:“संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) न केवल भारत के नागरिकों की रक्षा करता है, बल्कि यह समान रूप से विदेशियों/गैर-नागरिकों (Aliens) पर भी लागू होता है।”
  4. विदेश मंत्रालय का रुख:केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय (MEA) ने अदालत को सूचित किया है कि बांग्लादेश में दोनों महिलाओं का पता लगाने के लिए जांच और प्रयास जारी हैं और इसके लिए अतिरिक्त समय की मांग की गई है।

गुवाहाटी: विदेशी नागरिकता निर्धारण प्रक्रिया (Citizenship & Foreigners Tribunal Proceedings), संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गैर-नागरिकों व विदेशियों को भी प्राप्त जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधिकार का हनन करते हुए त्वरित निर्वासन (Hasty Deportation / Pushback), तथा फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (FT) द्वारा लिखित राय (Opinion) तैयार किए जाने के वास्तविक समय को लेकर असम पुलिस व प्रशासन के आचरण पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

नगांव जिले की दो महिला जहानआरा बेगम और मुमताज बेगम के निर्वासन के बाद लापता

न्यायमूर्ति कल्याण राय (कल्याण राय सुराणा) और न्यायमूर्ति प्रांजल दास की खंडपीठ ने नगांव जिले की दो महिलाओं—जहानआरा बेगम (47 वर्ष) और मुमताज बेगम (43 वर्ष)—के निर्वासन के बाद लापता होने से जुड़े मामलों में यह आदेश पारित किया। दोनों मामलों में लगभग एक समान आदेश गुरुवार को उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किए गए। केंद्र सरकार की ओर से अदालत को अवगत कराया गया है कि विदेश मंत्रालय (MEA) दोनों महिलाओं का पता लगाने का प्रयास कर रहा है, जिसके लिए अतिरिक्त समय की मांग की गई है। उच्च न्यायालय ने असम सरकार को सख्त चेतावनी दी है कि यदि वह यह साबित करने में विफल रही कि नगांव फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने दोनों महिलाओं को हिरासत में लिए जाने से पहले किस तारीख और समय पर अपनी राय तैयार की थी, तो अदालत यह विधिक उपधारणा (Presumption) करेगी कि राय तय समय पर तैयार ही नहीं की गई थी और गिरफ्तारी पूरी तरह गैर-कानूनी थी।

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उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निर्देश एवं सख्त टिप्पणियां

1. ‘समय और तारीख नहीं बताई तो मानेंगे हिरासत से पहले राय तैयार नहीं थी’

न्यायमूर्ति कल्याण राय और न्यायमूर्ति प्रांजल दास की खंडपीठ ने राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए दर्ज किया: “यदि राज्य सरकार यह विशिष्ट तारीख और समय प्रदान करने में विफल रहती है कि जहानआरा बेगम और मुमताज बेगम को ‘विदेशी’ घोषित करने वाली राय कब तैयार की गई थी, तो अदालत यह विधिक उपधारणा (Presume) करेगी कि पुलिस द्वारा दोनों को हिरासत में लिए जाने से पहले यह राय उचित समय के भीतर तैयार ही नहीं की गई थी।”

2. फॉरेन्सिक जांच और कंप्यूटर जब्त करने के निर्देश:

  • इससे पूर्व सितंबर में पारित आदेश में अदालत ने असम सरकार को यह जांचने का निर्देश दिया था कि नगांव FT ने किस समय अपनी नई राय तैयार की थी।
  • अदालत ने यहां तक स्पष्ट आदेश दिया था कि:“…यदि आवश्यक हो, तो सक्षम प्राधिकारी उस कंप्यूटर को जब्त कर फॉरेन्सिक विशेषज्ञों के पास भेजेगा जिसका उपयोग उक्त राय तैयार करने के लिए किया गया था, ताकि यह पता लगाया जा सके कि उक्त राय वास्तव में किस समय अंतिम रूप से तैयार की गई थी।”

3. 24 घंटे में देश छोड़ने का आदेश “हास्यास्पद” (Farcical & Absurd):

  • 3 सितंबर को पारित पूर्व आदेश में न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराणा और न्यायमूर्ति सुष्मिता फुकन खाउंड की पीठ ने नगांव जिला आयुक्त (DC) द्वारा ‘असम से अप्रवासी (निष्कासन) अधिनियम, 1950’ के तहत जारी आदेशों को पूरी तरह छलावा करार दिया था।
  • अदालत ने टिप्पणी की थी कि जब महिलाएं पहले से ही मटिया डिटेंशन सेंटर में पुलिस हिरासत में बंद थीं, तब उन्हें 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने का नोटिस देना “पूरी तरह से एक बेतुका और हास्यास्पद प्रस्ताव (Totally Absurd Proposition)” था।

4. परिजनों को ₹2-2 लाख का मुआवजा:

  • न्यायिक प्रक्रिया के घोर उल्लंघन और अपील के अधिकार को निष्प्रभावी करने के कारण उच्च न्यायालय ने दोनों महिलाओं के पीड़ित परिवारों को अंतरिम राहत के रूप में ₹2-2 लाख का मुआवजा देने का भी आदेश दिया था।

दोनों मामलों का चौंकाने वाला कालक्रम: कानूनी राहत के बाद जबरन निर्वासन

तारीख / चरणजहानआरा बेगम (47 वर्ष) का मामलामुमताज बेगम (43 वर्ष) का मामला
अप्रैल 2026हाईकोर्ट से राहत: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने नगांव FT के 2019 के आदेश को रद्द किया (गवाहों के बयान न आंकने पर) और मामले को नए सिरे से विचार के लिए FT को वापस भेजा।हाईकोर्ट से राहत: हाईकोर्ट ने सबूतों की अनदेखी के आधार पर पूर्व आदेश रद्द किया और नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया।
29-30 मई 202629 मई को FT के समक्ष पेश हुईं; स्थगन अर्जी खारिज; नई राय आने से पहले ही बॉर्डर पुलिस बुलाई गई और दोपहर 1:30 बजे परिसर से हिरासत में लिया गया।30 मई को FT के समक्ष उपस्थित हुईं; कहा गया कि उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा; एसपी (बॉर्डर) कार्यालय ले जाकर पोर्टल पर फोटो अपलोड की गई।
1-3 जून 20261 जून को 250 किमी दूर मटिया डिटेंशन कैंप (गोलपारा) भेजा गया। 2 जून को DC ने 24 घंटे में देश छोड़ने का आदेश दिया; 3 जून को 400 किमी दूर इरालीगूल सेंटर (श्रीभूमि) स्थानांतरित।1 जून को नगांव सदर थाने से मटिया कैंप भेजा गया; 3 जून को जहानआरा के साथ ही इरालीगूल होल्डिंग सेंटर स्थानांतरित कर दिया गया।
5 जून 2026परिवार को FT की नई राय की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) जारी की गई, जबकि वे पहले ही दूर हिरासत में थीं।कानूनी विकल्पों की तलाश के दौरान ही परिवार से संपर्क पूरी तरह काट दिया गया।
13-14 जून 2026बॉर्डर पार धकेला गया: बीएसएफ को सौंपा गया और 13-14 जून की रात असम पुलिस व एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की मौजूदगी में बांग्लादेश की ओर ‘पुश’ कर दिया गया।उसी रात (13-14 जून) जहानआरा के साथ ही बीएसएफ द्वारा सीमा पार धकेल दिया गया।
22-24 जून 2026हाईकोर्ट को गुमराह करना: परिवार की याचिका पर 22 जून को हाईकोर्ट ने BSF को निर्वासन न करने का आदेश दिया; 24 जून को केंद्र ने खुलासा किया कि दोनों को 10 दिन पहले ही निर्वासित किया जा चुका है।सरकार ने स्वीकार किया कि दोनों अब भारत में नहीं हैं; तब से दोनों महिलाएं लापता हैं।

बीएसएफ और राज्य सरकार का हलफनामा

  • बीएसएफ का पक्ष:
    • सीमा सुरक्षा बल ने अदालत में हलफनामा दायर कर कहा कि “विदेशी नागरिक तय करने की प्रक्रिया में BSF की कोई भूमिका नहीं है।”
    • बल ने केवल राज्य सरकार के प्रशासनिक आदेशों का निष्पादन किया और दोनों महिलाओं को असम पुलिस तथा मानव तस्करी रोधी इकाई (AHTU) की उपस्थिति में सीमा पार भेजा गया।
  • राज्य सरकार का तर्क:
    • राज्य ने यह तर्क देकर अपनी कार्रवाई का बचाव किया कि घोषित विदेशी अक्सर “अपने ज्ञात पते से गायब हो जाते हैं” और विदेशी होने के कारण उन्हें नागरिकों के पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं हैं।
  • हाईकोर्ट की दो-टूक व्यवस्था:
    • अदालत ने राज्य के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के नजीर फैसले रॉय वी.डी. बनाम केरल राज्य का हवाला देते हुए व्यवस्था दी कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण न केवल भारत के नागरिकों को, बल्कि विदेशियों (Aliens) को भी समान रूप से प्राप्त है। विधि द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया के बिना किसी को भी सीमा पार नहीं फेंका जा सकता।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • संविधान का अनुच्छेद 21 एवं विदेशी नागरिक:
    • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य (1996) और रॉय वी.डी. मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति—चाहे वह नागरिक हो या गैर-नागरिक—को निष्पक्ष सुनवाई और जीवन की सुरक्षा का अधिकार है।
    • जब किसी व्यक्ति की अपील उच्च न्यायालय के विचाराधीन हो, तो उसे बलपूर्वक देश से बाहर भेजना न्यायिक प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का घोर हनन है।
  • फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (FT) आदेश, 1964 एवं प्राकृतिक न्याय:
    • ट्रिब्यूनल एक अर्द्ध-न्यायिक निकाय है। आदेश पारित होने और उसकी प्रमाणित प्रति उपलब्ध होने से पहले ही किसी व्यक्ति को हिरासत में लेकर निर्वासित कर देना न्यायिक समीक्षा के संवैधानिक अधिकार को समाप्त कर देता है।
  • इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट, 1950 का दुरुपयोग:
    • हिरासत में बंद व्यक्ति को देश छोड़ने का 24 घंटे का नोटिस देना प्रशासनिक शक्तियों के दुर्भावनापूर्ण और यांत्रिक प्रयोग का उदाहरण है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: *जहानआरा बेगम बनाम असम राज्य व अन्य संयुक्त रूप से मुमताज बेगम बनाम असम राज्य व अन्य [रिट याचिकाएं – गुवाहाटी उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति कल्याण राय (कल्याण राय सुराणा) एवं न्यायमूर्ति प्रांजल दास (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 7 अक्टूबर 2026 (वेबसाइट पर अपलोड: 8-9 अक्टूबर 2026)
  • प्रतिवादी: असम सरकार, केंद्रीय गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय (MEA), सीमा सुरक्षा बल (BSF)
  • प्रदत्त अंतरिम मुआवजा: दोनों महिलाओं के परिवारों को ₹2-2 लाख
  • प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (विदेशियों को भी प्राप्त जीवन व स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 226
    • विदेशी नागरिक अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946)
    • विदेशी (न्यायाधिकरण) आदेश, 1964
    • असम से अप्रवासी (निष्कासन) अधिनियम, 1950
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीर:
    • रॉय वी.डी. बनाम केरल राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘अनुच्छेद 21 का सुरक्षा कवच केवल नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विदेशी नागरिकों पर भी लागू होता है।’
  • वर्तमान स्थिति: विदेश मंत्रालय दोनों लापता महिलाओं का पता लगाने में जुटा; गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम सरकार को ट्रिब्यूनल के आदेश का सटीक समय और कंप्यूटर रिकॉर्ड पेश करने का अंतिम अवसर दिया।

Foreigner Missing: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतगुवाहाटी उच्च न्यायालय (Gauhati High Court)
पीड़ित महिलाएंजहानारा बेगम (नगांव जिला) और मुमताज बेगम
मूल संस्थाएंनगांव फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (FT), असम सीमा पुलिस, BSF व केंद्र सरकार
मुख्य कानूनी मुद्दाअनुच्छेद 21 के तहत गैर-नागरिकों/विदेशियों को प्राप्त जीवन व स्वतंत्रता का अधिकार और बिना अंतिम कानूनी प्रक्रिया डिपोर्टेशन
अदालत का अंतरिम मुआवजापीड़ितों के परिवारों को ₹2-2 लाख का मुआवजा देने का पूर्व आदेश

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