अदालत के निर्देश और सरकार का आश्वासन
- नियमित परिवहन संचालन: सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद सॉलिसिटर जनरल ने आश्वासन दिया कि प्रशासन मेट्रो और ट्रेन सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय उन्हें अनुपातिक और नियंत्रित (Regulated) तरीके से चलाएगा।
- ट्रैफिक एडवाइजरी: कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे समाचार पत्रों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर स्पष्ट ट्रैफिक एडवाइजरी जारी करें ताकि नागरिकों को आवागमन में कोई असुविधा न हो।
- आगे का घटनाक्रम: इस आदेश के बावजूद 10 अक्टूबर को मेट्रो स्टेशन बंद रखे जाने के कारण 11 अक्टूबर (रविवार) को सुप्रीम कोर्ट ने गृह सचिव, पुलिस कमिश्नर और DMRC चेयरमैन को अवमानना (Contempt) नोटिस जारी किया था।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और विपक्षी दलों द्वारा आहूत विरोध-प्रदर्शनों से पहले दिल्ली पुलिस और प्रशासन द्वारा अपनाए गए सुरक्षा उपायों, दिल्ली मेट्रो के 57 प्रमुख स्टेशनों के प्रवेश द्वारों को बंद करने, दिल्ली आने वाली मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द करने, सड़कों पर व्यापक बैरिकेडिंग, तथा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) व अनुच्छेद 21 के तहत आम नागरिकों के निर्बाध आवागमन के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-सदस्यीय विशेष पीठ ने शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026 को पारित अपने विस्तृत आदेश में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वे मेट्रो और रेलगाड़ियों के आवागमन पर “पूर्ण प्रतिबंध” (No Complete Prohibition) न लगाएं, बल्कि आनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन करते हुए उन्हें विनियमित (Regulated Manner) तरीके से संचालित करें ताकि दिल्ली और एनसीआर के लाखों आम नागरिकों को कोई असुविधा न हो। शीर्ष अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों को ‘आनुपातिकता के सिद्धांत’ (Principle of Proportionality) की याद दिलाते हुए दो-टूक कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पूरे शहर के सार्वजनिक परिवहन तंत्र को ठप नहीं किया जा सकता।
शीर्ष अदालत के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां
1. ‘मक्खी मारने के लिए हथौड़े का उपयोग नहीं कर सकते’ (Principle of Proportionality)
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने प्रशासनिक उपायों की विधिक सीमाओं को रेखांकित किया: *”प्रत्येक ऐसी स्थिति के लिए आप जिस एक सुप्रतिष्ठित सिद्धांत का पालन करते हैं, वह है ‘आनुपातिकता का सिद्धांत’ (Principle of Proportionality)। यदि आपको कुछ अवांछित परिस्थितियों से बचना है, तो कदम केवल उसी सीमा तक उठाएं जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि आप उससे बच रहे हैं। परंतु इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आप एक मक्खी को मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल करेंगे (You will use a hammer to kill a fly)।”
जब सॉलिसिटर जनरल मेहता ने स्पष्टीकरण चाहा कि अदालत की यह टिप्पणी केवल एक रूपक (Analogy) है और इसे यह न समझा जाए कि सरकार अत्यधिक बल प्रयोग कर रही है, तो सीजेआई ने दोहराया:
- “आप अत्यधिक सतर्कता बरतिए, उसमें कुछ भी गलत नहीं है। आप कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन वह जिम्मेदारी केवल सरकारी संपत्ति की रक्षा करने के बारे में नहीं है; वह लोगों की रक्षा करने के बारे में भी है। यही आपका संप्रभु कर्तव्य है।”
2. ‘लाखों आम नागरिकों, छात्रों, बुजुर्गों और मरीजों की चिंता’
पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत का प्राथमिक सरोकार किसी प्रदर्शनकारी या संगठन को लेकर नहीं, बल्कि आम जनता के दैनिक जीवन को लेकर है: *”हमारी चिंता किसी विशिष्ट प्रदर्शनकारी या व्यक्ति को लेकर नहीं है। हमारी गंभीर चिंता लाखों यात्रियों (Hundreds of thousands of commuters) को लेकर है, जो गुड़गांव, ग्रेटर नोएडा, पूर्वी दिल्ली और दक्षिण दिल्ली से अपनी आजीविका के लिए रोजाना आते-जाते हैं। इन ट्रेनों में छात्र सफर करते हैं, कर्मचारी जाते हैं, बुजुर्ग और मरीज यात्रा करते हैं। हम आम नागरिकों की ओर से बात कर रहे हैं। हर किसी के पास अपनी निजी कार या निजी सुविधाएं नहीं होतीं।”
- सीजेआई ने अदालती कामकाज का उदाहरण देते हुए कहा कि अधिकांश वकीलों के पास निजी कारें हो सकती हैं, परंतु उनके मुंशियों (Clerks) और अन्य सहायक कर्मचारियों का क्या होगा? स्टेशन बंद करने के बजाय पुलिस को फ्रिस्किंग (तलाशी), मेटल डिटेक्टर और सीसीटीवी निगरानी जैसे वैकल्पिक उपाय अपनाने चाहिए।
3. ‘पूर्ण प्रतिबंध’ (Prohibition) और ‘नियमन’ (Regulation) के बीच संवैधानिक भेद:
पीठ ने आदेश में दर्ज किया: *”ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासनिक अधिसूचनाएं अतिवादी (Overreaching) हैं क्योंकि वे आवश्यक सार्वजनिक परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती हैं। हमारे इस संकेत पर कि मेट्रो और ट्रेनों के पूर्ण ‘प्रतिबंध’ (Total Prohibition) और ‘नियमन’ (Regulation) के बीच एक स्पष्ट विधिक अंतर मौजूद है, विद्वान सॉलिसिटर जनरल ने उचित रूप से सहमति व्यक्त की है कि वे अधिकारियों को इन प्रतिबंधों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए कहेंगे। नतीजतन, वे मेट्रो और रेल सेवाओं को इस तरह विनियमित तरीके से संचालित करने की अनुमति देंगे कि आनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन करते हुए दिल्ली की आम जनता को कोई असुविधा न हो।”
सुनवाई का घटनाक्रम और वकीलों की दलीलें
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, एन. हरिहरन, गोपाल शंकरनारायणन, नित्या रामकृष्णन और अधिवक्ता प्रशांत भूषण व वृंदा ग्रोवर ने दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति न दिए जाने और व्यापक प्रतिबंधों के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
- आयोजकों की अनुपस्थिति: भोजन-पूर्व सत्र में जब पीठ ने पूछा कि क्या वकील आयोजकों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, तो उन्होंने ‘ना’ कहा। पीठ ने कहा कि वह किसी आयोजक की मौजूदगी में संतुलन साधते हुए सीमित संख्या में निहत्थे लोगों को शर्तों के साथ प्रदर्शन की अनुमति देने पर विचार कर सकती है। हालांकि, दोपहर के सत्र में सिब्बल ने सूचित किया कि वे किसी आयोजक को साथ नहीं लाए हैं।
- ट्रेनों के रद्द होने पर सिब्बल की आपत्ति: भारतीय रेलवे द्वारा 10 अक्टूबर को नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन आने-जाने वाली मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द करने पर सिब्बल ने दलील दी कि इसका मतलब यह होगा कि केरल से चलने वाली ट्रेन भी नई दिल्ली नहीं पहुंच सकेगी।
- सड़कों पर बैरिकेडिंग और मस्जिदों में पुलिस जाने का आरोप:
- वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने बताया कि सड़कों पर भारी बैरिकेडिंग से शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाना असंभव हो गया है।
- वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने आरोप लगाया कि पुलिस मस्जिदों में जाकर लोगों को प्रदर्शन में शामिल न होने की चेतावनी दे रही है, जो नागरिकों को डराने जैसा है। इस पर सीजेआई ने कहा कि बिना ठोस सामग्री और पुलिस का पक्ष सुने वे इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश
- मेट्रो और ट्रेनों का विनियमित संचालन: मेट्रो स्टेशनों को पूरी तरह सील करने की बजाय आवश्यकतानुसार नियंत्रित और विनियमित किया जाए।
- सार्वजनिक ट्रैफिक एडवाइजरी: दिल्ली पुलिस और प्रशासन को निर्देश दिया गया कि वे समाचार पत्रों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर विस्तृत ट्रैफिक एडवाइजरी प्रकाशित करें, जिसमें स्पष्ट बताया जाए कि कौन सी सड़कें खुली हैं और कौन सी बंद।
- सड़क बैरिकेडिंग की समीक्षा: सड़कों पर लगाए गए बैरिकेड्स की तत्काल समीक्षा की जाए ताकि आपातकालीन वाहनों और सामान्य यात्रियों को रास्ता मिल सके।
- चार दिनों में अनुपालन रिपोर्ट: डीएमआरसी (DMRC), रेलवे अधिकारियों और दिल्ली पुलिस (ट्रैफिक) को चार दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- आनुपातिकता का सिद्धांत (Doctrine of Proportionality):
- के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) और अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में 5-जज संविधान पीठ ने स्थापित किया है कि जब राज्य किसी वैध उद्देश्य (जैसे लोक व्यवस्था) के लिए मौलिक अधिकारों को सीमित करता है, तो लागू किए गए उपाय न्यूनतम आक्रामक (Least Intrusive / Minimum Invasiveness) होने चाहिए। किसी संभावित विरोध को रोकने के लिए पूरे शहर की लाइफलाइन (मेट्रो और रेल) बंद कर देना आनुपातिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
- अनुच्छेद 19(1)(d) (स्वतंत्र संचरण का अधिकार) बनाम अनुच्छेद 19(1)(b) (प्रदर्शन का अधिकार):
- सर्वोच्च न्यायालय ने संतुलन साधते हुए रेखांकित किया कि जिस प्रकार प्रदर्शनकारियों को अपनी बात रखने का अधिकार है, उसी प्रकार आम नागरिकों को भी काम पर जाने, अस्पताल पहुंचने और आजीविका कमाने के लिए स्वतंत्र संचरण का समान अधिकार प्राप्त है। राज्य एक अधिकार की आड़ में दूसरे नागरिक वर्ग के जीवन को बंधक नहीं बना सकता।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: विशेष रिट याचिकाएं (दिल्ली विरोध-प्रदर्शन एवं मेट्रो प्रतिबंध चुनौती) [सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (3-जज खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- केंद्र सरकार एवं दिल्ली पुलिस की ओर से: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, ए.एम. सिंघवी, एन. हरिहरन, गोपाल शंकरनारायणन, नित्या रामकृष्णन, अधिवक्ता प्रशांत भूषण व वृंदा ग्रोवर
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(d) (आवागमन की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(b) (सभा का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन व आजीविका) एवं अनुच्छेद 32
- दिल्ली मेट्रो रेलवे (परिचालन एवं अनुरक्षण) अधिनियम, 2002
- रेलवे अधिनियम, 1989 एवं दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘प्रशासनिक प्रतिबंधों में आनुपातिकता और न्यूनतम दखलंदाजी अनिवार्य शर्त है; अत्यधिक व्यापक प्रतिबंध असंवैधानिक हैं।’
- अंतिम परिणाम: 57 मेट्रो स्टेशनों और ट्रेनों पर पूर्ण प्रतिबंध के आदेश पर रोक; सार्वजनिक परिवहन को आम नागरिकों के लिए विनियमित तरीके से चलाने और समाचार पत्रों/ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर व्यापक ट्रैफिक एडवाइजरी जारी करने का सख्त निर्देश।
CJP Protest: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची एवं जस्टिस वी. मोहना |
| मुख्य मुद्दा | दिल्ली में प्रदर्शन के नाम पर 57 मेट्रो स्टेशन बंद करने और ट्रेनें रद्द करने का आदेश |
| कानूनी सिद्धांत | आनुपातिकता का सिद्धांत (Principle of Proportionality) |
| अदालत का फैसला | मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध (Complete Prohibition) पर रोक; सेवाओं को नियंत्रित (Regulated) ढंग से चलाने का आदेश। |

