Wednesday, October 14, 2026
HomeSupreme CourtNo Understanding: हाईकोर्ट को कानून की समझ नहीं; धारा 304 भाग I...

No Understanding: हाईकोर्ट को कानून की समझ नहीं; धारा 304 भाग I और भाग II के अंतर को समझे बिना लापरवाह तरीके से हत्या की अपील का निपटारा

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और आदेश

  1. “अत्यंत लापरवाही भरा रवैया” (Slipshod Manner):न्यायामूर्ति पारदीवाला की पीठ ने हाईकोर्ट के इस रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया:“याचिकाकर्ता हाईकोर्ट गया। हाईकोर्ट ने, हमेशा की तरह, बेहद लापरवाही भरे तरीके से और कानून की बिना किसी समझ के, सजा को धारा 302 से बदलकर धारा 304 पार्ट II करके अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।”
  2. चोटों की प्रकृति और हथियार की अनदेखी:अदालत ने कहा कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मृतका को लगी चोटों की गंभीर प्रकृति, अपराध में इस्तेमाल किए गए हथियार और घटना के मूल कारण (Genesis of Occurrence) को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।
  3. IPC 304 Part I और Part II का कानूनी अंतर:जस्टिस पारदीवाला की पीठ ने स्मरण कराया कि सुप्रीम कोर्ट पूर्व में (2023 के अपने फैसले में) विस्तृत व्याख्या दे चुका है:
    • धारा 304 पार्ट I: तब लागू होती है जब अपराध के पीछे ‘अपराधिक इरादा’ (Guilty Intention) मौजूद हो।
    • धारा 304 पार्ट II: तब लागू होती है जब मृत्यु कारित करने का विशिष्ट इरादा न हो, लेकिन इस बात का ‘अपराधिक ज्ञान’ (Guilty Knowledge) हो कि कृत्य से मौत होना संभावित है।

नई दिल्ली: भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 300 के अपवाद 4 (Exception 4 – अचानक झगड़ा / Sudden Fight), धारा 302 (हत्या के लिए दंड) बनाम धारा 304 भाग I (दोषपूर्ण आशय / Guilty Intention के साथ गैर-इरादतन हत्या) एवं धारा 304 भाग II (दोषपूर्ण ज्ञान / Guilty Knowledge, बिना विशिष्ट आशय के गैर-इरादतन हत्या) के विधिक भेद, प्रयुक्त घातक हथियारों व चोटों की प्रकृति की अपीलीय अनदेखी, तथा आपराधिक न्यायशास्त्र में उच्च न्यायालयों द्वारा ‘सतही व लापरवाह’ (Slipshod Approach) निर्णयों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर विधिक आपत्ति दर्ज की है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने 14 अक्टूबर 2026 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की, जिसमें निचली अदालत द्वारा धारा 302 IPC के तहत दी गई आजीवन कारावास की सजा को आंशिक रूप से घटाकर धारा 304 भाग II के तहत 10 वर्ष के सश्रम कारावास में बदल दिया गया था। शीर्ष अदालत ने न केवल हाईकोर्ट के आदेश को विधिक समझ से परे माना, बल्कि अभियुक्त को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों न हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई हत्या (धारा 302 IPC) की मूल सजा को पुनः बहाल कर दिया जाए। मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर 2026 को तय की गई है।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं तल्ख टिप्पणियां

1. ‘कानून की कोई समझ नहीं, हमेशा की तरह लापरवाह रवैया’

खंडपीठ ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा धारा 302 को धारा 304 भाग II में बदलने के तरीके पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए दर्ज किया: “याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर की थी। उच्च न्यायालय ने, हमेशा की तरह अत्यंत लापरवाह तरीके से (Very slipshod manner) और कानून की किसी भी समझ के बिना (Without any understanding of law), दोषसिद्धि को IPC की धारा 302 से बदलकर धारा 304 भाग II में परिवर्तित करते हुए अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।”

2. धारा 304 भाग I बनाम भाग II का बुनियादी अंतर:

पीठ ने रेखांकित किया कि न्यायमूर्ति पारदीवाला की पीठ ने वर्ष 2023 में दिए गए एक विस्तृत फैसले में यह पूरी तरह स्पष्ट किया था कि धारा 304 का भाग I और भाग II कब लागू होता है:

  • धारा 304 भाग I: तब लागू होता है जब अभियुक्त के पास मृत्यु कारित करने या ऐसी शारीरिक क्षति पहुंचाने का ‘दोषपूर्ण आशय’ (Guilty Intention) मौजूद हो जिससे मृत्यु होना संभाव्य है।
  • धारा 304 भाग II: तब लागू होता है जब अभियुक्त का कोई विशिष्ट ‘आशय’ नहीं होता, परंतु उसके पास यह ‘दोषपूर्ण ज्ञान’ (Guilty Knowledge) होता है कि उसके इस कृत्य से मृत्यु कारित होना संभाव्य है।

3. चोटों, हथियार और घटना के उद्भव (Genesis) की घोर अनदेखी:

  • शीर्ष अदालत ने पाया कि उच्च न्यायालय ने फैसले तक पहुंचने में अपराध के मूल तत्वों की उपेक्षा की:
    • मृतका को आई चोटों की गंभीरता और प्रकृति,
    • अपराध को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल किया गया हथियार,
    • और घटना का मूल कारण व उद्भव (Genesis of Occurrence)।
  • अदालत ने छत्तीसगढ़ राज्य को नोटिस जारी करने के साथ-साथ उच्च न्यायालय से स्पष्टीकरण तलब किया है कि इस फैसले को क्यों न निरस्त कर दिया जाए।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं फैसलों का कालक्रम

चरण / मंचघटनाक्रम एवं न्यायिक निर्णय
घटना का विवरणअभियोजन के अनुसार, मृतका रैमोती पटेल बांस के पेड़ के नीचे खून से लथपथ हालत में पाई गई थीं। पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि अभियुक्त चिंतामई ने उन पर जानलेवा हमला किया है। बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
एफआईआर व आरोप पत्रमृतका के पति (शिकायतकर्ता) ने एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस जांच के उपरांत अभियुक्त के विरुद्ध IPC की धारा 302 के तहत आरोप तय किए गए।
सत्र न्यायालय का निर्णयप्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सरायपाली (जिला महासमुंद, छत्तीसगढ़) ने साक्ष्यों और चोटों की पुष्टि के आधार पर अभियुक्त चिंतामई को धारा 302 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दृष्टिकोणहाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों (गुरमुख सिंह बनाम हरियाणा राज्य 2009, संजीव नंदा 2012, और अर्जुन बनाम छत्तीसगढ़ राज्य 2017) का हवाला देते हुए माना कि मामला धारा 300 के अपवाद 4 के तहत आता है; अभियुक्त का इरादा मारने का नहीं था, केवल ज्ञान था। हाईकोर्ट ने धारा 302 रद्द कर धारा 304 भाग II के तहत 10 वर्ष सश्रम कारावास की सजा दी।
सुप्रीम कोर्ट (14 अक्टूबर 2026)हाईकोर्ट के कानूनी विश्लेषण को त्रुटिपूर्ण माना; अभियुक्त को धारा 302 बहाल करने का कारण बताओ नोटिस जारी।

Also Read; Electoral Reforms: दिल्ली में SCBA, हाईकोर्ट और सभी जिला बार एसो. के चुनाव एक ही दिन क्यों न हों? इससे एक बार-एक वोट लागू होगा और वोटों की बहुलता की समस्या हल होगी

विधिक एवं वैधानिक विश्लेषण: धारा 300 अपवाद 4 की अनिवार्यताएं

आपराधिक न्यायशास्त्र के तहत किसी हत्या (धारा 302) को धारा 300 के अपवाद 4 (अचानक झगड़ा) के तहत गैर-इरादतन हत्या में बदलने के लिए निम्नलिखित चार अनिवार्य शर्तों का एक साथ साबित होना आवश्यक है:

  1. कृत्य बिना किसी पूर्व-चिंतन (Without Premeditation) के अचानक हुआ हो,
  2. कृत्य अचानक हुए झगड़े (Sudden Fight) में हुआ हो,
  3. आवेश के क्षण में अचानक गर्मागर्मी (Heat of Passion upon a sudden quarrel) में किया गया हो,
  4. अपराधी ने कोई अनुचित लाभ न उठाया हो या क्रूर या असामान्य तरीके से कार्य न किया हो (Offender not taking undue advantage or acting in a cruel or unusual manner)।
 ┌────────────────────────────────────────────────────────┐
मानव वध की श्रेणियां और न्यायिक परीक्षण │
────────────┬────────────────────────────┘
│
┌────────────────────────────────────┼────────────────────────────────────┐
▼ ▼ ▼
【धारा 302 IPC: हत्या】 【धारा 304 भाग I: गैर-इरादतन हत्या】 【धारा 304 भाग II: गैर-इरादतन हत्या】
• आशय + ज्ञान दोनों विद्यमान। • मृत्यु कारित करने का **दोषपूर्ण • कोई पूर्व आशय (No Intention) नहीं।
• क्रूरतापूर्वक नाजुक अंगों पर घातक आशय (Guilty Intention)** मौजूद, • केवल **दोषपूर्ण ज्ञान (Guilty**
हथियार से प्रहार। परंतु अपवादों (1 से 5) से आच्छादित। **Knowledge)** कि कृत्य घातक हो सकता है।
• सजा: **आजीवन कारावास या फांसी**। • सजा: **आजीवन कारावास या 10 वर्ष**। • सजा: **अधिकतम 10 वर्ष तक कारावास**।
  • हाईकोर्ट की विधिक त्रुटि: यदि किसी असहाय महिला पर जानलेवा हमला कर उसे खून से लथपथ छोड़ दिया जाता है और सिर पर गंभीर प्रहार किए जाते हैं, तो अभियुक्त ने “क्रूरता और असामान्य तरीके” से काम किया। ऐसी स्थिति में अपवाद 4 लागू नहीं हो सकता, और यदि अपवाद लागू माना भी जाता, तो कृत्य ‘आशय’ के कारण धारा 304 भाग I में आता, न कि भाग II में।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: चिंतामई बनाम छत्तीसगढ़ राज्य [आपराधिक अपील / विशेष अनुमति याचिका (SLP Crl) – सर्वोच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 14 अक्टूबर 2026
  • अगली सुनवाई की तिथि: 18 नवंबर 2026
  • संबद्ध निचली अदालतें:
    • ट्रायल कोर्ट: प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सरायपाली, जिला महासमुंद (दोषसिद्धि: धारा 302 IPC, आजीवन कारावास)
    • अपीलीय कोर्ट: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर (सजा संशोधित: धारा 304 भाग II, 10 वर्ष कारावास)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) — धारा 300 अपवाद 4, धारा 302 (हत्या) एवं धारा 304 भाग I व भाग II (गैर-इरादतन हत्या) [समतुल्य: BNS 2023 की धारा 101, 103 व 105]
  • संबद्ध न्यायिक नजीरें:
    • गुरमुख सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2009, SC)
    • राज्य बनाम संजीव नंदा (2012, SC)
    • अर्जुन बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2017, SC)
  • अंतिम परिणाम: सुप्रीम कोर्ट ने अभियुक्त और छत्तीसगढ़ राज्य को नोटिस जारी कर पूछा है कि हाईकोर्ट का त्रुटिपूर्ण फैसला रद्द कर ट्रायल कोर्ट की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा क्यों न बहाल की जाए; मामले की अंतिम सुनवाई 18 नवंबर 2026 को होगी।

No Understanding:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
ट्रायल कोर्ट का फैसलाप्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सरायपाली (महासमुंद) द्वारा IPC 302 के तहत उम्रकैद।
हाईकोर्ट का फैसलासजा घटाकर IPC 304 Part II (10 वर्ष सश्रम कारावास) की।
सुप्रीम कोर्ट का रुखआरोपी व राज्य सरकार को कारण बताओ नोटिस; पूछा कि हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर हत्या (IPC 302) की सजा क्यों न बहाल की जाए।
अगली सुनवाई18 नवंबर 2026
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
clear sky
25.6 ° C
25.6 °
25.6 °
77 %
1.6kmh
0 %
Wed
25 °
Thu
32 °
Fri
32 °
Sat
32 °
Sun
33 °

Recent Comments