Wednesday, October 14, 2026
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Commercial Decree: मूल वाद ₹2 करोड़ के आर्थिक क्षेत्राधिकार में था तो डिक्री राशि ₹2 करोड़ से कम होने पर भी हाईकोर्ट निष्पादन कर सकता है; जानें मामला

हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और CPC की व्याख्या

  1. CPC की धारा 37 और 38 (Sections 37 & 38 of CPC):अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 37 और 38 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि एक डिक्री या तो उसी अदालत द्वारा निष्पादित की जा सकती है जिसने इसे पारित किया था, या उस अदालत द्वारा जिसे यह स्थानांतरित (Transfer) की गई हो।
  2. कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट पर CPC का लागू होना:न्यायामूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने स्पष्ट किया कि CPC की धारा 37 और 38 के प्रावधान कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 के तहत पारित डिक्री पर भी समान रूप से लागू होते हैं।
  3. आर्थिक सीमा में परिवर्तन से अधिकार क्षेत्र समाप्त नहीं होता:अदालत ने अपने आदेश में दर्ज किया:“इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि डिक्री पारित करने वाली अदालत की आर्थिक सीमा में परिवर्तन या डिक्री की राशि कम होने से उस अदालत की डिक्री को निष्पादित करने की शक्ति छिन जाएगी। इस न्यायालय के पास ₹2 करोड़ से अधिक के मुकदमों की सुनवाई का क्षेत्राधिकार है, और केवल यही न्यायालय उस मुकदमे में डिक्री निष्पादित कर सकता है जो ₹2 करोड़ से अधिक मूल्य के लिए दायर किया गया था, भले ही डिक्रीत राशि (Decretal Amount) ₹2 करोड़ से कम हो।”

नई दिल्ली: वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015) के तहत दिल्ली हाईकोर्ट के वाणिज्यिक प्रभाग (Commercial Division) का ₹2 करोड़ का विनिर्दिष्ट मूल्य/आर्थिक क्षेत्राधिकार (Specified Value / Pecuniary Jurisdiction), सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 37 और धारा 38 के तहत डिक्री निष्पादन के सार्वभौमिक नियम (Court by which Decree may be Executed), तथा मूल वाद की विधिक स्वीकार्यता बनाम निष्पादित होने वाली अंतिम राशि (Decretal Amount) में कमी के प्रभाव पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट और व्यावहारिक व्यवस्था दी है।

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की एकल पीठ ने ओजोन स्पा प्राइवेट लिमिटेड (Ozone Spa Private Limited) द्वारा दायर निष्पादन याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्णय देनदारों (Judgment Debtors) की प्रारंभिक आपत्ति को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्धारित किया कि यदि कोई वाणिज्यिक वाद दायर किए जाने के समय उच्च न्यायालय के आर्थिक क्षेत्राधिकार (₹2 करोड़ से अधिक) के भीतर था, तो पक्षों के समझौते के परिणामस्वरूप डिक्री की राशि घटकर ₹2 करोड़ से नीचे (वर्तमान मामले में ₹1.19 करोड़) आ जाने के बावजूद उच्च न्यायालय के पास उस डिक्री को निष्पादित करने का पूर्ण अधिकार बना रहता है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘डिक्री राशि में बदलाव अदालत के निष्पादन क्षेत्राधिकार को समाप्त नहीं करता’

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने निर्णय देनदारों की उस दलील को खारिज करते हुए दर्ज किया जिसमें तर्क दिया गया था कि ₹1.19 करोड़ की डिक्री को केवल जिला अदालत ही निष्पादित कर सकती है: “यह तर्क कि डिक्री पारित करने वाले न्यायालय की आर्थिक सीमा में परिवर्तन या डिक्री राशि का कम हो जाना उस अदालत की उक्त डिक्री को निष्पादित करने की शक्ति को भी छीन लेगा, स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

2. वाणिज्यिक न्यायालयों पर CPC की धारा 37 और 38 का लागू होना:

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 के तहत पारित डिक्री पर भी सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 37 और धारा 38 के सामान्य सिद्धांत पूरी तरह लागू होते हैं:
    • धारा 38 CPC: यह प्रावधान करती है कि डिक्री का निष्पादन या तो उस न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसने उसे पारित किया था (Court which passed it), या उस न्यायालय द्वारा जिसे वह निष्पादन हेतु भेजी/अंतरित की गई हो।
    • धारा 37 CPC: ‘डिक्री पारित करने वाले न्यायालय’ की परिभाषा को स्पष्ट करती है।
  • अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि आर्थिक क्षेत्राधिकार में संशोधन या वाद मूल्य में कमी स्वतः किसी अदालत को उसके द्वारा पहले से पारित डिक्रियों को निष्पादित करने के अधिकार से वंचित नहीं करती।

3. सिद्धांत का सूत्रपात:

पीठ ने क्षेत्राधिकार के दायरे को स्पष्ट करते हुए घोषित किया: “इस न्यायालय के पास ₹2 करोड़ से अधिक मूल्य के वादों की सुनवाई करने का मूल क्षेत्राधिकार है, और केवल यही न्यायालय उस वाद में पारित डिक्री को निष्पादित कर सकता है जो ₹2 करोड़ से अधिक मूल्य के लिए दायर किया गया था, भले ही बाद में डिक्री की राशि (Decretal Amount) ₹2 करोड़ से कम हो गई हो।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विवाद का कालक्रम

तारीख / चरणघटनाक्रम एवं तथ्य
दिसंबर 2013ओजोन स्पा (डिक्री धारक) और को-इनसेप्ट हॉस्पिटैलिटी (निर्णय देनदार) के बीच फ्रैंचाइज़ी समझौता हुआ, जिसके तहत को-इनसेप्ट को दिल्ली के राजौरी गार्डन में ओजोन ब्रांड के तहत जिम, स्पा और सैलून चलाने का अधिकार दिया गया।
मूल वाणिज्यिक वादरॉयल्टी भुगतान में विवाद के बाद ओजोन स्पा ने दिल्ली हाईकोर्ट में ₹2.53 करोड़ की वसूली और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग करते हुए वाणिज्यिक वाद (CS Comm) दायर किया।
जुलाई 2018 (सहमति डिक्री)दोनों पक्षों ने मध्यस्थता/बातचीत के जरिए समझौता कर लिया। हाईकोर्ट ने इस समझौते के आधार पर ₹1.19 करोड़ के भुगतान की सहमति डिक्री (Consent Decree) पारित की।
समझौते का कथित उल्लंघनओजोन स्पा ने आरोप लगाया कि देनदारों ने पोस्ट-डेटेड चेक जारी नहीं किए, रॉयल्टी नहीं दी और बिना किसी पूर्व सूचना के राजौरी गार्डन स्थित आउटलेट को बंद कर दिया।
निष्पादन याचिका में आपत्तिओजोन स्पा द्वारा ₹1.19 करोड़ की डिक्री निष्पादित कराने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में अर्जी लगाने पर प्रतिवादियों ने आपत्ति जताई कि ₹2 करोड़ से कम की राशि के कारण यह याचिका उच्च न्यायालय के वाणिज्यिक प्रभाग में पोषणीय (Maintainable) नहीं है।
हाईकोर्ट का फैसला (अक्टूबर 2026)हाईकोर्ट ने आपत्ति खारिज की, याचिका को पोषणीय माना और आगे की कार्यवाही के लिए रोस्टर बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया।

विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

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वाणिज्यिक डिक्री निष्पादन: क्षेत्राधिकार का ढांचा │
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【मूल वाद का आर्थिक क्षेत्राधिकार】 【सहमति डिक्री में राशि की कमी】 【CPC धारा 38: निष्पादन का अधिकार】
• वाद दायर करते समय दावा: ₹2.53 करोड़। • पक्षों में समझौता: ₹1.19 करोड़। • डिक्री केवल उसी अदालत द्वारा निष्पादित
• दिल्ली HC वाणिज्यिक प्रभाग का न्यूनतम • यद्यपि ₹1.19 करोड़ < ₹2 करोड़ थ्रेशोल्ड, की जाएगी जिसने इसे पारित किया था।
थ्रेशोल्ड (₹2 करोड़) पूर्णतः संतुष्ट। परंतु यह नया वाद नहीं, बल्कि मूल आदेश • डिक्री की राशि कम होने से क्षेत्राधिकार
का निष्पादन (Execution) मात्र है। जिला अदालत में स्वतः ट्रांसफर नहीं होता।
  • ‘फोरम शॉपिंग’ और प्रक्रियात्मक देरी पर रोक:
    • यदि अदालतें यह व्याख्या अपनातीं कि डिक्री की राशि कम होते ही वादी को निष्पादन के लिए जिला अदालत जाना पड़ेगा, तो यह सफल डिक्री धारकों के लिए एक अंतहीन प्रक्रियात्मक दुष्चक्र बन जाता। पक्षों के बीच समझौते से यदि राशि घटती है, तो इसका दंड वादी को क्षेत्राधिकार छीनकर नहीं दिया जा सकता।
  • वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 की धारा 12 (निर्दिष्ट मूल्य):
    • वाणिज्यिक प्रभाग के पास मामलों के त्वरित निस्तारण का अधिदेश है। निष्पादन कार्यवाही मूल वाद की ही निरंतरता (Continuation of the Original Suit) होती है। इसलिए जहां मूल वाद का संज्ञान वैध था, वहां निष्पादन का अधिकार भी उसी न्यायालय में अंतर्निहित रहता है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: ओजोन स्पा प्राइवेट लिमिटेड बनाम को-इनसेप्ट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड व अन्य [निष्पादन याचिका (Ex. Pet.) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • डिक्री धारक (ओजोन स्पा) की ओर से: अधिवक्ता राजेश महिंद्रू
    • निर्णय देनदारों की ओर से: अधिवक्ता अमित जॉर्ज, संजेला गुप्ता, कुणाल खेर, रूपम झा और मंजू गौतम
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — धारा 37 (डिक्री पारित करने वाले न्यायालय की परिभाषा), धारा 38 (जिस न्यायालय द्वारा डिक्री निष्पादित की जा सकेगी) एवं आदेश XXI
    • वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015) — धारा 2(1)(i) एवं धारा 12 (निर्दिष्ट मूल्य – दिल्ली HC हेतु ₹2 करोड़ की सीमा)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • डिक्री निष्पादन का क्षेत्राधिकार: ‘मूल वाद यदि उच्च न्यायालय के वाणिज्यिक प्रभाग के ₹2 करोड़ के आर्थिक क्षेत्राधिकार के भीतर वैध रूप से दायर था, तो समझौते या अन्य कारणों से डिक्री राशि के ₹2 करोड़ से नीचे आ जाने पर भी डिक्री पारित करने वाले न्यायालय का निष्पादन क्षेत्राधिकार समाप्त नहीं होता।’
  • अंतिम परिणाम: निष्पादन याचिका की पोषणीयता के खिलाफ निर्णय देनदारों की आपत्ति खारिज; निष्पादन याचिका को नियमित रोस्टर बेंच के समक्ष आगे की कार्यवाही हेतु सूचीबद्ध किया गया।

Commercial Decree:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद
मूल मुकदमा (Original Suit)फ्रैंचाइज़ी समझौते के तहत ₹2.53 करोड़ की वसूली हेतु (2018 में दायर)
सहमति डिक्री (Consent Decree)जुलाई 2018 में समझौते के आधार पर पारित डिक्री
निष्पादन याचिका (Execution Petition)₹1.19 करोड़ की बकाया वसूली हेतु ओजोन स्पा द्वारा दायर
मुख्य कानूनी प्रश्नक्या ₹2 करोड़ की न्यूनतम आर्थिक सीमा वाले कमर्शियल डिवीजन में ₹1.19 करोड़ की डिक्री का निष्पादन पोषणीय (Maintainable) है?
हाईकोर्ट का निर्णयहाँ; डिक्री पारित करने वाली अदालत (Court which passed the decree) निष्पादन की शक्ति नहीं खोती।
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