मामले की पृष्ठभूमि
- घटना और एफआईआर: वर्ष 2024 में रांची के अर्गोरा पुलिस स्टेशन (Argora Police Station) में घटना के संबंध में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपी पर BNS की धारा 118 (खतरनाक साधनों से गंभीर चोट पहुंचाना – जो IPC की धारा 326 के समकक्ष है) सहित कई धाराएं लगाई गई थीं।
- झारखंड हाईकोर्ट का आदेश: झारखंड उच्च न्यायालय ने फरवरी 2026 में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि मेडिकल और पुलिस रिपोर्ट से पुष्टि होती है कि पीड़ित के सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें आई हैं और उसके कान को बेहद गंभीर नुकसान पहुंचाया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
- घटना और एफआईआर: वर्ष 2024 में रांची के अर्गोरा पुलिस स्टेशन (Argora Police Station) में घटना के संबंध में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपी पर BNS की धारा 118 (खतरनाक साधनों से गंभीर चोट पहुंचाना – जो IPC की धारा 326 के समकक्ष है) सहित कई धाराएं लगाई गई थीं।
- झारखंड हाईकोर्ट का आदेश: झारखंड उच्च न्यायालय ने फरवरी 2026 में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि मेडिकल और पुलिस रिपोर्ट से पुष्टि होती है कि पीड़ित के सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें आई हैं और उसके कान को बेहद गंभीर नुकसान पहुंचाया गया है।
अदालत में हुई दिलचस्प और तल्ख बहस
- “जन्माष्टमी का जश्न और पथराव”:आरोपी के वकील ने मामले को हल्का करने की कोशिश करते हुए तर्क दिया कि यह पड़ोसियों के बीच लंबे समय से चला आ रहा पुराना विवाद था, जो त्योहार की रात भड़क गया। वकील ने कहा:“जन्माष्टमी की रात थी, लोग जश्न मना रहे थे और वहां कुछ पत्थरबाजी हुई… दूसरे पक्ष को अग्रिम जमानत मिल गई, जबकि मुझे इससे वंचित कर दिया गया।”
- “आपने उसका कान खा लिया…”:त्योहार के बैकग्राउंड को दरकिनार करते हुए जस्टिस पारदीवाला की पीठ ने सीधे पीड़ित को लगी गंभीर चोट पर ध्यान केंद्रित किया और मौखिक टिप्पणी की:“आपने पहले बंदूक निकाली, फिर उसका कान पकड़ लिया, और पूरा कान खा गए आप! (You first took out a pistol, then held his ear and ate it) और आप अग्रिम जमानत चाहते हैं?”
- “पिस्तौल छोड़िए, कान का क्या करें?”:जब बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि आग्नेयास्त्र (पिस्तौल) का आरोप झूठा है, तो कोर्ट ने तुरंत कहा:“चलो पिस्तौल जाने दीजिए। कान का क्या करें? (Okay, let the pistol be, what do we do about the ear?) हम उसे कैसे बदलें?”
- आपसी हाथापाई का दावा खारिज:वकील ने दलील दी कि उनका मुवक्किल खुद हमले का शिकार हुआ था और उसकी छाती पर काटा गया था। पीठ ने बीच में टोकते हुए पूछा, “तो आप स्वीकार करते हैं कि वहां हाथापाई हुई थी?” वकील द्वारा जांच में सहयोग का आश्वासन दिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
नई दिल्ली: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 (पूर्ववर्ती CrPC की धारा 438) के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) की असाधारण प्रकृति, भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 118 (खतरनाक साधनों या हथियारों से स्वेच्छा से घोर उपहति कारित करना), आपसी संघर्ष (Mutual Combat / Free Fight) के दावों पर गंभीर शारीरिक क्षति की गंभीरता की प्रधानता, तथा सड़क पर हुए हिंसक झगड़ों में क्रूरतापूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचाने के मामलों में गिरफ्तारी पूर्व सुरक्षा देने के विधिक मानकों पर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने बुधवार (14 अक्टूबर 2026) को रांची (झारखंड) के एक हिंसक सड़क झगड़े के आरोपी राजीव रंजन कुमार द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई करते हुए तीखे और स्पष्ट न्यायिक व्यंग्य का प्रयोग किया। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि जिस व्यक्ति पर झगड़े के दौरान अपने पड़ोसी का कान अपने दांतों से चबाकर अलग कर देने (Biting off a neighbour’s ear) का गंभीर आरोप हो, वह शीर्ष अदालत से अग्रिम राहत की उम्मीद नहीं कर सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड उच्च न्यायालय के फरवरी 2026 के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका को सीधे खारिज कर दिया।
शीर्ष अदालत की तीखी टिप्पणियां एवं मौखिक संवाद
1. ‘कान तो खा गए, अब उसे हम कैसे रिप्लेस करें?’
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने घटना को जन्माष्टमी की रात पड़ोसियों के बीच भड़की एक मामूली झड़प और क्रॉस-केस (Cross-FIR) का रूप देने की कोशिश की, तो खंडपीठ ने मामले के मूल शारीरिक नुकसान पर ध्यान केंद्रित करते हुए तीखी टिप्पणी की: “आपने पहले बंदूक निकाली, फिर उसका कान पकड़ लिया, और पूरा कान खा गए आप! (You first took out a pistol, then held his ear and ate it) और इसके बाद आप अग्रिम जमानत चाहते हैं?” जब बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि हथियार (पिस्तौल) निकालने का आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत और झूठा है, तो पीठ ने तुरंत व्यंग्यात्मक लहजे में सवाल दागा: “चलो पिस्तौल जाने दीजिए। कान का क्या करें? हम उसे कैसे बदलें? (Okay, let the pistol be, what do we do about the ear? How do we replace it?)”
2. ‘पारस्परिक संघर्ष’ (Mutual Combat) की दलील खारिज:
- याचिकाकर्ता के वकील ने खुद को मुख्य पीड़ित बताते हुए दलील दी कि उसे जमीन पर गिराकर हाथ-पैर बांधे गए थे और उसकी छाती पर काटा गया था।
- पीठ ने बीच में टोकते हुए पूछा: “तो आप यह स्वीकार करते हैं कि वहां हाथापाई और खूनी संघर्ष हुआ था?”
- वकील द्वारा जांच में सहयोग का आश्वासन दिए जाने के बावजूद अदालत ने माना कि सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें पहुंचाने और मानव अंग को दांतों से चबाने की क्रूरता के सामने पारस्परिक विवाद की दलील अग्रिम जमानत का आधार नहीं बन सकती।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक विवरण
| विवरण | घटनाक्रम एवं तथ्य |
| याचिकाकर्ता / अभियुक्त | राजीव रंजन कुमार (निवासी: रांची, झारखंड)। |
| घटना का संदर्भ | वर्ष 2024 में जन्माष्टमी के पावन पर्व की रात रांची में पड़ोसियों के बीच हुआ पथराव और हिंसक संघर्ष। |
| संबंधित पुलिस थाना | अरगोड़ा पुलिस स्टेशन (Argora Police Station, रांची)। |
| दर्ज एफआईआर एवं धाराएं | भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 118 (खतरनाक आयुधों या साधनों द्वारा घोर उपहति / Grievous Hurt by Dangerous Weapons or Means) व अन्य संबद्ध धाराएं। |
| मेडिकल व पुलिस रिपोर्ट | पुलिस जांच और मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित के सिर, चेहरे और कान पर गंभीर और गहरे घाव (Multiple grievous cut injuries) पाए गए, जिसमें कान का हिस्सा पूरी तरह कटा हुआ था। |
| झारखंड हाईकोर्ट का रुख | हाईकोर्ट ने फरवरी 2026 में चोटों की क्रूरता और अंग-भंग को देखते हुए अग्रिम जमानत खारिज कर दी थी। |
| सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश | सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) को सिरे से खारिज कर दिया। |
विधिक विश्लेषण: अंग-भंग और अग्रिम जमानत के मानक
- BNS धारा 118 बनाम IPC धारा 326 (घोर उपहति):
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 118 के तहत किसी व्यक्ति को ऐसे माध्यमों से स्थायी रूप से विकृत करना, जिससे किसी अंग का क्षय हो या शरीर का कोई अंग हमेशा के लिए अलग हो जाए, गैर-जमानती और गंभीर श्रेणी का संज्ञेय अपराध है।
- अग्रिम जमानत का विवेकाधिकार (Discretion under BNSS Section 482):
- सर्वोच्च न्यायालय के सुशीला अग्रवाल (2020) और गुरबख्श सिंह सिबिया (1980) के संविधान पीठ के फैसलों के अनुसार, अग्रिम जमानत एक असाधारण विशेषाधिकार है।
- जहां अपराध के तरीके में बर्बरता (Brutality) या शारीरिक अंगों को चबाने जैसी अमानवीय हिंसा शामिल हो, और पीड़ित को स्थायी दिव्यांगता/विकृति झेलनी पड़ी हो, वहां हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) और निष्पक्ष ट्रायल की शुचिता बनाए रखने के लिए अग्रिम जमानत से इनकार करना ही विधि-सम्मत होता है।
विधिक सारांश विवरण
- केस संदर्भ: राजीव रंजन कुमार बनाम झारखंड राज्य [आपराधिक विशेष अनुमति याचिका – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 14 अक्टूबर 2026
- संबद्ध निचली अदालत: झारखंड उच्च न्यायालय (आदेश दिनांक: फरवरी 2026)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — धारा 118 (खतरनाक साधनों द्वारा घोर उपहति) [समतुल्य: IPC धारा 324/326]
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 482 (अग्रिम जमानत) [समतुल्य: CrPC धारा 438]
- अंतिम परिणाम: अग्रिम जमानत याचिका पूरी तरह खारिज; अभियुक्त को नियमित जमानत के लिए सामान्य प्रक्रिया का पालन करने और कानून के समक्ष आत्मसमर्पण करने का मार्ग प्रशस्त।
Assault Case:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
| याचिकाकर्ता (आरोपी) | राजीव रंजन कुमार (अग्रिम जमानत की मांग) |
| मामला/घटना | रांची (झारखंड) में जन्माष्टमी की रात पड़ोसियों के बीच मारपीट; आरोपी द्वारा पड़ोसी का कान चबा जाने का आरोप। |
| लागू कानून/धाराएं | भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 118 (खतरनाक हथियारों/साधनों से गंभीर चोट पहुंचाना) व अन्य। |
| कोर्ट का अंतिम निर्णय | अग्रिम जमानत याचिका खारिज (Dismissed)। |

