सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और कड़े शब्द
- धारा 273 CrPC का अनिवार्य पालन:मंडावी के वकील निर्मल चोपड़ा ने तर्क दिया कि मुख्य अभियोजन गवाहों की गवाही मंडावी की गैर-मौजूदगी में दर्ज की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि CrPC की धारा 273 के तहत यह अनिवार्य है कि साक्ष्य केवल आरोपी की उपस्थिति में (या उसके वकील की उपस्थिति में, यदि व्यक्तिगत छूट दी गई हो) ही दर्ज किए जाएं।“आरोपी कस्टडी में था और उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट का कोई सवाल ही नहीं था। इसका सीधा मतलब है कि मुकदमे के दौरान पूरा साक्ष्य उसकी मौजूदगी में लिया जाना चाहिए था। चूंकि ऐसा नहीं किया गया, इसलिए पूरा ट्रायल दूषित (Vitiated) होकर रद्द हो जाता है।”— सुप्रीम कोर्ट पीठ
- अभियोजन की जिम्मेदारी से इनकार नहीं:राज्य सरकार ने दलील दी कि बचाव पक्ष के वकील ने इस पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जब जेल अदालत से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर थी, तो पुलिस और अभियोजन पक्ष आरोपी को कोर्ट में पेश करने की अपनी कानूनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते।
- हाशिए पर खड़े नागरिकों के अधिकार:अदालत ने कहा:“हम एक गरीब आदिवासी के मामले को सुन रहे हैं जो कानूनी प्रावधानों से अवगत नहीं है और जो अत्यधिक कठिनाई से वकील नियुक्त करता है। पीठ के पीछे साक्ष्य दर्ज करके उसके निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक अधिकार का हनन किया गया।”
नई दिल्ली: निष्पक्ष विचारण का संवैधानिक अधिकार (Right to Fair Trial under Article 21), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 273 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की समतुल्य धारा 308) के तहत आरोपी की उपस्थिति में साक्ष्य दर्ज करने की अनिवार्य वैधानिक गारंटी (Mandatory Presence of Accused during Recording of Evidence), हाशिए पर मौजूद गरीब आदिवासियों के विधिक अधिकार, तथा प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के उल्लंघन से संपूर्ण मुकदमे के दूषित (Vitiation of Entire Trial) होने के विधिक सिद्धांतों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और सुधारात्मक निर्णय दिया है।
न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने हत्या के आरोप में पिछले नौ वर्षों से जेल में बंद छत्तीसगढ़ के एक निर्धन आदिवासी व्यक्ति मुन्ना मंडावी की उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने मुकदमे के मुख्य अभियोजन गवाहों के बयान आरोपी की गैर-मौजूदगी में दर्ज किए थे, जो निष्पक्ष सुनवाई की सबसे बुनियादी शर्त का खुला उल्लंघन है। अदालत ने अभियुक्त को तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश देते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि सभी गवाहों का उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति में नए सिरे से विचारण (De Novo Trial) किया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘CrPC की धारा 273 का उल्लंघन पूरी विचारण प्रक्रिया को शून्य कर देता है’
न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने CrPC की धारा 273 के आज्ञापक (Mandatory) चरित्र को रेखांकित करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी: “अपीलकर्ता न्यायिक हिरासत में था और उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट (Personal attendance dispensed with) दिए जाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। इसका सीधा अर्थ यह है कि विचारण के दौरान समस्त साक्ष्य अभियुक्त की उपस्थिति में लिए जाने अनिवार्य थे। हालांकि, इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। अतः संपूर्ण विचारण दूषित (The entire trial stands vitiated) हो जाता है।”
2. ‘जेल केवल 3 किमी दूर थी, अभियोजन अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता’:
- राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि आत्माराम बनाम राजस्थान राज्य (2019) के मामले में बचाव पक्ष के वकील ने आपत्ति जताई थी, जबकि मंडावी के मामले में ऐसी कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई गई थी।
- अदालत ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा:“अभियोजन को मंडावी को ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश करने से किसी ने नहीं रोका था, विशेषकर तब जब गवाहों के बयान उसकी पीठ पीछे दर्ज किए जा रहे थे।जब आरोपी न्यायिक हिरासत में था और जिला जेल अदालत परिसर से मात्र तीन किलोमीटर दूर थी, तो उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने की अभियोजन की प्राथमिक जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
3. हाशिए पर मौजूद आदिवासियों के प्रति संवेदनशीलता:
पीठ ने 5 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में न्याय प्रणाली में सामाजिक-आर्थिक असमानता के प्रभाव पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए दर्ज किया: “हम एक ऐसे गरीब आदिवासी व्यक्ति के मामले से निपट रहे हैं जो कानूनी प्रावधानों से अवगत नहीं है और जो बड़ी कठिनाई से एक वकील की व्यवस्था कर पाता है।” ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध उसकी गैर-हाजिरी में गवाही दर्ज कर उसे उम्रकैद दे देना न्याय की विफलता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं कानूनी सफर
| विवरण | घटनाक्रम एवं न्यायिक निष्कर्ष |
| घटना की तिथि एवं स्थान | 29 दिसंबर 2017; जिला सुकमा (बस्तर संभाग, छत्तीसगढ़)। |
| आरोप का स्वरूप | मुन्ना मंडावी पर सोमारू नामक व्यक्ति पर कुल्हाड़ी से जानलेवा हमला करने का आरोप था। मंडावी को संदेह था कि सोमारू काला जादू (Witchcraft/Black Magic) करता है और उसी के कारण उसके बेटे की मृत्यु हुई थी। |
| दर्ज एफआईआर एवं धाराएं | IPC की धारा 302 (हत्या) तथा छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005 की धाराएं। |
| ट्रायल कोर्ट का फैसला (नवंबर 2021) | सत्र अदालत ने दो प्रमुख चश्मदीद गवाहों (जिन्होंने कुल्हाड़ी से वार करते देखा था) की गवाही के आधार पर मंडावी को दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई। |
| छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का रुख (जनवरी 2025) | हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि और उम्रकैद को बरकरार रखा था। |
| सुप्रीम कोर्ट में विधिक आपत्ति | मंडावी के अधिवक्ता निर्मल चोपड़ा ने स्थापित किया कि जिन दो प्रमुख गवाहों की गवाही पर दोषसिद्धि टिकी थी, उनके बयान तब दर्ज किए गए जब मंडावी जेल में था और उसे कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया था। |
विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 273 (उपस्थिति में साक्ष्य):
- यह धारा स्पष्ट करती है कि विचारण या अन्य कार्यवाही के दौरान लिया गया संपूर्ण साक्ष्य अभियुक्त की उपस्थिति में ही लिया जाएगा।
- इसका एकमात्र अपवाद तब है जब धारा 205 या 317 के तहत अदालत ने औपचारिक आदेश पारित कर आरोपी की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी हो और उसका वकील अदालत में उपस्थित हो।
- जब कोई अभियुक्त जेल में बंद हो, तो उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या व्यक्तिगत रूप से पेश किए बिना उसकी पीठ पीछे गवाही लेना प्रक्रियात्मक कानून का गंभीर उल्लंघन है जो ठीक नहीं किया जा सकता (Incurable Irregularity).
- संविधान का अनुच्छेद 21 — निष्पक्ष सुनवाई:
- किसी भी आरोपी को यह जानने, सुनने और अपने वकील को निर्देश देने का पूरा अधिकार है कि उसके खिलाफ गवाह क्या बयान दे रहा है। आरोपी की गैर-मौजूदगी में दर्ज गवाही जिरह (Cross-examination) के अधिकार को अर्थहीन बना देती है।
- डी नोवो ट्रायल (De Novo Trial) का सिद्धांत:
- जब मुकदमे का मूल आधार ही गैर-कानूनी हो, तो अपीलीय अदालत दोषसिद्धि को रद्द कर ट्रायल कोर्ट को मामला वापस भेजती है ताकि कानून के अनुसार नए सिरे से गवाहों को बुलाकर बयान दर्ज किए जाएं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मुन्ना मंडावी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य [आपराधिक अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 5 अक्टूबर 2026
- हिरासत की अवधि: 9 वर्ष (2017 से अक्टूबर 2026 तक)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता (अभियुक्त) की ओर से: अधिवक्ता निर्मल चोपड़ा
- प्रतिवादी (छत्तीसगढ़ राज्य) की ओर से: राज्य अभियोजन पक्ष
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 273 (आरोपी की उपस्थिति में साक्ष्य लिया जाना) [समतुल्य: BNSS 2023 की धारा 308]
- भारतीय दंड संहिता (IPC) — धारा 302 (हत्या का दंड)
- छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष विचारण एवं त्वरित न्याय का मौलिक अधिकार)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- आत्माराम बनाम राजस्थान राज्य (2019, SC) — ‘CrPC की धारा 273 की अनिवार्य प्रकृति और प्रक्रियात्मक उल्लंघन के परिणाम।’
- अंतिम परिणाम: अपील स्वीकार; 2021 की दोषसिद्धि और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का 2025 का निर्णय निरस्त; मुन्ना मंडावी को शर्तों के अधीन तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश; ट्रायल कोर्ट को सभी गवाहों की आरोपी की उपस्थिति में नए सिरे से गवाही दर्ज कर विचारण (De Novo Trial) पूरा करने का निर्देश।
Fair Trial: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा एवं न्यायमूर्ति नोंगमईकापम कोटिश्वर सिंह |
| याचिकाकर्ता | मुन्ना मंडावी (छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का निवासी) |
| संबंधित कानून | CrPC की धारा 273 (आरोपी की मौजूदगी में गवाही दर्ज करने का नियम) एवं IPC की धारा 302 |
| अदालत का फैसला | दोषसिद्धि व उम्रकैद रद्द; आरोपी को तुरंत जमानत, गवाहों की पुनः नए सिरे से गवाही (De Novo Trial) कराने का आदेश। |

