घटनाक्रम और अदालत की सख्त कार्रवाई
- मामले की पृष्ठभूमि:सोशल मीडिया पर अश्लील वीडियो अपलोड करने के आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामे में तथ्य गायब मिलने पर कोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) विनय कुमार मिश्रा को समन किया था। जब IO उपस्थित नहीं हुए और उन्होंने बताया कि उन्हें कोर्ट के आदेश की सूचना ही नहीं मिली, तो कोर्ट ने आजमगढ़ एसएसपी को उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) तामील कराने और व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया।
- सरकारी वकील से दुर्व्यवहार:सुनवाई के दौरान अपर सरकारी अधिवक्ता (AGA) अनुराग पांडे ने कोर्ट को बताया कि जब वे अदालती आदेशों की जानकारी देने के लिए एसएसपी ऑफिस संपर्क कर रहे थे, तो एसएसपी के पीआरओ राजेश कुमार सिंह ने उनके साथ फोन पर अभद्रता की।
- अदालत का फैसला और हिरासत:न्यायामूर्ति देशवाल ने पीआरओ के आचरण पर कड़ा रुख अपनाते हुए आदेश दिया:“जब भी कोई सरकारी वकील किसी अधिकारी को इस अदालत के आदेश के अनुपालन की जानकारी देता है, तो वह अदालत के आदेश का पालन कराने का अपना कर्तव्य निभा रहा होता है। ऐसे में किसी भी अधिकारी द्वारा—चाहे वह राज्य का शीर्ष अधिकारी ही क्यों न हो—उनके साथ दुर्व्यवहार करना अदालत की अवमानना माना जाएगा।”कोर्ट ने पीआरओ पर कड़ा जुर्माना लगाने के बजाय उसे दिन भर (शाम 5 बजे तक) अदालत की कस्टडी में रखने की सजा सुनाई।
- एसएसपी आजमगढ़ की कार्रवाई:आजमगढ़ एसएसपी डॉ. अनिल कुमार ने अदालत को सूचित किया कि संबंधित पीआरओ को पद से हटा दिया गया है तथा लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों (महाराजगंज SHO व सब-इंस्पेक्टर) को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। कोर्ट ने एसएसपी की इस त्वरित कार्रवाई की सराहना की।
प्रयागराज: न्यायिक प्रक्रिया में वकीलों की ‘अदालत के अधिकारी’ (Officers of the Court) के रूप में विधिक स्थिति, अदालती आदेशों के अनुपालन व सूचना संप्रेषण में बाधा डालना, न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) तथा संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत उच्च न्यायालय की अवमानना शक्तियों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सख्त और कड़ा संदेश दिया है।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) आजमगढ़ के पीआरओ (PRO) राजेश कुमार सिंह ने की अभद्रता
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने एक जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया। अदालत ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) आजमगढ़ के पीआरओ (PRO) राजेश कुमार सिंह को अदालत के अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता (AGA) अनुराग पांडे के साथ फोन पर अभद्रता करने का दोषी पाते हुए शाम 5 बजे तक अदालत की अभिरक्षा (Court Custody) में रखने का आदेश दिया। साथ ही, अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को पूरे राज्य के पुलिस अधिकारियों के लिए एक अनिवार्य परिपत्र (Circular) जारी करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि न्यायिक आदेशों की जानकारी देते समय किसी भी सरकारी या राज्य विधि अधिकारी (Government Law Officer) के साथ किया गया कोई भी दुर्व्यवहार सीधे तौर पर अदालत की अवमानना माना जाएगा, भले ही ऐसा करने वाला राज्य का शीर्षतम अधिकारी ही क्यों न हो।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘अदालत के आदेश की सूचना देते समय वकील कर्तव्य का निर्वहन कर रहे होते हैं’
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने न्यायिक प्रक्रिया में विधि अधिकारियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए दर्ज किया: “जब भी वे (शासकीय अधिवक्ता) इस न्यायालय के आदेश के अनुपालन के बारे में किसी अधिकारी को सूचित करते हैं, तो वे न्यायालय के आदेश के अनुपालन में अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे होते हैं। ऐसे में किसी भी अधिकारी द्वारा उनके साथ किया गया दुर्व्यवहार—चाहे वह राज्य का शीर्षतम अधिकारी (Top-most Officer of the State) ही क्यों न हो—सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) का गठन करेगा।”
2. पीआरओ को शाम 5 बजे तक अदालत की हिरासत में रखने का आदेश:
- पीआरओ राजेश कुमार सिंह द्वारा जमानत मामले में अदालत के आदेश से अवगत कराने का प्रयास कर रहे अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता अनुराग पांडे से बदसलूकी किए जाने पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया।
- अदालत ने आदेश दिया:“यह न्यायालय उसके विरुद्ध कोई कठोर टिप्पणी (Stricture) पारित करने के स्थान पर निर्देश देता है कि उसे हिरासत में लिया जाए और वह शाम 5 बजे तक न्यायालय की हिरासत (Custody of Court) में रहेगा, जिसके पश्चात उसे रिहा किया जाएगा।”
3. उत्तर प्रदेश के DGP को राज्यव्यापी परिपत्र जारी करने का निर्देश:
अदालत ने पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश को निर्देश दिया कि वे एक आधिकारिक सर्कुलर जारी कर सभी पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट रूप से सचेत करें कि:
- अदालती आदेशों की जानकारी देने के लिए अधिकृत किसी भी राज्य विधि अधिकारी के साथ किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार अदालत की अवमानना माना जाएगा।
- ऐसे किसी भी कृत्य से कानून के अनुसार अत्यंत कड़ाई से निपटा जाएगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं कालक्रम
| चरण / तारीख | घटनाक्रम एवं विवरण |
| मूल मामला | सोशल मीडिया पर पीड़िता के अश्लील वीडियो प्रकाशित करने के आरोपी सचिन यादव की नियमित जमानत अर्जी पर सुनवाई। |
| सितंबर 2026 | राज्य सरकार द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामे (Counter Affidavit) में महत्वपूर्ण तथ्य गायब होने पर हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) विनय कुमार मिश्रा को तलब किया। |
| गैर-जमानती वारंट (NBW) | आईओ के पेश न होने पर एसएसपी आजमगढ़ को उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट निष्पादित करने का आदेश दिया गया। अदालत में पेश होने पर आईओ मिश्रा ने बताया कि उन्हें पेशी से जुड़े अदालती आदेशों की कभी जानकारी ही नहीं दी गई थी। |
| वकील से दुर्व्यवहार | जब सरकारी वकील अनुराग पांडे ने आदेश की सूचना देने के लिए फोन किया, तो एसएसपी के पीआरओ राजेश कुमार सिंह ने उनसे फोन पर अभद्रता की। |
| व्यक्तिगत पेशी का आदेश | हाईकोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए एसएसपी आजमगढ़, महराजगंज थाने के एसएचओ और पीआरओ को व्यक्तिगत रूप से तलब किया। |
| एसएसपी की त्वरित कार्रवाई | 12 अक्टूबर को एसएसपी डॉ. अनिल कुमार ने अदालत को बताया कि लापरवाही के लिए महराजगंज के एसएचओ और उप-निरीक्षक सुभाष सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। साथ ही, पीआरओ को कारण बताओ नोटिस देकर पद से तत्काल हटा दिया गया है। अदालत ने एसएसपी की इस त्वरित कार्रवाई की सराहना की। |
विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- अधिवक्ता: न्यायालय के अधिकारी (Officers of the Court):
- विधिक व्यवस्था में अधिवक्ता केवल मुवक्किल या सरकार के प्रतिनिधि नहीं होते, बल्कि वे न्याय प्रशासन के अभिन्न स्तंभ और अदालत के अधिकारी होते हैं। उनके वैधानिक कार्यों में बाधा डालना या उनसे दुर्व्यवहार करना सीधे तौर पर न्याय प्रशासन की धारा में हस्तक्षेप (Interference with the Administration of Justice) माना जाता है।
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना):
- कोई भी ऐसा कृत्य या व्यवहार जो न्यायिक कार्यवाही के निष्पक्ष संचालन में बाधा डालता है या न्याय प्रशासन में किसी भी तरह का व्यवधान उत्पन्न करता है, वह आपराधिक अवमानना के दायरे में आता है।
- अदालत उठने तक की हिरासत (Custody till Rising of the Court):
- आपराधिक न्याय और अवमानना क्षेत्राधिकार में अदालतें कई बार अधिकारियों को औपचारिक दंड देने के बजाय सांकेतिक सबक सिखाने के लिए ‘कोर्ट उठने तक’ हिरासत में रखने का आदेश देती हैं, जो सेवा रिकॉर्ड और अनुशासन के लिहाज से एक गंभीर विधिक परिणाम होता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सचिन यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [जमानत आवेदन संख्या: इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 12 अक्टूबर 2026
- संबद्ध पक्षकार: अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता अनुराग पांडे बनाम पीआरओ राजेश कुमार सिंह (कार्यालय: एसएसपी, आजमगढ़)
- अदालत में उपस्थित पुलिस अधिकारी: डॉ. अनिल कुमार (आईपीएस, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक – आजमगढ़)
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय की अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति)
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना) एवं धारा 12 (दंड)
- उत्तर प्रदेश पुलिस रेगुलेशन एक्ट (कर्तव्य पालन एवं अनुशासन)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- विधि अधिकारियों की गरिमा और न्याय प्रशासन: ‘अदालती आदेशों के पालन में सेवारत सरकारी वकील से दुर्व्यवहार सीधे तौर पर न्याय के मंदिर की अवमानना है; पुलिस प्रशासन को विधि अधिकारियों के साथ सम्मानपूर्वक संवाद बनाए रखना अनिवार्य है।’
- अंतिम परिणाम: पीआरओ राजेश कुमार सिंह को शाम 5 बजे तक न्यायिक अभिरक्षा में रखा गया; एसएसपी द्वारा पीआरओ को पद से हटाने की कार्रवाई को अदालत ने दर्ज किया; यूपी डीजीपी को राज्यव्यापी सर्कुलर जारी करने का निर्देश।
Misbehave with Advocate: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल |
| मुख्य पक्षकार | सचिन यादव (याचिकाकर्ता) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य |
| संबंधित अधिकारी | राजेश कुमार सिंह (PRO, कार्यालय एसएसपी आजमगढ़) |
| न्यायिक आदेश | PRO को शाम 5 बजे तक अदालती हिरासत में रखा गया; यूपी के DGP को पूरे राज्य के अधिकारियों हेतु परिपत्र (Circular) जारी करने का निर्देश। |

