Friday, November 6, 2026
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Police Power: संविधान गिरफ्तारी से अलग किसी अनौपचारिक हिरासत को मान्यता नहीं देता; मजिस्ट्रेट के समक्ष 24 घंटे में पेशी वास्तविक हिरासत के क्षण से शुरू होती है

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सुरुचिपूर्ण विधिक बिंदु: फैसले के 10 मुख्य निष्कर्ष

  1. वास्तविक हिरासत से शुरुआत: 24 घंटे की उलटी गिनती भौतिक हिरासत (Actual Detention) की शुरुआत से चलती है, न कि कागजी/औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने के समय से।
  2. तत्काल रिहाई का दायित्व: मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी के बिना 24 घंटे से अधिक समय तक रखी गई हिरासत अवैध है, और आरोपी तत्काल रिहाई का हकदार है।
  3. यात्रा समय की छूट: केवल मजिस्ट्रेट की अदालत तक जाने के लिए आवश्यक यात्रा समय (Travel Time) को ही 24 घंटे की गणना से बाहर रखा जा सकता है।
  4. बफर ज़ोन असंवैधानिक: हिरासत (Detention) और गिरफ्तारी (Arrest) के बीच कोई कृत्रिम संवैधानिक अंतर संभव नहीं है।
  5. BNSS की धारा 58 का उल्लंघन: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 58 के तहत 24 घंटे के भीतर भी बिना किसी वैध कारण के लंबे समय तक हिरासत में रखना अकारण/अयुक्तियुक्त (Unreasonable) माना जाएगा।
  6. न्यायिक मजिस्ट्रेट का कर्तव्य: मजिस्ट्रेटों को रिमांड देते समय हिरासत का वास्तविक समय दर्ज करना होगा और अनुच्छेद 22(2) का सख्ती से सत्यापन करना होगा।
  7. रिमांड से इनकार का अधिकार: यदि हिरासत बिना स्पष्टीकरण के अयुक्तियुक्त पाई जाती है, तो 24 घंटे के भीतर होने पर भी मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इनकार कर सकते हैं।
  8. अमान्य घोषित मिसालें: ओडिशा हाईकोर्ट (Ariyaman Pattnayak case), मद्रास हाईकोर्ट (Kannan case) और केरल हाईकोर्ट (Arun K Thomas case) के विपरीत निर्णयों को कानूनन गलत ठहराया गया।
  9. मौलिक अधिकार (Article 21) की सर्वोच्चता: NDPS अधिनियम की धारा 37 या किसी विशेष कानून की कठोर शर्तें संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को दरकिनार नहीं कर सकतीं।
  10. संवैधानिक निर्वचन का सिद्धांत: कोई कानून/अधिनियम संविधान की व्याख्या का मार्गदर्शक नहीं हो सकता, बल्कि संविधान ही हर विशेष कानून का मार्गदर्शन करेगा।

मामले की पृष्ठभूमि और तथ्यात्मक उल्लंघन

  1. 18 घंटे का अस्पष्टीकृत विलंब:याचिकाकर्ताओं को 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2:00 बजे 11.03 किलोग्राम ‘याबा’ (मेथाम्फेटामाइन) गोलियों की जब्ती के सिलसिले में जांच दल की हिरासत में लिया गया था। हालांकि, जांच एजेंसी ने कागजों में उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन, 30 सितंबर 2025 को दिखाई और उन्हें दोपहर 4:45 बजे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।
  2. 24 घंटे की सीमा का सीधा उल्लंघन:सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संवैधानिक सुरक्षा चक्र के अनुसार आरोपियों को 30 सितंबर को दोपहर 2:00 बजे से पहले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए था। 2:45 घंटे की यह देरी और जब्ती के बाद कागजी गिरफ्तारी में 18 घंटे की बिना किसी स्पष्टीकरण की देरी अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58 का गंभीर उल्लंघन है।
  3. विशेष कानूनों (NDPS) पर संवैधानिक सर्वोच्चता:जांच एजेंसी ने दलील दी कि NDPS एक्ट की धारा 37 के तहत वाणिज्यिक मात्रा (Commercial Quantity) के मामलों में जमानत की शर्तें बहुत सख्त हैं। इस पर शीर्ष अदालत ने दोहराया कि जब अनुच्छेद 21 या 22 के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो NDPS अधिनियम की धारा 37 की कड़ाई को पीछे हटना पड़ेगा (Rigour of Section 37 must give way).

मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष

1. पुलिस शक्तियों की संवैधानिक सीमाएं:

यह ऐतिहासिक फैसला पुलिस द्वारा की जाने वाली “स्क्रीनिंग अरेस्ट” (Screening Arrest)—जहाँ किसी व्यक्ति को अनौपचारिक रूप से हिरासत में रखकर लंबे समय तक पूछताछ की जाती है और बाद में गिरफ्तारी दिखाई जाती है—की प्रथा पर पूर्ण विराम लगाता है।

2. मानवाधिकार और कस्टोडियल सुरक्षा:

अनुच्छेद 22(2) के तहत दिए गए संरक्षण को व्यापक बनाकर सर्वोच्च न्यायालय ने हिरासत में प्रताड़ना (Custodial Torture) को रोकने और आपराधिक न्याय प्रणाली में मजिस्ट्रेटों की निगरानी भूमिका (Magisterial Oversight) को और मजबूत किया है।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार) व अनुच्छेद 22(2) (गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने की निरपेक्ष संवैधानिक गारंटी), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 57 (24 घंटे से अधिक निरुद्ध न किया जाना) व धारा 58 (24 घंटे के भीतर भी अनुचित विलंब न होना और हिरासत का युक्तिसंगत होना—पूर्ववर्ती CrPC धारा 57 व 58), स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) की धारा 37 (जमानत की दोहरी कठोर शर्तें बनाम संवैधानिक उपचार), तथा आपराधिक न्यायशास्त्र में ‘वास्तविक हिरासत’ (Actual Detention / Restraint) बनाम ‘कागजी/औपचारिक गिरफ्तारी’ (Formal Arrest) के विधिक विभेद पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और युगांतकारी निर्णय सुनाया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां (Justice Ujjal Bhuyan) और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर (Justice Atul S Chandurkar) की खंडपीठ ने त्रिपुरा उच्च न्यायालय के 29 अप्रैल 2026 के उस आदेश को पलटते हुए, जिसमें 11.03 किलोग्राम मेथमफेटामाइन (याबा टैबलेट्स) की बरामदगी के आरोपी की जमानत अर्जी खारिज कर दी गई थी, अपीलार्थी सुजीत दास (Sujit Das) को तत्काल प्रभाव से हिरासत से रिहा (Release forthwith) करने का आदेश दिया।

शीर्ष अदालत ने दो-टूक संवैधानिक व्यवस्था दी कि जांच एजेंसियों द्वारा पूछताछ या जांच के नाम पर किसी व्यक्ति को अपनी कस्टडी में लेकर उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित कर देना ही उसकी वास्तविक ‘गिरफ्तारी’ है। 24 घंटे की उलटी गिनती उसी क्षण से शुरू हो जाती है जब किसी व्यक्ति को डिटेन किया जाता है, न कि उस समय से जब पुलिस अपनी सुविधानुसार कागजों पर उसकी ‘औपचारिक गिरफ्तारी’ दर्ज करती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान अनुच्छेद 22(2) के बाहर किसी भी ऐसे ‘बफर जोन’ या अनौपचारिक हिरासत को मान्यता नहीं देता। साथ ही, अदालत ने उड़ीसा, मद्रास और केरल उच्च न्यायालयों के उन फैसलों को कानूनन त्रुटिपूर्ण (Disapproved as incorrect in law) घोषित कर दिया, जिनमें गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर माना गया था।

शीर्ष अदालत का 10-सूत्रीय विधिक सिद्धांत (Ruling in a Nutshell)

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘संविधान गिरफ्तारी से अलग किसी अनौपचारिक हिरासत को मान्यता नहीं देता; कोई बफर जोन नहीं हो सकता’:

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने पुलिसिया कार्यप्रणाली के उस दांव पर कड़ा प्रहार किया जिसमें पूछताछ के नाम पर लोगों को अवैध हिरासत में रखा जाता है:

“भारत के संविधान का अनुच्छेद 22 का खंड (2) ऐसे किसी भी क्षेत्र (Zone) के निर्माण को मंजूरी नहीं देता जहाँ किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को जांच के उद्देश्यों के लिए सीमित किया जाए, किंतु उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार न दिखाया जाए।

इस प्रकार के किसी ‘बफर जोन’ (Buffer Zone) का निर्माण या उसकी परिकल्पना पूरी तरह से असंवैधानिक (Wholly Unconstitutional) है।

संविधान गिरफ्तारी से अलग किसी अनौपचारिक हिरासत (Detention divorced from arrest) को कतई मान्यता नहीं देता। 24 घंटे की वैधानिक समय-सीमा उसी क्षण से शुरू हो जाएगी जब गिरफ्तार करने वाले प्राधिकारी द्वारा किसी अपराध के संदेह में किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाता है और उसकी स्वतंत्रता प्रभावी रूप से सीमित कर दी जाती है। उस सीमा तक, अनुच्छेद 22(2) में प्रयुक्त शब्द—अर्थात ‘गिरफ्तार’ (Arrested) और ‘हिरासत में लिया गया’ (Detained)—एक-दूसरे के पूर्ण पर्यायवाची (Synonymous) हैं।”

अदालत ने आगे चेतावनी देते हुए कहा:“गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कोई भी कृत्रिम भेद (Artificial distinction) खींचने का प्रयास संविधान द्वारा दी गई बुनियादी मौलिक सुरक्षा को क्षीण या निष्प्रभावी कर देगा। ऐसे प्रयासों से बचा जाना चाहिए। हमें वह व्याख्या अपनानी चाहिए जो संवैधानिक उद्देश्य को सुदृढ़ और उन्नत करती हो।”

2. ‘कस्टोडियल टॉर्चर देश की दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई; स्क्रीनिंग अरेस्ट के हथकंडे मानवाधिकारों का हनन’:

  • पीठ ने न्यायिक यथार्थवाद को स्वीकार करते हुए दर्ज किया कि जांच के दौरान पुलिस अक्सर बयान या स्वीकारोक्ति (Confession) उगलवाने के लिए ‘स्क्रीनिंग अरेस्ट’ (Screening Arrest) की तकनीक अपनाती है:“हिरासत में हिंसा (Custodial Violence) हमारे देश की एक दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता है और इसे न्यायिक रूप से स्वीकार किया गया है… मानवाधिकारों का सबसे घिनौना उल्लंघन जांच के दौरान उस समय होता है जब पुलिस सूचना या इकबालिया बयान निकालने के उद्देश्य से तीसरे दर्जे के तरीके (Third-degree methods) अपनाती है। इसके लिए वे या तो गिरफ्तारी को रिकॉर्ड में दर्ज नहीं करते या स्वतंत्रता के इस अनैतिक हरण को केवल ‘लंबी पूछताछ’ का नाम दे देते हैं।हमारी न्यायिक व्यवस्था का यह सतत प्रयास रहा है कि जिस क्षण किसी व्यक्ति को जांच एजेंसी द्वारा रोका और निरुद्ध किया जाए, उसी क्षण से किसी भी प्रकार की कस्टोडियल हिंसा की गुंजाइश को समाप्त किया जाए।”

3. ‘जब अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो, तो NDPS की धारा 37 की कठोरता को झुकना पड़ेगा’:

  • स्वापक औषधि अधिनियम की कठोर जमानत शर्तों पर ऐतिहासिक सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा:“संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त अधिकार केवल सामान्य संवैधानिक अधिकार नहीं हैं; वे मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) हैं। अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार हमारे संवैधानिक न्यायशास्त्र का केंद्रीय मूल आधार है। इन बुनियादी अधिकारों के साथ इतनी आसानी से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, यहाँ तक कि किसी विशेष कानून (Special Statute) के तहत भी नहीं।जब संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन होता है, तो NDPS अधिनियम की धारा 37 की कठोरता (Rigour of Section 37) या किसी अन्य विशेष कानून के समान कड़े प्रावधानों को अपना रास्ता छोड़ना होगा (Would have to give way)… कोई कानून, चाहे वह विशेष हो या सामान्य, संविधान की व्याख्या का मार्गदर्शक नहीं हो सकता; बल्कि इसका उल्टा होना चाहिए।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार — विशेष अनुमति याचिका)
पीठन्यायमूर्ति उज्जल भुइयां (Justice Ujjal Bhuyan) एवं न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर (Justice Atul S Chandurkar)
निर्णय की तिथिनवंबर 2026
केस संदर्भसुजीत दास बनाम भारत संघ [Sujit Das v. Union of India — Criminal Appeal No. … / 2026]
अपीलार्थी (अभियुक्त)सुजीत दास (Sujit Das) — कथित मादक पदार्थ तस्करी का आरोपी।
प्रतिवादी पक्षभारत संघ (नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो / केंद्रीय जांच एजेंसी)।
कथित बरामदगी11.03 किलोग्राम मेथमफेटामाइन (याबा टैबलेट्स) — जो NDPS अधिनियम के तहत स्पष्ट रूप से ‘व्यावसायिक मात्रा’ (Commercial Quantity) है।
गिरफ्तारी का तथ्यात्मक समय-चक्र• वास्तविक नियंत्रण/हिरासत: 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2:00 बजे, जब तलाशी दल ने आरोपी को अपने भौतिक नियंत्रण में ले लिया था।
• कागजी/औपचारिक गिरफ्तारी: 30 सितंबर 2025 की सुबह (तलाशी प्रक्रिया पूरी होने के 18 घंटे बाद)।
• मजिस्ट्रेट के समक्ष भौतिक पेशी: 30 सितंबर 2025 को सायं 4:45 बजे।
अभियोजन / जांच एजेंसी की दलीलएजेंसी ने तर्क दिया कि तलाशी व जब्ती की विस्तृत प्रक्रिया पूरी होने के बाद 30 सितंबर को विधिवत गिरफ्तारी दर्ज की गई थी; अतः 24 घंटे की मियाद औपचारिक गिरफ्तारी के समय से गिनी जानी चाहिए, न कि दोपहर 2 बजे से; इसके अतिरिक्त NDPS की धारा 37 के तहत जमानत प्रतिबंधित है।
त्रिपुरा हाईकोर्ट का आदेश (29 अप्रैल 2026)उच्च न्यायालय ने वाणिज्यिक मात्रा और धारा 37 के वैधानिक बंधनों को आधार बनाकर सुजीत दास की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णयत्रिपुरा उच्च न्यायालय का आदेश निरस्त; गिरफ्तारी को अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58 के उल्लंघन के कारण असंवैधानिक व अवैध घोषित किया गया; अपीलार्थी को हिरासत से तुरंत रिहा (Released forthwith) करने का आदेश।

विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: ‘BNSS धारा 58 और 18 घंटे का अनुचित विलंब’

  • घंटों की सटीक गणना और संवैधानिक विफलता:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि अपीलार्थी 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2:00 बजे तलाशी दल की भौतिक कस्टडी में आ चुका था।
    • अतः अनुच्छेद 22(2) के तहत उसे 30 सितंबर 2025 को दोपहर 2:00 बजे से पूर्व न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना अनिवार्य था।
    • किंतु उसे शाम 4:45 बजे पेश किया गया—अर्थात निर्धारित 24 घंटे की अवधि समाप्त होने के 2 घंटे 45 मिनट बाद। यह 165 मिनट की अतिरिक्त अनधिकृत हिरासत अपने आप में पूरी गिरफ्तारी को दूषित (Vitiate) करने और निरंतर हिरासत को असंवैधानिक बनाने के लिए पर्याप्त थी।
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 का उल्लंघन:
    • धारा 58 (पूर्ववर्ती CrPC धारा 58/57) यह अनिवार्य करती है कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को बिना मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश के 24 घंटे से अधिक समय तक निरुद्ध नहीं रखा जाएगा और इस अवधि के भीतर भी हिरासत किसी अनुचित अवधि (Unreasonable Period) तक नहीं खींची जाएगी।
    • पीठ ने दर्ज किया कि जब्ती की कार्यवाही समाप्त होने और औपचारिक गिरफ्तारी दिखाने के बीच 18 घंटे का एक विशाल अंतराल (Gap of 18 hours) था, जिसका जांच एजेंसी के पास कोई तार्किक या विधिक स्पष्टीकरण नहीं था। बिना न्यायिक निगरानी के 18 घंटे तक किसी नागरिक को रोके रखना BNSS की धारा 58 के तहत अकारण और अवैध है।
  • उच्च न्यायालयों की पूर्व नज़ीरों को अमान्य करना:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने तीन उच्च न्यायालयों के फैसलों को कानूनन गलत ठहराते हुए निरस्त कर दिया:
      1. उड़ीसा उच्च न्यायालय का फैसला: अरियामन पटनायक मामला (Ariyaman Pattnayak case)
      2. मद्रास उच्च न्यायालय का फैसला: कन्नन मामला (Kannan case)
      3. केरल उच्च न्यायालय का फैसला: अरुण के. थॉमस मामला (Arun K Thomas case)
    • इन सभी निर्णयों में यह त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया गया था कि पूछताछ के दौरान की गई अनौपचारिक रोक-टोक को ‘गिरफ्तारी’ नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता छिनते ही गिरफ्तारी मानी जाएगी।
  • ‘सुखविंदर सिंह उर्फ गोरा’ निर्णय पर आरक्षण:
    • पीठ ने NDPS की धारा 37 और अनुच्छेद 21 के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की ही समन्वय पीठ (Coordinate Bench) द्वारा सुखविंदर सिंह उर्फ गोरा मामले में की गई कुछ टिप्पणियों पर गंभीर न्यायिक आपत्तियां (Reservations) दर्ज कीं, किंतु मर्यादावश उस पर सीधा अंतिम फैसला देने से परहेज किया।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: सुजीत दास बनाम भारत संघ [Criminal Appeal No. … / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां (Justice Ujjal Bhuyan) एवं न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर (Justice Atul S Chandurkar)
  • निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: अपील स्वीकृत; त्रिपुरा उच्च न्यायालय का 29 अप्रैल 2026 का आदेश अपास्त; गिरफ्तारी प्रक्रिया दूषित होने के कारण अभियुक्त को तत्काल रिहा करने का आदेश।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • अपीलार्थी (सुजीत दास) की ओर से: अपीलार्थी के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं विधिक टीम।
  • प्रतिवादी (भारत संघ / NCB) की ओर से: केंद्रीय जांच एजेंसी के वरिष्ठ स्थायी अभियोजक।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 21 — प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
      • अनुच्छेद 22(2) — 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने का निरपेक्ष मौलिक अधिकार
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
      • धारा 57 — गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का 24 घंटे से अधिक निरुद्ध न किया जाना
      • धारा 58 — गिरफ्तारी की परिस्थितियों और समय की युक्तिसंगतता (Reasonable Period)
    • स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) — धारा 37 (व्यावसायिक मात्रा में कठोर जमानत शर्तें)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • संवैधानिक हिरासत, 24 घंटे की मियाद और मौलिक अधिकारों की सर्वोच्चता का विधिक मानक: ‘अनुच्छेद 22(2) के तहत 24 घंटे की समय-सीमा की गणना उस क्षण से शुरू होती है जब किसी व्यक्ति को जांच एजेंसी द्वारा भौतिक रूप से निरुद्ध (Detained) कर उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बाधित किया जाता है, न कि उस पश्चात्वर्ती समय से जब एजेंसी अपनी सुविधा से केस डायरी में औपचारिक गिरफ्तारी (Formal Arrest) दर्ज करती है; संविधान ‘गिरफ्तारी’ और ‘हिरासत’ के बीच किसी कृत्रिम अंतर या जांच के नाम पर किसी ‘बफर जोन’ को मान्यता नहीं देता; 24 घंटे की अधिकतम सीमा समाप्त होने के बाद मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 1 मिनट की भी अतिरिक्त हिरासत पूरी कानूनी प्रक्रिया को शून्य और असंवैधानिक बना देती है, जिसके परिणामस्वरूप अभियुक्त तत्काल रिहाई का हकदार हो जाता है; तथा जब संविधान के अनुच्छेद 21 व 22(2) के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो NDPS अधिनियम की धारा 37 या PMLA जैसे विशेष कानूनों की कठोर शर्तें स्वतः निष्प्रभावी हो जाती हैं क्योंकि कोई भी सांविधिक कानून संविधान के मूल ढांचे से ऊपर नहीं हो सकता।’
  • वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले ने देश भर की पुलिस और जांच एजेंसियों (CBI, ED, NCB, NIA आदि) द्वारा पूछताछ के नाम पर 2-3 दिन तक अवैध रूप से बैठाए रखने और बाद में गिरफ्तारी दिखाने की असंवैधानिक कार्यप्रणाली पर पूर्ण न्यायिक रोक लगा दी है; अब सभी निचली अदालतों के न्यायिक मजिस्ट्रेटों को रिमांड अर्जी पर विचार करते समय केस डायरी से वास्तविक हिरासत के समय की स्वतंत्र जांच करनी होगी और यदि 24 घंटे की सीमा टूटी पाई जाती है, तो उन्हें रिमांड खारिज कर अभियुक्त को तत्काल रिहा करना होगा।

Police Power: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान एवं न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर
केस / पक्षकारसुजीत दास बनाम भारत संघ (Sujit Das v. Union of India)
संबंधित संवैधानिक/कानूनी प्रावधानअनुच्छेद 21 व 22(2) (व्यक्तिगत स्वतंत्रता व 24 घंटे में मजिस्ट्रेट पेशी का अधिकार), BNSS, 2023 की धारा 58 (युक्तियुक्त हिरासत), एवं NDPS अधिनियम की धारा 37 (ज़मानत पर कठोर शर्तें)
अदालत का अंतिम आदेशअपील मंजूर व आरोपी रिहा: त्रिपुरा हाईकोर्ट का फैसला रद्द; एनडीपीएस मामले में आरोपी की निरंतर हिरासत को असंवैधानिक करार देकर तत्काल रिहाई का आदेश।
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