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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- जमीनी प्रवर्तन (Enforcement) की व्यावहारिक सीमाएं:न्याय मित्र (Amicus Curiae) ने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि भौतिक पुलिसिंग (Physical Policing) की व्यावहारिक सीमाएं हैं। राज्य हर घर के बाहर एक पुलिस अधिकारी तैनात नहीं कर सकता। इसके अलावा, वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने ध्यान दिलाया कि विक्रेता ‘ग्रीन क्रैकर्स’ (Green Crackers) की अनुमति का फायदा उठाकर दुकानों के बाहर हरे डिब्बे प्रदर्शित करते हैं, जबकि अंदर प्रतिबंधित पारंपरिक पटाखे बेचे जा रहे हैं।
- बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर (CPCB अध्ययन):न्याय मित्र ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 2012 के अध्ययन (Study on Ambient Air Quality, Respiratory Symptoms and Lung Function of Children in Delhi) का हवाला दिया, जिसके अनुसार दिल्ली के 43.5% स्कूली बच्चों के फेफड़ों की क्षमता अन्य शहरों के बच्चों की तुलना में गंभीर रूप से घटी हुई पाई गई थी।
- GRAP और प्रशासनिक अनुपालन:अदालत में सुझाव दिया गया कि संशोधित ‘ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान’ (GRAP) को इस तरह व्यवस्थित किया जाए कि वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खराब होते ही शुरुआती चरणों में ही स्कूली बच्चों के लिए सुरक्षात्मक उपाय लागू किए जा सकें। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने राज्यों द्वारा निर्माण धूल, कचरा जलाने, और औद्योगिक उत्सर्जन पर की गई कार्रवाई का अनुपालन चार्ट पेश किया।
मुख्य विधिक व पर्यावरणीय निष्कर्ष
1. पर्यावरणीय न्यायशास्त्र और सामुदायिक भागीदारी (Community Participation):
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में केवल अदालती आदेश (Judicial Decrees) और दंडात्मक तंत्र पर्याप्त नहीं हैं। जब तक स्थानीय जनप्रतिनिधि और नागरिक समाज स्वयं जिम्मेदारी नहीं लेते, तब तक कानून का प्रवर्तन पूरी तरह सफल नहीं हो सकता।
2. GRAP एवं एयरशेड प्रबंधन (Airshed Governance):NCR Air Pollution:
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिवाली अवकाश के बाद इस मामले को विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करना यह दर्शाता है कि अदालत संपूर्ण एनसीआर क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक नीतिगत ढांचे (Policy Framework) और एयरशेड आधारित उत्सर्जन नियंत्रण को प्राथमिकता दे रही है।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (प्रदूषण-मुक्त स्वच्छ वातावरण व सांस लेने का मौलिक अधिकार) व अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण व संवर्धन का राज्य का दायित्व), वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (Air Act, 1981), पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एवं निकटवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 (CAQM Act, 2021), तथा ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) के विभिन्न चरणों के विधिक क्रियान्वयन के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में शीतकालीन वायु प्रदूषण और आगामी दीपावली पर पटाखों के नियमन को लेकर एक अत्यंत व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) और न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के गंभीर स्तर तक पहुंचने के मामले पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी कि दीपावली जैसे प्रमुख त्योहारों पर प्रदूषण नियंत्रण का लक्ष्य केवल न्यायिक फरमानों (Judicial Decrees) और पुलिस की तैनाती से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
शीर्ष अदालत ने दो-टूक कहा कि बार-बार अदालती आदेश जारी करने से जमीनी स्तर पर उल्लंघन की प्रवृत्ति (Tendency of non-compliance) बढ़ जाती है। अदालत ने दिल्ली सरकार और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अन्य संबंधित राज्य प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे स्थानीय वार्ड पार्षदों (Municipal Councillors) और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को सक्रिय रूप से शामिल करें, ताकि वे सीधे नागरिकों से संवाद कर अपील करें कि उनकी उत्सव की खुशियां हवा को जहरीला न बनाएं। अदालत ने रेखांकित किया कि जब तक स्वच्छ हवा की यह पहल एक ‘जन-आंदोलन’ (People’s Movement) का रूप नहीं लेगी, तब तक केवल पुलिसिंग से प्रदूषण पर काबू पाना असंभव है।
शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘न्यायिक आदेशों की अधिकता से उल्लंघन की प्रवृत्ति बढ़ती है; पार्षदों को जोड़ें’:
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली विशेष पीठ ने केवल कानूनी डंडे के सहारे पर्यावरण संरक्षण कराने की सीमाओं को उजागर करते हुए कहा: “अदालत जितने अधिक आदेश पारित करती है, कई बार उल्लंघनों की संख्या उतनी ही अधिक हो जाती है। यह एक स्वाभाविक मानव प्रवृत्ति (Tendency) बन चुकी है। स्थानीय पार्षदों (Local Councillors) को इस मुहिम में शामिल कीजिए। उनसे कहें कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में नागरिकों से व्यक्तिगत रूप से यह अपील करें कि उनके दीपावली के उत्सव प्रदूषण फैलाने में योगदान न दें। इसे पूरी तरह से एक ‘जन-आंदोलन’ (People’s Movement) बनना चाहिए, न कि केवल हमारी न्यायिक पहल।”
2. ‘हर घर में एक पुलिसकर्मी तैनात नहीं किया जा सकता; व्यावहारिक सीमाएं हैं’:
- सुनवाई के दौरान न्यायमित्र (Amicus Curiae) द्वारा यह मुद्दा उठाए जाने पर कि पुलिसिंग की अपनी भौतिक सीमाएं हैं और राज्य हर घर के बाहर पुलिस का पहरा नहीं लगा सकता, पीठ ने सहमति जताई।
- अदालत ने माना कि त्योहारों पर समाज का स्व-नियमन (Self-Regulation) और नागरिक जागरूकता ही स्थायी समाधान दे सकती है।
3. ‘ग्रीन पटाखों की आड़ में प्रतिबंधित पटाखों की गुप्त बिक्री पर रोक जरूरी’:
- न्यायमित्र एवं वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह (Senior Advocate Aparajita Singh) ने अदालत के संज्ञान में लाया कि जमीनी स्तर पर प्रवर्तन एजेंसियां विफल हो रही हैं।
- विक्रेता कियोस्क और दुकानों के बाहर ‘ग्रीन क्रैकर्स’ (Green Crackers) के बक्से सजाकर रखते हैं, किंतु दुकानों के भीतर से प्रतिबंधित पारंपरिक पटाखों की धड़ल्ले से अवैध बिक्री की जा रही है। अदालत ने इस पर संज्ञान लेते हुए संबंधित प्राधिकारियों से जवाब तलब किया।
4. दिल्ली के स्कूली बच्चों के फेफड़ों पर गंभीर प्रभाव:
- न्यायमित्र ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 2012 के अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें पाया गया था कि दिल्ली के 43.5% स्कूली बच्चों के फेफड़ों की कार्यक्षमता (Lung Function) अन्य राज्यों के बच्चों की तुलना में गंभीर रूप से घट चुकी है।
- वकीलों ने अदालत से आग्रह किया कि ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) को इस प्रकार पुनर्गठित किया जाए कि बच्चों और स्कूलों से संबंधित सुरक्षात्मक कदमों को प्रदूषण के प्रारंभिक चरणों में ही स्वतंत्र रूप से लागू किया जा सके।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित याचिका व पर्यावरण क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) |
| सुनवाई की तिथि | 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार) |
| केस शीर्षक | इन री: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण नियंत्रण—नियामकीय एवं नीतिगत ढांचा, वायु गुणवत्ता शासन व अन्य सहायक मुद्दे [In Re: Curbing Air Pollution in the National Capital Region – Regulatory and Policy Framework, Air Quality Governance and Other Ancillary Issues] |
| न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायमित्र | वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह (Senior Advocate Aparajita Singh)। |
| केंद्र सरकार / CAQM की ओर से | अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी (Aishwarya Bhati)। |
| मूल विधिक मुद्दा | दिल्ली-एनसीआर में शीत ऋतु के दौरान वायु गुणवत्ता का तेजी से बिगड़ना, पराली दहन, वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण धूल, औद्योगिक धुआं और आगामी दीपावली पर पटाखों के उपयोग से उत्पन्न होने वाला सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल। |
| केंद्र सरकार (ASG) का पक्ष | व्यापक जन-जागरूकता अभियानों की आवश्यकता से सहमति जताई; एनसीआर राज्यों (दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान) से निर्माण धूल, नगरपालिका कचरा दहन, वाहनों के उत्सर्जन और औद्योगिक प्रदूषण पर संकलित एक विस्तृत क्षेत्र-वार अनुपालन चार्ट (Sector-wise Compliance Chart) अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया। |
| न्यायमित्र (Amicus) के मुख्य तर्क | 1. भौतिक पुलिसिंग की सीमाएं: पुलिस हर घर के भीतर जाकर पटाखों पर नजर नहीं रख सकती। 2. प्रशासनिक निष्क्रियता: राज्य सरकारें केवल तभी तेजी से कदम उठाती हैं जब सुप्रीम कोर्ट सीधे मुख्य सचिवों को तलब करता है या कड़े आदेश पारित करता है। 3. एयरशेड प्रबंधन: पूरे एनसीआर क्षेत्र को एक इकाई (Common Airshed) मानकर संपूर्ण कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए। |
| सर्वोच्च न्यायालय का अंतरिम निर्देश | स्थिति रिपोर्ट और अनुपालन चार्ट को रिकॉर्ड पर लिया गया; अधिकारियों को अद्यतन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश; विस्तृत सुनवाई दीपावली अवकाश के तुरंत बाद नियत की गई। |
विधिक एवं पर्यावरणीय विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 21, विधिक डंडा बनाम लोकतांत्रिक सहभागिता’
- ‘अर्जुन गोपाल बनाम भारत संघ’ [(2019) 13 SCC 523] और पटाखों पर प्रतिबंध का इतिहास:
- सर्वोच्च न्यायालय ने तीन बच्चों की ओर से दायर याचिका में बेरियम युक्त रासायनिक पटाखों के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था और केवल कम उत्सर्जन वाले ‘ग्रीन क्रैकर्स’ (Green Crackers) की अनुमति दी थी।
- किंतु पिछले कई वर्षों का अनुभव यह रहा है कि दीवाली की रात दिल्ली-एनसीआर में व्यापक स्तर पर अवैध आतिशबाजी होती है, जिससे एक्यूआई 900+ तक पहुंच जाता है। CJI सूर्यकांत की पीठ ने इसी कड़वे प्रशासनिक यथार्थ को स्वीकार करते हुए माना कि केवल अदालती आदेश थोप देने से कानून का पालन नहीं होता, बल्कि लोग चोरी-छिपे और अवज्ञा की भावना से अधिक पटाखे जलाते हैं।
- लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और स्थानीय पार्षदों का उपयोग:
- पर्यावरण विधि में अब तक केवल शीर्ष स्तर के नौकरशाहों (मुख्य सचिव, पर्यावरण सचिव, पुलिस कमिश्नर) पर जिम्मेदारी डाली जाती रही है।
- सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार नगर निगम के निर्वाचित प्रतिनिधियों—वार्ड पार्षदों (Municipal Councillors)—को इस विधिक अभियान का केंद्र बिंदु बनाने का सुझाव दिया है। चूंकि पार्षद जमीनी स्तर पर मोहल्लों, आरडब्ल्यूए (RWAs) और बाजारों से सीधे जुड़े होते हैं, इसलिए उनका सामाजिक प्रभाव पुलिसिया खौफ से कहीं अधिक कारगर साबित हो सकता है।
- ‘एयरशेड दृष्टिकोण’ (Airshed Approach) और CAQM की विधिक जवाबदेही:
- दिल्ली की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहाँ की हवा केवल दिल्ली के स्थानीय स्रोतों से नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी, राजस्थान) के पराली दहन, औद्योगिक उत्सर्जन और ईंट-भट्ठों से प्रभावित होती है।
- संसद द्वारा 2021 में गठित वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को संपूर्ण एनसीआर के लिए एक संयुक्त विधिक प्राधिकरण बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दीपावली के बाद की सुनवाई में केवल पटाखों पर ही नहीं, बल्कि संपूर्ण एयरशेड में निर्माण गतिविधियों, कचरा जलाने और भारी वाहनों के प्रवेश पर सख्त अनुपालन रिपोर्ट की समीक्षा की जाएगी।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित याचिका व पर्यावरण क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
- केस संदर्भ: इन री: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण नियंत्रण [Suo Motu / Writ Petition (Civil) Group Matters / 2026]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana)
- सुनवाई की तिथि: 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
- अगली सुनवाई: दीपावली अवकाश के तुरंत बाद (सप्ताह प्रारंभ, नवंबर 2026)
- कार्यवाही का परिणाम: अनुपालन चार्ट रिकॉर्ड पर दर्ज; नगर निगम पार्षदों को जोड़कर जन-जागरूकता आंदोलन चलाने का निर्देश; संबंधित अधिकारियों से औपचारिक अनुपालन स्थिति रिपोर्ट तलब।
विधिक सहायता एवं प्रतिनिधित्व:
- न्यायालय की सहायता हेतु न्यायमित्र (Amicus Curiae):
- वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह (Senior Advocate Aparajita Singh)।
- भारत संघ एवं CAQM की ओर से:
- अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (Additional Solicitor General – ASG) ऐश्वर्या भाटी (Aishwarya Bhati)।
- एनसीआर राज्यों (दिल्ली, हरियाणा, यूपी, राजस्थान) की ओर से:
- संबंधित राज्यों के वरिष्ठ स्थायी परामर्शदाता एवं अतिरिक्त महाधिवक्ता।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 21 — प्रदूषण-मुक्त जीवन और स्वास्थ्य का मौलिक अधिकार
- अनुच्छेद 48A — पर्यावरण, वनों और वन्यजीवों की रक्षा एवं सुधार का राज्य का कर्तव्य
- अनुच्छेद 51A(g) — प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने का प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य
- राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और निकटवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 (CAQM Act, 2021) — धारा 12 (आयोग की निर्देश जारी करने की शक्तियां)
- वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (Air Act, 1981) — धारा 19 व 20
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 — ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) के वैधानिक नियम
- भारत का संविधान:
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- पर्यावरणीय अनुपालन, त्योहारों का नियमन और जन-सहभागिता का विधिक मानक: ‘दीपावली जैसे प्रमुख राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक पर्वों पर वायु प्रदूषण का नियंत्रण केवल न्यायिक आदेशों की झड़ी लगाने अथवा पुलिस की दंडात्मक तैनाती से प्राप्त नहीं किया जा सकता; अत्यधिक अदालती निषेधाज्ञाएं अक्सर जनता में अवज्ञा और गुप्त उल्लंघनों की प्रवृत्ति को बढ़ा देती हैं; स्वच्छ हवा का मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) तभी सुरक्षित हो सकता है जब पर्यावरण संरक्षण एक स्वैच्छिक ‘जन-आंदोलन’ (People’s Movement) के रूप में विकसित हो; निर्वाचित स्थानीय पार्षदों और सामुदायिक संगठनों का यह संवैधानिक दायित्व है कि वे नागरिकों को हानिकारक पटाखों के त्याग हेतु प्रेरित करें; तथापि, यह जागरूकता अभियान राज्य की उस वैधानिक जिम्मेदारी को कम नहीं करता जिसके तहत उसे प्रतिबंधित पटाखों की अवैध बिक्री पर पूर्ण रोक लगानी है और सीएक्यूपी नियमों का कड़ाई से प्रवर्तन सुनिश्चित करना है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: सर्वोच्च न्यायालय के इस दृष्टिकोण के बाद दिल्ली और एनसीआर के नगर निगमों को तत्काल वार्ड-वार पार्षद समितियों को सक्रिय करने और आरडब्ल्यूए के साथ मिलकर जन-जागरूकता अभियान चलाने का रोडमैप तैयार करना होगा; वहीं शीर्ष अदालत ने सभी संबंधित राज्यों और एजेंसियों को अपनी अंतिम अनुपालन रिपोर्ट तैयार रखने को कहा है, जिसकी दीपावली अवकाश समाप्त होते ही बिंदुवार न्यायिक समीक्षा की जाएगी।
NCR Air Pollution: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | CJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| केस / शीर्षक | In Re: Curbing Air Pollution in the National Capital Region – Regulatory and Policy Framework, Air Quality Governance and Other Ancillary Issues |
| प्रतिनिधित्व | न्याय मित्र (Amici Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह आदि | केंद्र/정부: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी |
| मुख्य बिंदु | 1. ग्रीन पटाखों की आड़ में प्रतिबंधित पटाखों की गुप्त बिक्री पर चिंता। 2. CPCB की 2012 रिपोर्ट का हवाला: दिल्ली के 43.5% बच्चों के फेफड़ों की कार्यक्षमता कम। 3. GRAP के तहत स्कूल बंद करने के नियमों को शुरुआती चरणों में लागू करने का सुझाव। |
| अदालत का अंतरिम आदेश | प्रतिक्रिया और अनुपालन चार्ट रिकॉर्ड पर लिए गए: दिवाली की छुट्टियों के तुरंत बाद विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने हेतु मामला सूचीबद्ध किया गया। |

