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मामले की पृष्ठभूमि और संवैधानिक तर्क
- मामले का घटनाक्रम:दंपति ने गेस्टेशनल सरोगेसी (Gestational Surrogacy) की सिफारिश से पहले इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) के कई असफल चक्रों का सामना किया था। जब उन्होंने पात्रता प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया, तो नासिक नगर निगम ने अधिनियम की धारा 4(iii)(c)(I) का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया, क्योंकि पत्नी की उम्र 54 वर्ष (50 की ऊपरी सीमा से अधिक) थी, हालांकि पति की उम्र 53 वर्ष (55 की सीमा के भीतर) थी।
- केंद्र सरकार और नगर निगम का रुख:केंद्र सरकार और नगर निगम ने एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए आयु सीमा का बचाव किया, जिसमें कहा गया था कि अधिक उम्र में बच्चों की देखभाल की क्षमता घटती है और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं।
- न्यायालय का विधिक दृष्टिकोण:हाईकोर्ट ने माना कि सरोगेसी कानून का मुख्य उद्देश्य निःसंतान जोड़ों को संतान सुख प्रदान करना है। यदि पति निर्धारित कानूनी आयु सीमा के भीतर है और दंपति चिकित्सीय रूप से सक्षम है, तो केवल पत्नी की आयु के आधार पर पूरे जोड़े को अयोग्य ठहराना अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का हनन है।
मुख्य विधिक व संवैधानिक निष्कर्ष
1. संयुक्त इकाई का सिद्धांत (Composite Unit Principle):
यह निर्णय कानून की एक अनूठी व्याख्या प्रस्तुत करता है कि सरोगेसी अधिनियम के तहत दंपतियों का मूल्यांकन अलग-अलग व्यक्तियों के रूप में करने के बजाय एक ‘संयुक्त इकाई’ के रूप में किया जाना चाहिए। यदि एक साथी वैधानिक मापदंडों को पूरा करता है और परिवार का समर्थन उपलब्ध है, तो प्रक्रिया की अनुमति दी जानी चाहिए।
2. अनुच्छेद 21 और प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy):
अदालत ने पुनः रेखांकित किया कि वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से माता-पिता बनने का अधिकार नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है, और वैधानिक सीमाओं को सामाजिक और जैविक वास्तविकताओं के आलोक में उदारतापूर्वक पढ़ा जाना चाहिए।
मुंबई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार, व्यक्तिगत गरिमा एवं प्रजनन स्वायत्तता / Reproductive Autonomy), सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (Surrogacy (Regulation) Act, 2021) की धारा 4(iii)(c)(I) (इच्छुक दंपती हेतु वैधानिक आयु सीमा—महिला हेतु 23 से 50 वर्ष तथा पुरुष हेतु 26 से 55 वर्ष), तथा सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) न्यायशास्त्र के अंतर्गत बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मातृत्व और पितृत्व के अधिकार पर एक अत्यंत प्रगतिशील और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।
बॉम्बे उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति भारती डांगरे (Justice Bharati Dangre) और न्यायमूर्ति आशीष चव्हाण (Justice Ashish Chavan) की खंडपीठ ने नासिक नगर निगम (Nashik Municipal Corporation) के उस आदेश को पूरी तरह रद्द (Quashed) कर दिया, जिसने 54 वर्षीय महिला और उनके 53 वर्षीय पति के सरोगेसी पात्रता प्रमाण पत्र (Eligibility Certificate) के आवेदन को केवल इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि पत्नी की उम्र 50 वर्ष की वैधानिक ऊपरी सीमा को पार कर चुकी थी।
उच्च न्यायालय ने कानून की मानवीय और समावेशी व्याख्या करते हुए व्यवस्था दी कि इच्छुक दंपती को एक ‘संयुक्त इकाई’ (Composite Unit) के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि पति कानून में निर्धारित 55 वर्ष की स्वीकार्य आयु सीमा के भीतर आता है, तो केवल पत्नी के 50 वर्ष से अधिक होने के कारण पूरे दंपती को सरोगेसी से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने नासिक के संबंधित सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह दंपती को पात्रता प्रमाण पत्र जारी करे तथा जिला मेडिकल बोर्ड (District Medical Board) को दंपती की चिकित्सकीय जांच करने का आदेश दिया।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘प्रजनन विकल्प चुनना अनुच्छेद 21 की व्यक्तिगत गरिमा का पहलू; प्रगतिशील व्याख्या आवश्यक’:
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति आशीष चव्हाण की पीठ ने प्रजनन अधिकारों को मौलिक मानवाधिकारों से जोड़ते हुए अपने निर्णय में दर्ज किया: “प्रजनन संबंधी विकल्प चुनने का अधिकार (Right to make reproductive choices), जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित व्यक्तिगत गरिमा के एक पहलू (Facet of personal dignity) के रूप में मान्यता प्राप्त है, उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों और बदलते सामाजिक ताने-बाने के अनुरूप कानूनों की प्रगतिशील व्याख्या (Progressive interpretation) को ध्यान में रखते हुए पूरी शक्ति के साथ प्रभावी होना चाहिए। ताकि अंततः यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रत्येक दंपती या एकल महिला सामाजिक और व्यवस्थागत बाधाओं को पार करते हुए अपने प्रजनन अधिकारों का पूर्ण उपभोग (Avail reproductive rights to its fullest) कर सके।”
2. ‘पत्नी की 50 वर्ष से अधिक आयु पूरे दंपती के लिए बाधा नहीं बन सकती’:
पीठ ने सरोगेसी अधिनियम के कठोर प्रावधानों को युक्तिसंगत बनाते हुए कहा: “केवल इसलिए कि पत्नी 50 वर्ष की आयु पार कर चुकी है, दंपती को सरोगेसी की प्रक्रिया अपनाने से रोकने के लिए कोई पूर्ण विधिक बाधा (Should not pose an embargo) नहीं होनी चाहिए। इच्छुक दंपती एक संयुक्त इकाई के रूप में कार्य करता है; अतः किसी एक जीवनसाथी की आयु-संबंधी अयोग्यता का दंड दूसरे जीवनसाथी को नहीं दिया जा सकता, विशेषकर तब जब पति कानून द्वारा अनुमत 55 वर्ष की सीमा के भीतर आता हो।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | बॉम्बे उच्च न्यायालय, मूल क्षेत्राधिकार (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226) |
| पीठ | न्यायमूर्ति भारती डांगरे (Justice Bharati Dangre) एवं न्यायमूर्ति आशीष चव्हाण (Justice Ashish Chavan) |
| निर्णय की तिथि | नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | दंपती बनाम नासिक नगर निगम व अन्य [Writ Petition (Civil) / 2026] |
| याचिकाकर्ता पक्ष | 54 वर्षीय पत्नी एवं 53 वर्षीय पति — निःसंतान विवाहित दंपती। |
| याचिकाकर्ता के अधिवक्तागण | अधिवक्ता उत्कर्ष पोंडकुले (Advocate Utkarsh Pondkule), जगदीश देवरे एवं अक्षय देसाई। |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. नासिक नगर निगम (सक्षम प्राधिकारी — सरोगेसी अधिनियम) 2. भारत संघ (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय) 3. महाराष्ट्र राज्य। |
| भारत संघ (केंद्र) की ओर से | अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अनिल सी. सिंह (Anil C Singh), अधिवक्ता सविता गणू, कृष्णकांत देशमुख एवं आदर्श व्यास। |
| अदालत द्वारा नियुक्त न्यायमित्र | वरिष्ठ अधिवक्ता शरण जगतियानी (Senior Advocate Sharan Jagtiani), अधिवक्ता सुरभि अग्रवाल, सिद्धार्थ जोशी एवं अवंती दीवान। |
| राज्य सरकार के अभियोजक | अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता केतन जोशी एवं ए.ए. अलसपुरकर। |
| विवादित विधिक प्रावधान | सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 की धारा 4(iii)(c)(I) — जिसके तहत सरोगेसी चाहने वाले इच्छुक दंपती के लिए महिला की आयु 23 से 50 वर्ष के बीच और पुरुष की आयु 26 से 55 वर्ष के बीच होना अनिवार्य है। |
| विवाद का मूल कारण | दंपती ने संतान प्राप्ति हेतु कई वर्षों तक इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) के व्यापक चक्र पूरे किए, किंतु सफलता नहीं मिली। अंततः विशेषज्ञ डॉक्टरों ने उन्हें ‘जेस्टेशनल सरोगेसी’ (Gestational Surrogacy) का सहारा लेने की सलाह दी। जब उन्होंने नासिक नगर निगम में पात्रता प्रमाण पत्र हेतु आवेदन किया, तो प्राधिकरण ने केवल इसलिए आवेदन खारिज कर दिया क्योंकि महिला की उम्र 54 वर्ष थी। |
| केंद्र सरकार का विधिक रुख | केंद्र सरकार ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए आयु सीमा का बचाव किया। सरकार की दलील थी कि माता-पिता की अधिक आयु में बच्चे के भरण-पोषण, देखभाल की क्षमता में कमी आती है और माता-पिता के स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ते हैं। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | रिट याचिका स्वीकृत (Allowed); नासिक नगर निगम का निरस्तीकरण आदेश रद्द; नगर निगम को पात्रता प्रमाण पत्र जारी करने और जिला मेडिकल बोर्ड को दंपती की चिकित्सकीय जांच करने का आदेश। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘सरोगेसी अधिनियम 2021, प्रजनन स्वायत्तता और समग्र इकाई का सिद्धांत’
- ‘प्रजनन स्वायत्तता’ (Reproductive Autonomy) और अनुच्छेद 21:
- सर्वोच्च न्यायालय ने 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ [(2017) 10 SCC 1] और सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन [(2009) 9 SCC 1] में यह स्थापित किया था कि प्रजनन संबंधी निर्णय लेना महिला और दंपती की निजता, दैहिक गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अविभाज्य अंग है।
- राज्य कानून बनाकर सरोगेसी में व्यावसायिक शोषण को तो रोक सकता है, किंतु वह ऐसे कठोर और यांत्रिक नियम नहीं थोप सकता जो वास्तविक रूप से संतान के इच्छुक दंपतियों के माता-पिता बनने के सपने को हमेशा के लिए समाप्त कर दें।
- इच्छुक दंपती का ‘संयुक्त इकाई’ (Composite Unit) के रूप में मूल्यांकन:
- सरोगेसी कानून में पति और पत्नी दोनों को मिलाकर ‘इच्छुक दंपती’ (Intending Couple) परिभाषित किया गया है।
- बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया कि जब तक पति निर्धारित 55 वर्ष की सीमा के भीतर है और वह बच्चे के लालन-पालन का दायित्व उठाने के लिए पूरी तरह सक्षम और विधिक रूप से पात्र है, तब तक केवल पत्नी की आयु 4 वर्ष अधिक होने को दंपती के विरुद्ध ‘अपूर्णनीय निर्योग्यता’ (Incurable Disqualification) नहीं माना जा सकता।
- जेस्टेशनल सरोगेसी (Gestational Surrogacy) में शारीरिक जोखिम का अभाव:
- केंद्र सरकार ने अधिक आयु में गर्भावस्था के स्वास्थ्य जोखिमों का तर्क दिया था।
- अदालत ने पाया कि यह मामला सामान्य प्राकृतिक गर्भावस्था का नहीं, बल्कि ‘जेस्टेशनल सरोगेसी’ का है, जहाँ 54 वर्षीय महिला स्वयं गर्भ धारण नहीं कर रही है, बल्कि एक अन्य स्वस्थ सरोगेट माता गर्भ धारण करेगी। ऐसे में महिला के शरीर पर गर्भावस्था का कोई जैविक या चिकित्सकीय जोखिम उत्पन्न नहीं होता।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय, मूल क्षेत्राधिकार (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226)
- केस संदर्भ: दंपती बनाम नासिक नगर निगम व अन्य [Writ Petition (Civil) / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति भारती डांगरे (Justice Bharati Dangre) एवं न्यायमूर्ति आशीष चव्हाण (Justice Ashish Chavan)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: रिट याचिका स्वीकृत; नासिक नगर निगम का निरस्तीकरण आदेश रद्द; दंपती को सरोगेसी पात्रता प्रमाण पत्र जारी करने और जिला मेडिकल बोर्ड को मेडिकल परीक्षण करने का आदेश।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (दंपती) की ओर से:
- अधिवक्ता: उत्कर्ष पोंडकुले (Advocate Utkarsh Pondkule)
- अधिवक्ता: जगदीश देवरे एवं अक्षय देसाई।
- प्रतिवादी भारत संघ (Union of India) की ओर से:
- अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (Additional Solicitor General – ASG) अनिल सी. सिंह (Anil C Singh)
- अधिवक्ता: सविता गणू, कृष्णकांत देशमुख एवं आदर्श व्यास।
- न्यायालय की सहायता हेतु न्यायमित्र (Amicus Curiae):
- वरिष्ठ अधिवक्ता शरण जगतियानी (Senior Advocate Sharan Jagtiani)
- अधिवक्ता: सुरभि अग्रवाल, सिद्धार्थ जोशी एवं अवंती दीवान।
- महाराष्ट्र राज्य की ओर से:
- अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता केतन जोशी एवं ए.ए. अलसपुरकर।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (Surrogacy (Regulation) Act, 2021):
- धारा 4(iii)(c)(I) — इच्छुक दंपती की आयु सीमा संबंधी पात्रता शर्तें (महिला: 23-50 वर्ष, पुरुष: 26-55 वर्ष)
- धारा 4(iii)(a) — जिला मेडिकल बोर्ड द्वारा आवश्यक चिकित्सकीय प्रमाणन
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 21 — व्यक्तिगत जीवन, गरिमा और प्रजनन स्वायत्तता का मौलिक अधिकार
- अनुच्छेद 14 — मनमानेपन के विरुद्ध समानता का अधिकार
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की संवैधानिक रिट अधिकारिता
- सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (Surrogacy (Regulation) Act, 2021):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सरोगेसी विनियमन, दंपती की संयुक्त विधिक हैसियत और प्रजनन अधिकारों का विधिक मानक: ‘संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रजनन संबंधी विकल्प चुनना और माता-पिता बनने का प्रयास करना प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत गरिमा और निजता का अनिवार्य पहलू है; सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 की धारा 4(iii)(c)(I) के अंतर्गत निर्धारित आयु सीमाओं का निर्वचन यांत्रिक या कठोर रूप से करने के बजाय प्रगतिशील और मानवीय दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए; किसी इच्छुक दंपती को कानून की दृष्टि में एक संयुक्त इकाई (Composite Unit) माना जाता है, और यदि पति निर्धारित 55 वर्ष की स्वीकार्य आयु सीमा के भीतर आता है, तो केवल पत्नी के 50 वर्ष की सीमा को पार कर जाने के आधार पर पूरे दंपती को सरोगेसी से वंचित नहीं किया जा सकता; जेस्टेशनल सरोगेसी में इच्छुक महिला द्वारा स्वयं गर्भ धारण न किए जाने के कारण उन्नत आयु के शारीरिक जोखिम आकर्षित नहीं होते; तथा सामाजिक और व्यवस्थागत बाधाओं को दूर करते हुए बांझपन से जूझ रहे दंपतियों को सहायक प्रजनन तकनीकों का लाभ उठाने देना विधि के शासन का प्राथमिक उद्देश्य है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: बॉम्बे उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद नासिक नगर निगम को तत्काल दंपती के पक्ष में पात्रता प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी; साथ ही जिला मेडिकल बोर्ड द्वारा उनके स्वास्थ्य और आनुवंशिक मापदंडों का परीक्षण किया जाएगा, जिसके उपरांत यह 54 वर्षीय महिला और 53 वर्षीय पति कानूनी रूप से सरोगेसी के माध्यम से संतान सुख प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे। यह फैसला देश भर के उन उम्रदराज दंपतियों के लिए एक बड़ा कानूनी मार्गदर्शक नज़ीर बनेगा जो एक साथी की उम्र सीमा पार होने के कारण सरोगेसी से बाहर कर दिए गए थे।
Age Factor:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति भारती डांगरे एवं न्यायमूर्ति आशिष चव्हाण |
| याचिकाकर्ता जोड़ा | 54 वर्षीय पत्नी और 53 वर्षीय पति (नासिक, महाराष्ट्र) |
| प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ता पक्ष: अधिवक्ता उत्कर्ष पोंडकुले, जगदीश देवरे, अक्षय देसाई | केंद्र सरकार: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अनिल सी. सिंह | न्याय मित्र: वरिष्ठ अधिवक्ता शरण जगतियानी |
| संबंधित कानून | Surrogacy (Regulation) Act, 2021 की धारा 4(iii)(c)(I) (महिला हेतु 23-50 वर्ष एवं पुरुष हेतु 26-55 वर्ष की सीमा) |
| अदालत का अंतिम आदेश | निगम का अस्वीकृति आदेश रद्द: नासिक नगर निगम को पात्रता प्रमाण पत्र जारी करने और जिला मेडिकल बोर्ड को दंपति की चिकित्सीय जांच का निर्देश। |

