Saturday, November 7, 2026
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Bar Vs Bench: चीफ जस्टिस कोर्ट रूम में वकीलों के हंगामे…यदि आप एक वकील जैसा आचरण नहीं कर सकते; आपके वकील बने रहने का कोई औचित्य नहीं

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मामले की पृष्ठभूमि और अदालती कार्यवाही

  1. कर्नाटक राज्य बार काउंसिल व AAB का हड़ताल का आह्वान:राज्य में वकीलों पर लगातार हो रहे हमलों के विरोध में कर्नाटक राज्य बार काउंसिल और एडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ बेंगलुरु (AAB) ने 3 नवंबर 2026 को पूरे राज्य में अदालती कामकाज का बहिष्कार करने और विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था।
  2. कोर्ट हॉल में हंगामा और डायस तक पहुंचना:सुनवाई के दौरान प्रदर्शनकारी वकीलों का एक समूह मुख्य न्यायाधीश के कोर्ट हॉल में घुस आया और नारेबाज़ी करते हुए अदालती कार्यवाही ठप करा दी। आरोप है कि एक वकील मुख्य न्यायाधीश के डायस (Dais) तक पहुंच गया था।
  3. मौखिक माफी खारिज, औपचारिक हलफनामा अनिवार्य:घटना के तुरंत बाद AAB की कोषाध्यक्ष श्वेता रविशंकर ने कोर्ट के समक्ष पेश होकर मौखिक माफी मांगने की कोशिश की। हालांकि, पीठ ने मौखिक माफी को साफ तौर पर खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि अवमानना का नोटिस जारी किया जा चुका है और यदि संघ या वकील सफाई देना चाहते हैं तो उन्हें कारण बताओ हलफनामा (Affidavit of Apology) दाखिल करना होगा।

मुख्य विधिक व अनुशासनात्मक निष्कर्ष

1. बार काउंसिल को अनुशासनात्मक संदर्भ देने की चेतावनी:

अदालत ने सख्त चेतावनी दी कि वह केवल अवमानना अधिनियम (Contempt of Courts Act) तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अदालत की मर्यादा तोड़ने वाले वकीलों की सनद (Licence to Practice) रद्द करने/अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला कर्नाटक राज्य बार काउंसिल (State Bar Council) को भी भेजेगी।

2. सुप्रीम कोर्ट के नज़ीरों (Precedents) का हवाला:

खंडपीठ ने वकीलों की हड़ताल और अदालती कामकाज ठप कराने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के कड़े फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब मुख्य न्यायाधीश ने पहले ही आश्वासन दिया था कि वकीलों की गैर-मौजूदगी में कोई प्रतिकूल आदेश पारित नहीं होगा, तब इस प्रकार की गुंडागर्दी न्यायपालिका की स्वायत्तता पर हमला है।

बेंगलुरु: भारत का संविधान के अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्च न्यायालय की अवमानना दंडित करने की अंतर्निहित शक्ति), न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 14 (न्यायालय के समक्ष प्रत्यक्ष अवमानना / Contempt in the Face of the Court), अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 35 (पेशेवर कदाचार व बार काउंसिल संदर्भ), कर्नाटक अधिवक्ता (हिंसा निषेध) अधिनियम, 2023 (Karnataka Prohibition of Violence Against Advocates Act, 2023), तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल व हालिया अवमानना नज़ीरों के विधिक सिद्धांतों के तहत कर्नाटक उच्च न्यायालय ने न्यायिक मर्यादा के गंभीर उल्लंघन पर अत्यंत कठोर रुख अपनाया है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) विभु बाखरू (Justice Vibhu Bakhru) और न्यायमूर्ति के.एस. हेमालेखा (Justice KS Hemalekha) की खंडपीठ ने चीफ जस्टिस की कोर्ट हॉल (कोर्ट रूम नं. 1) में जबरन घुसकर न्यायिक कार्यवाही में व्यवधान डालने और डायस तक चढ़कर हंगामा करने वाले अज्ञात वकीलों के खिलाफ स्वतः संज्ञान आपराधिक अवमानना (Suo Motu Contempt of Court Case) दर्ज करने का आदेश दिया।

अदालत ने एडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ बेंगलुरु (Advocates Association of Bengaluru – AAB) को अवमानना कार्यवाही में पक्षकार बनाते हुए औपचारिक नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही, खंडपीठ ने रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि वह अदालत कक्ष के CCTV फुटेज का विस्तृत परीक्षण कर उन सभी व्यक्तियों की पहचान करे जिन्होंने कोर्ट हॉल में व्यवधान डाला। अदालत ने दो-टूक कहा कि वकीलों का यह कृत्य ‘न्यायालय के मुंह पर सीधी अवमानना’ (Contempt in the face of the court) है और यदि कोई व्यक्ति एक अधिवक्ता की तरह मर्यादित आचरण नहीं कर सकता, तो उसके वकील बने रहने का कोई विधिक अधिकार नहीं है।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘प्रथम दृष्टया अवमाननापूर्ण कृत्य; कोई वकील डायस तक कैसे आ सकता है?’:

मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के.एस. हेमालेखा की खंडपीठ ने न्यायिक कार्यवाही बाधित करने की घटना पर कड़ा रोष जताते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “प्रथम दृष्टया, हमारा यह सुविचारित मत है कि यह आचरण अवमाननापूर्ण व्यवहार (Contemptuous Behaviour) की श्रेणी में आता है। रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि वह सीसीटीवी फुटेज की जांच करके उन व्यक्तियों की पहचान करे जिन्होंने कोर्ट हॉल में हंगामा और उपद्रव करने का प्रयास किया। यह कतई स्वीकार्य व्यवहार नहीं है। वह व्यक्ति सीधे यहाँ तक आ गया—वह सीधे डायस (Dais) तक चढ़ आया। हमने अवमानना नोटिस जारी कर दिया है। यह राज्य का उच्च न्यायालय है, और यदि किसी को लगता है कि कोई भी यहाँ जबरन घुसकर हंगामा खड़ा कर सकता है, तो इसके गंभीर कानूनी परिणाम भुगतने ही होंगे (Consequences must follow)।”

2. ‘मौखिक माफी नहीं चलेगी, औपचारिक हलफनामा दें; बार काउंसिल को भी भेजेंगे मामला’:

  • जब AAB की कोषाध्यक्ष श्वेता रविशंकर ने वकीलों की ओर से मौखिक माफी मांगने का प्रयास किया, तो खंडपीठ ने इसे सिरे से खारिज कर दिया:“कैसी माफी? जो वकील अदालत की कार्यवाही बाधित कर रहे थे, यदि वे माफी मांगना चाहते हैं तो उन्हें बाकायदा माफी का औपचारिक शपथ-पत्र (Affidavit of apology) दाखिल करना होगा।यह किस प्रकार का व्यवहार है? क्या आप एक वकील हैं? आप न्यायालय के एक अधिकारी (Officer of the Court) हैं। आप अपनी जिम्मेदारियों को ताक पर रखकर इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकते। यह एक अधिवक्ता के रूप में अत्यंत अशोभनीय है। यदि आप एक वकील की तरह आचरण नहीं कर सकते, तो आपके अधिवक्ता बने रहने का कोई औचित्य ही नहीं है।हम न केवल अवमानना की कार्यवाही चलाएंगे, बल्कि इस पूरे मामले को अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु बार काउंसिल को भी संदर्भित (Refer to the Bar Council) करेंगे।”

3. ‘प्रतिकूल आदेश न देने के आश्वासन के बावजूद कोर्ट में उपद्रव’:

  • खंडपीठ ने रेखांकित किया कि अदालत ने बार के विरोध को समझते हुए पहले ही संरक्षण दिया था:“व्यक्तिगत रूप से कहें तो यह आचरण बिल्कुल अस्वीकार्य है, विशेषकर तब जब हमने सुबह ही स्पष्ट कर दिया था कि हड़ताल/विरोध के चलते यदि कोई वकील पेश नहीं होता है तो उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल आदेश (No adverse orders) पारित नहीं किया जाएगा। हमने एसोसिएशन को आश्वस्त किया था कि हम उनकी चिंताओं को समझते हैं। इसके बावजूद कोर्ट रूम में घुसकर कार्यवाही रोकना कानून के शासन को चुनौती देना है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (3 नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयकर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक अवमानना क्षेत्राधिकार)
पीठमुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू (Chief Justice Vibhu Bakhru) एवं न्यायमूर्ति के.एस. हेमालेखा (Justice KS Hemalekha)
आदेश की तिथि3 नवंबर 2026
मूल संदर्भ / पृष्ठभूमिकर्नाटक के विभिन्न जिलों में हाल के दिनों में अधिवक्ताओं पर हुए हिंसक हमलों के विरोध में कर्नाटक राज्य विधिज्ञ परिषद (KSBC) और एडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ बेंगलुरु (AAB) ने 3 नवंबर को राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन और कार्य बहिष्कार का आह्वान किया था। उनकी मांग थी कि कर्नाटक अधिवक्ता (हिंसा निषेध) अधिनियम, 2023 को और अधिक प्रभावी व सख्त बनाया जाए।
कोर्ट रूम में घटित घटनासुनवाई के दौरान वकीलों का एक अनियंत्रित समूह मुख्य न्यायाधीश की अदालत (Court Hall 1) में जबरन घुस आया और नारेबाजी व शोरगुल कर न्यायिक कार्यवाही को ठप करने का प्रयास किया। इस दौरान एक वकील जजों के बैठने के मंच (डायस – Dais) तक पहुंच गया।
AAB की ओर से दी गई दलीलआदेश पारित होने के बाद AAB की कोषाध्यक्ष श्वेता रविशंकर (Shwetha Ravishankar) ने अदालत के समक्ष पेश होकर स्पष्टीकरण देने का प्रयास किया कि उस समय हॉल में भारी भीड़ थी और डायस पर चढ़ने वाला व्यक्ति भीड़ के धक्के के कारण आगे चला गया था। उन्होंने वकीलों की ओर से मौखिक क्षमा याचना की।
अदालत का प्रत्युत्तरखंडपीठ ने धक्के के दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि जज अपनी आंखों से देख रहे थे कि वह व्यक्ति जानबूझकर डायस तक चढ़ा था। अदालत ने कहा कि न्यायिक गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता और मौखिक माफी के बजाय औपचारिक जवाब/शपथ-पत्र देना होगा।
अंतिम अंतरिम निर्देश1. अज्ञात उपद्रवियों के खिलाफ स्वतः संज्ञान अवमानना केस दर्ज।
2. रजिस्ट्री को CCTV फुटेज सुरक्षित कर उपद्रवी चेहरों की पहचान करने का निर्देश।
3. AAB को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया।
4. अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 को नियत।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘कोर्ट रूम की शुचिता, डायस का अतिक्रमण और धारा 14’

  • ‘न्यायालय के समक्ष प्रत्यक्ष अवमानना’ (Contempt in the Face of the Court):
    • न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 14 उन परिस्थितियों को नियंत्रित करती है जहाँ अवमानना पीठासीन न्यायाधीशों की उपस्थिति और दृश्य सीमा के भीतर होती है।
    • किसी वकील या वादी द्वारा चिल्लाना, कार्यवाही बाधित करना या जजों के डायस तक चढ़ आना केवल अनुशासनहीनता नहीं है, बल्कि यह न्याय प्रशासन के भौतिक संचालन पर सीधा हमला है। ऐसे मामलों में अदालत को किसी औपचारिक शिकायत या प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं होती; पीठासीन पीठ स्वयं घटना की गवाह होती है।
  • अधिवक्ता की दोहरी भूमिका और विधिक सीमाएं:
    • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स के तहत वकील केवल अपने मुवक्किल का प्रवक्ता नहीं होता, बल्कि वह प्राथमिक रूप से ‘अदालत का अधिकारी’ (Officer of the Court) होता है।
    • मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू की यह टिप्पणी कि “यदि आप एक वकील की तरह आचरण नहीं कर सकते तो आपके वकील रहने का कोई औचित्य नहीं है”, सीधे तौर पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम बॉम्बे हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के सिद्धांतों को पुष्ट करती है। अपनी मांगों के लिए भी वकील अदालत कक्ष को राजनीतिक अखाड़े में तब्दील नहीं कर सकते।
  • बार काउंसिल को संदर्भ (Reference under Section 35):
    • उच्च न्यायालय ने न केवल अवमानना (जिसमें 6 माह का कारावास हो सकता है) की चेतावनी दी, बल्कि यह भी संकेत दिया कि मामले को राज्य विधिज्ञ परिषद को भेजा जाएगा।
    • यदि बार काउंसिल की अनुशासन समिति जांच में पाती है कि वकीलों ने अदालत की गरिमा को भंग किया, तो उनका वकालत का लाइसेंस निलंबित (Suspension of Practice) या स्थायी रूप से रद्द (Revocation of Sanad) किया जा सकता है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: कर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक अवमानना क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: स्वतः संज्ञान आपराधिक अवमानना याचिका / Suo Motu Criminal Contempt Case / 2026
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू (Chief Justice Vibhu Bakhru) एवं न्यायमूर्ति के.एस. हेमालेखा (Justice KS Hemalekha) (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • अगली सुनवाई की तिथि: 19 नवंबर 2026
  • कार्यवाही का स्वरूप: कोर्ट हॉल 1 में न्यायिक व्यवधान पर स्वतः संज्ञान अवमानना; AAB को नोटिस; रजिस्ट्री को CCTV फुटेज की फॉरेंसिक जांच का निर्देश।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • न्यायालय की ओर से: स्वतः संज्ञान प्रक्रिया।
  • एडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ बेंगलुरु (AAB) की ओर से: कोषाध्यक्ष श्वेता रविशंकर (Advocate Shwetha Ravishankar)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना दंडित करने की उच्च न्यायालय की शक्ति)
    • न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना) एवं धारा 14 (न्यायालय के समक्ष प्रत्यक्ष अवमानना की प्रक्रिया)
    • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) — धारा 35 (व्यावसायिक कदाचार हेतु अनुशासनात्मक कार्यवाही)
    • कर्नाटक अधिवक्ता (हिंसा निषेध) अधिनियम, 2023 (Karnataka Act 18 of 2023) — वकीलों के संरक्षण का कानून जिसके क्रियान्वयन हेतु विरोध प्रदर्शन आयोजित था
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • कोर्ट रूम की गरिमा और अधिवक्ताओं के आचरण का विधिक मानक: ‘अधिवक्ता न्यायालय के सम्मानित अधिकारी हैं और उनसे न्यायिक मर्यादा व अनुशासन के उच्चतम मानकों के पालन की अपेक्षा की जाती है; अपनी वैधानिक मांगों या विरोध प्रदर्शनों के नाम पर अदालत कक्ष में जबरन घुसना, न्यायिक कार्यवाही को ठप करना अथवा जजों के डायस तक पहुंचना न्यायालय के प्राधिकार पर सीधा आघात और खुली आपराधिक अवमानना (Contempt in the Face of the Court) है; ऐसी घटनाओं में अदालतें मौखिक माफ़ी स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं हैं और शामिल व्यक्तियों की पहचान कर उन पर कठोर अवमानना दंड तथा बार काउंसिल द्वारा वकालत लाइसेंस निलंबन की अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति व भावी प्रक्रिया: कर्नाटक हाईकोर्ट की आईटी व सुरक्षा शाखा ने चीफ जस्टिस कोर्ट हॉल के 3 नवंबर के सभी सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग सील कर दी है; रजिस्ट्री पहचान रिपोर्ट तैयार कर 19 नवंबर 2026 से पूर्व पीठ के समक्ष पेश करेगी; वहीं AAB के पदाधिकारियों को 4 नवंबर को अदालत में औपचारिक हलफनामा पेश कर अपने रुख और स्पष्टीकरण का ब्योरा देना होगा।

Bar Vs Bench: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court), बेंगलुरु
पीठमुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू एवं न्यायमूर्ति के. एस. हेमलेखा
प्रतिवादी संस्था/पक्षएडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ बेंगलुरु (AAB) एवं हंगामा करने वाले अज्ञात अधिवक्ता
मूल घटनाकर्नाटक में वकीलों पर हो रहे हमलों के खिलाफ ‘प्रोटेक्शन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट एडवोकेट्स एक्ट, 2023’ को सख्ती से लागू करने की मांग को लेकर हड़ताल। प्रदर्शन के दौरान वकीलों का CJ के कोर्ट हॉल में घुसकर हंगामा करना और डायस तक पहुंचना।
अदालत का फैसला/आदेशस्वतः संज्ञान अवमानना दर्ज: रजिस्ट्री को CCTV फुटेज जांचकर हंगामा करने वाले वकीलों की पहचान करने का निर्देश; AAB को कारण बताओ नोटिस जारी; अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026।
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