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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी घटनाक्रम
- शिकायतकर्ता के आरोप:कांग्रेस नेता राम निवास शर्मा ने आरोप लगाया था कि 23 सितंबर 2025 को एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अधिकारियों को संबोधित करते हुए भगवान हनुमान का संदर्भ देकर व्यंगात्मक और अपमानजनक टिप्पणियां कीं। शिकायतकर्ता ने पुलिस आयुक्त और स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत दी थी, लेकिन FIR दर्ज न होने पर अदालत का रुख किया।
- दिल्ली पुलिस की एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR):दिल्ली पुलिस ने अदालत में पेश अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता ने भाषण के केवल चुनिंदा अंश पेश किए थे, जबकि पूरे वीडियो में मुख्यमंत्री की भगवान हनुमान के प्रति श्रद्धा स्पष्ट दिखाई देती है। पुलिस ने यह भी उल्लेख किया कि यह शिकायत राजनीतिक द्वेष (Orchestrated Political Vendetta) से प्रेरित प्रतीत होती है।
- साक्ष्यों की उपलब्धता और न्यायिक विवेक:अदालत ने पाया कि दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय (DIP) से भाषण का पूरा वीडियो रिकॉर्डिंग, ट्रांसक्रिप्ट और इलेक्ट्रॉनिक्स साक्ष्य प्रमाण पत्र (Certificate) पहले ही प्राप्त किया जा चुका है। चूंकि सभी साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद हैं, इसलिए पुलिस द्वारा अलग से जांच कराने का कोई औचित्य नहीं बनता।
मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष
1. धारा 299 BNS (धार्मिक भावनाओं का अपमान) के कड़े मापदंड:
यह आदेश दोहराता है कि किसी भी भाषण या तुलनात्मक टिप्पणी को केवल इस आधार पर आपराधिक नहीं माना जा सकता कि किसी व्यक्ति की भावनाएं आहत हुई हैं। जब तक भाषण में धार्मिक मान्यताओं को नीचा दिखाने या द्वेष फैलाने का दुर्भावनापूर्ण इरादा (Mens Rea) साबित न हो, BNS की धारा 299 लागू नहीं होती।
2. BNSS की धारा 175(3) के तहत न्यायिक सतर्कता:
अदालत ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया में बदलाव के बाद (BNSS 2023), अदालतों को FIR का आदेश देने से पहले यह जांचना होगा कि क्या मामले में पुलिस द्वारा नए साक्ष्य एकत्र करने की वास्तविक जरूरत है या साक्ष्य पहले से उपलब्ध हैं।
नई दिल्ली: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 175(3) (मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश—पूर्ववर्ती CrPC धारा 156(3)) व धारा 223 (मजिस्ट्रेट द्वारा परिवाद की व्यक्तिगत जांच व साक्ष्य दर्ज करना—पूर्ववर्ती CrPC धारा 200), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विमर्शित और दुर्भावनापूर्ण कृत्य—पूर्ववर्ती IPC धारा 295A), तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [AIR 1957 SC 620] के विधिक सिद्धांतों के तहत दिल्ली की एक विशेष अदालत ने मुख्यमंत्री के विरुद्ध आपराधिक एफआईआर की मांग को खारिज कर दिया है।
राउज एवेन्यू कोर्ट के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्वनी पंवार (Additional Chief Judicial Magistrate Ashwani Panwar) ने दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी (DPCC) के आरटीआई विभाग के अध्यक्ष राम निवास शर्मा (Ram Niwas Sharma) द्वारा दायर अर्जी को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता (CM Rekha Gupta) द्वारा कश्मीरी गेट आईएसबीटी पर आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में अधिकारियों की कार्यप्रणाली की तुलना भगवान हनुमान से करने पर उनके विरुद्ध धार्मिक भावनाएं भड़काने की धारा में पुलिस एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए।
मजिस्ट्रेट अदालत ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि मुख्यमंत्री के भाषण का समग्र अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनका वक्तव्य अधिकारियों के प्रदर्शन और कार्यप्रणाली की समीक्षा पर केंद्रित था। इसमें प्रथम दृष्टया धर्म या धार्मिक मान्यताओं को अपमानित करने का कोई विमर्शित या दुर्भावनापूर्ण इरादा (Deliberate and malicious intention) प्रकट नहीं होता, जो BNS की धारा 299 का अनिवार्य वैधानिक घटक है। हालांकि, अदालत ने पुलिस जांच से इनकार करते हुए शिकायतकर्ता को BNSS की धारा 223 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने साक्ष्य और गवाह पेश कर निजी परिवाद (Complaint Case) के रूप में मामला आगे बढ़ाने की छूट दी है और इसके लिए 19 नवंबर 2026 की तारीख तय की है।
अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘भाषण अधिकारियों के प्रदर्शन पर केंद्रित था, BNS 299 का दुर्भावनापूर्ण आशय नदारद’:
एसीजेएम अश्वनी पंवार ने मुख्यमंत्री के भाषण और पुलिस द्वारा पेश वीडियो ट्रांसक्रिप्ट का परीक्षण करने के उपरांत आदेश में दर्ज किया: “दिल्ली सरकार के अधिकारियों और भगवान हनुमान के बीच की गई तुलना ‘अधिकारियों और उनके प्रदर्शन के प्रति लक्षित प्रतीत होती है’ (Appeared to be directed towards the officials and their performance)। इस चरण पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि पत्रावली पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने के किसी विमर्शित और दुर्भावनापूर्ण इरादे (Deliberate and malicious intention to insult religion) को प्रकट नहीं करती है, जो कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 का एक अनिवार्य घटक है।”
2. ‘संज्ञेय अपराध का आरोप मात्र FIR का आधार नहीं; साक्ष्य संकलन की आवश्यकता जरूरी’:
- अदालत ने BNSS की धारा 175(3) (CrPC 156(3)) के न्यायिक मानकों को स्पष्ट करते हुए कहा:“केवल इसलिए प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता क्योंकि शिकायतकर्ता ने संज्ञेय अपराध का आरोप लगाया है।भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत शक्तियों के प्रयोग का परीक्षण केवल यह नहीं है कि कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या मामले में साक्ष्य संकलन (Collection of Evidence) हेतु पुलिस जांच की वास्तविक आवश्यकता है अथवा नहीं।”
- अदालत ने रेखांकित किया कि भाषण का पूरा मूल वीडियो, उसकी प्रतिलिपि (Transcript) और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रमाणपत्र (Section 63 BSA / 65B IEA) दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय से पहले ही प्राप्त कर रिकॉर्ड पर रखा जा चुका है; अतः पुलिस द्वारा किसी नए साक्ष्य संकलन की आवश्यकता शेष नहीं है।
3. निजी परिवाद (Section 223 BNSS) के तहत आगे बढ़ने की छूट:
- मजिस्ट्रेट ने पुलिस जांच की अर्जी खारिज करते हुए शिकायतकर्ता को विधिक विकल्प दिया कि वह BNSS की धारा 223 के तहत अदालत के समक्ष अपने और अपने गवाहों के बयान दर्ज कराए। इसके लिए मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 नियत की गई है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (सितंबर 2025 – नवंबर 2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| फोरम / न्यायालय | राउज एवेन्यू जिला न्यायालय, नई दिल्ली (विशेष एमपी/एमएलए अदालत) |
| पीठासीन न्यायिक अधिकारी | अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्वनी पंवार (Ashwani Panwar) |
| आदेश की तिथि | 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार) |
| केस संदर्भ | राम निवास शर्मा बनाम रेखा गुप्ता [Criminal Application under Section 175(3) BNSS] |
| शिकायतकर्ता | राम निवास शर्मा (Ram Niwas Sharma) — दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी (DPCC) के आरटीआई विभाग के चेयरमैन एवं ऑल इंडिया सीमांचल जन विकास परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष। |
| आरोपी पक्ष | रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) — दिल्ली की मुख्यमंत्री। |
| घटना का संदर्भ व स्थान | 23 सितंबर 2025, कश्मीरी गेट आईएसबीटी, दिल्ली — दिल्ली और बड़ौत (उत्तर प्रदेश) के बीच दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की नई बस सेवाओं का औपचारिक उद्घाटन समारोह। |
| शिकायतकर्ता के मुख्य आक्षेप | शिकायतकर्ता का आरोप था कि मुख्यमंत्री ने दिल्ली सरकार के अधिकारियों के कार्यों की समीक्षा करते हुए जानबूझकर व्यंग्यात्मक और तिरस्कारपूर्ण टिप्पणियां कीं तथा भगवान हनुमान के संदर्भ का उपयोग कर उनका उपहास उड़ाया, जिससे करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। |
| पुलिस की कार्रवाई रिपोर्ट (ATR) | दिल्ली पुलिस ने अदालत में दाखिल अपनी ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ में शिकायत को “सुनियोजित राजनीतिक प्रतिशोध” (Orchestrated political vendetta) करार दिया। पुलिस ने बताया कि शिकायतकर्ता ने भाषण के केवल चुनिंदा अंशों को पेश किया, जबकि पूरे भाषण में मुख्यमंत्री ने भगवान हनुमान के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा भी व्यक्त की थी। |
| अदालत का अंतिम आदेश | BNSS की धारा 175(3) के तहत पुलिस प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की अर्जी खारिज (Dismissed); शिकायतकर्ता को धारा 223 BNSS के तहत निजी साक्ष्य पेश करने की अनुमति, अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘BNS धारा 299 (IPC 295A) का दायरा और रामजी लाल मोदी सिद्धांत’
- ‘रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ [AIR 1957 SC 620] का संवैधानिक पैमाना:
- भारत के उच्चतम न्यायालय की 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि तत्कालीन आईपीसी की धारा 295A (वर्तमान BNS की धारा 299) हर उस कृत्य को दंडित नहीं करती जो किसी व्यक्ति की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाए।
- यह धारा केवल उन कृत्यों को दंडित करती है जो “विमर्शित और दुर्भावनापूर्ण इरादे” (Deliberate and Malicious Intention) से धर्म या धार्मिक मान्यताओं को अपमानित करने के लिए किए गए हों। अनजाने में, भाषण के प्रवाह में या प्रशासनिक कार्यकुशलता को समझाने हेतु दिए गए पौराणिक दृष्टांत या रूपक (Metaphorical comparisons) इसके दायरे में नहीं आते।
- राजनैतिक भाषण बनाम धार्मिक उपहास:
- भारतीय राजनीति और प्रशासनिक संवाद में लोक सेवकों को उनकी ‘असीमित शक्तियों’ की याद दिलाने हेतु अक्सर भगवान हनुमान (जिन्हें जामवंत ने उनकी भूली हुई शक्ति याद दिलाई थी) का रूपक इस्तेमाल किया जाता रहा है।
- अदालत ने पाया कि मुख्यमंत्री का वक्तव्य अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारी और क्षमता का अहसास कराने के लिए था। भाषण के किसी भी हिस्से से हिंदू धर्म या भगवान हनुमान के प्रति घृणा या तिरस्कार फैलाने की मंशा सिद्ध नहीं होती।
- BNSS धारा 175(3) (CrPC 156(3)) पर न्यायिक संयम (Priyanka Srivastava Principles):
- सर्वोच्च न्यायालय ने प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [(2015) 6 SCC 287] में यह सुस्थापित किया था कि 156(3) (अब BNSS 175(3)) का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने या प्रतिशोध लेने के लिए यांत्रिक रूप से नहीं किया जा सकता।
- यदि संपूर्ण साक्ष्य (भाषण का वीडियो और ट्रांसक्रिप्ट) पहले से उपलब्ध हैं और किसी वैज्ञानिक फोरेंसिक जांच, रिकवरी या अभियुक्त की कस्टडी की आवश्यकता नहीं है, तो मजिस्ट्रेट को सीधे पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं देना चाहिए।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: राउज एवेन्यू जिला न्यायालय, नई दिल्ली (विशेष अदालत — एमपी/एमएलए मामले)
- केस संदर्भ: राम निवास शर्मा बनाम रेखा गुप्ता [Criminal Complaint under Section 175(3) BNSS]
- पीठासीन न्यायिक अधिकारी: अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्वनी पंवार (Justice Ashwani Panwar)
- आदेश की तिथि: 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
- अगली सुनवाई की तिथि (साक्ष्य परीक्षण): 19 नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: पुलिस को प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का निर्देश देने की मांग खारिज; शिकायतकर्ता को BNSS की धारा 223 के अंतर्गत निजी परिवाद के रूप में साक्ष्य पेश करने की अनुमति।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 299 — किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विमर्शित और दुर्भावनापूर्ण कृत्य (पूर्ववर्ती IPC धारा 295A)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- धारा 175(3) — संज्ञेय मामलों में अन्वेषण का आदेश देने की मजिस्ट्रेट की शक्ति (पूर्ववर्ती CrPC धारा 156(3))
- धारा 223 — परिवादी और उसके साक्षियों की परीक्षा (पूर्ववर्ती CrPC धारा 200)
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) — धारा 63 (इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की ग्राह्यता एवं प्रमाणन)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- धार्मिक भावनाओं का संरक्षण, रूपक का उपयोग और पुलिस अन्वेषण का विधिक मानक: ‘बीएनएस की धारा 299 के तहत अपराध सिद्ध करने हेतु यह अपरिहार्य है कि अभियुक्त का प्राथमिक आशय विमर्शित और दुर्भावनापूर्ण रूप से धार्मिक आस्थाओं का अपमान करना रहा हो; किसी आधिकारिक बैठक या सार्वजनिक समारोह में प्रशासनिक अधिकारियों के कामकाज और क्षमताओं को इंगित करने हेतु पौराणिक चरित्रों का रूपक के तौर पर इस्तेमाल करना प्रथम दृष्टया धार्मिक भावनाएं भड़काने का अपराध नहीं बनाता; संज्ञेय अपराध के मात्र आरोप पर अदालतें पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश जारी नहीं करतीं, जब तक कि साक्ष्य संकलन हेतु गहन पुलिस अन्वेषण की अपरिहार्यता न हो; तथा जहाँ संपूर्ण वीडियो व इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पहले से उपलब्ध हों, वहाँ मामले को शिकायतकर्ता द्वारा निजी साक्ष्य प्रस्तुत करने हेतु बीएनएसएस की धारा 223 के तहत ही सुना जाना न्यायसंगत विधिक प्रक्रिया है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: अदालत के इस निर्णय से दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को बड़ी विधिक राहत मिली है और उनके खिलाफ पुलिस प्राथमिकी दर्ज होने का खतरा टल गया है; अब शिकायतकर्ता राम निवास शर्मा को 19 नवंबर 2026 को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपने बयान दर्ज कराने होंगे और यह साबित करना होगा कि क्या इस मामले में मुख्यमंत्री को बतौर आरोपी समन जारी करने का कोई पर्याप्त विधिक आधार बनता भी है या नहीं।
CM Rekha Gupta: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | राउज एवेन्यू कोर्ट्स, नई दिल्ली (Rouse Avenue Courts, New Delhi) |
| न्यायाधीश | अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्वनी पंवार |
| केस / पक्षकार | राम निवास शर्मा बनाम रेखा गुप्ता (Ram Niwas Sharma v. Rekha Gupta) |
| शिकायतकर्ता का परिचय | राम निवास शर्मा (अध्यक्ष, RTI विभाग, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी) |
| संबंधित कानून/प्रावधान | BNS धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को आहत करने का अपराध) एवं BNSS धारा 175(3) (FIR का अदालती निर्देश) / धारा 223 (शिकायतकर्ता की परीक्षा) |
| विवादास्पद भाषण | 23 सितंबर 2025 को कश्मीरी गेट ISBT पर बस सेवा उद्घाटन के दौरान अधिकारियों की कार्यप्रणाली की तुलना भगवान हनुमान के संदर्भ में करना। |
| अदालत का अंतिम आदेश | FIR की अर्जी खारिज: पुलिस जांच की आवश्यकता से इनकार; 19 नवंबर 2026 को निजी शिकायत के रूप में साक्ष्य पेश करने की अनुमति। |

