मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- मामले का घटनाक्रम:वादी-याचिकाकर्ताओं ने तीन निजी प्रतिवादियों और नोएडा प्राधिकरण (प्रतिवादी संख्या 4) के खिलाफ घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा (Declaration & Permanent Injunction) के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया था। मुंसरीम (अदालत के प्रशासनिक अधिकारी) ने रिपोर्ट दी कि नोएडा ‘राज्य’ है, इसलिए 2 महीने का धारा 80 CPC नोटिस आवश्यक है। सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गौतम बुद्ध नगर ने वादियों की आपत्तियों को खारिज कर मुकदमे को पंजीकृत करने से मना कर दिया था।
- याचिकाकर्ता का तर्क बनाम नोएडा का रुख:वादी के वकील ने तर्क दिया कि नोएडा U.P. Industrial Area Development Act, 1976 के तहत निर्मित एक वैधानिक निकाय (Statutory Authority) है। यह राज्य सरकार का उपक्रम हो सकता है, लेकिन यह स्वयं “सरकार” नहीं है। वहीं, नोएडा के वकील ने दलील दी कि अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य का अंग’ होने के कारण धारा 80 का नोटिस mandatory है।
- अदालती विश्लेषण व नज़ीरों का अनुप्रयोग:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नोएडा केवल राज्य सरकार के पर्यवेक्षी नियंत्रण (Supervisory Control) में काम करता है, लेकिन वह ‘सरकार’ की वैधानिक परिभाषा पर खरा नहीं उतरता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया:
- U.P.S.E.B. v. Sant Kabir Sahakari Katai Mills Ltd.: जहाँ UP State Electricity Board को अनुच्छेद 12 के तहत राज्य माना गया, लेकिन धारा 80 CPC के तहत ‘राज्य सरकार’ नहीं माना गया।
- City Municipal Council, Bhalki v. Gurappa: जहाँ नगर निगम/नगर पालिका के अधिकारियों को धारा 80 CPC के दायरे से बाहर रखा गया था।
मुख्य विधिक व दीवानी प्रक्रिया न्यायशास्त्र निष्कर्ष
1. अनुच्छेद 12 ‘राज्य’ बनाम धारा 80 CPC ‘सरकार’ का विधिक अंतर:
यह निर्णय स्थापित करता है कि संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ‘राज्य’ (State) की परिभाषा बहुत विस्तृत है (जिसमें वैधानिक प्राधिकरण, निगम और बोर्ड शामिल हैं)। हालांकि, CPC की धारा 80(1) का दायरा अत्यंत सीमित है—यह केवल प्रत्यक्ष ‘राज्य सरकार’ या ‘केंद्र सरकार’ पर लागू होती है। दोनों का एक-दूसरे से घालमेल नहीं किया जा सकता।
2. वैधानिक निकायों के खिलाफ दीवानी मुकदमों में प्रक्रियात्मक सरलीकरण:
विकास प्राधिकरणों (जैसे NOIDA, LDA, DDA), बिजली बोर्डों या नगर निगमों के खिलाफ मुकदमे दायर करते समय वादियों को धारा 80 CPC का 2 महीने का पूर्व नोटिस देने की आवश्यकता नहीं है, जिससे आम नागरिकों को त्वरित न्यायिक राहत (विशेषकर स्टे या इंजंक्शन) प्राप्त करने का मार्ग सुगम होता है।
प्रयागराज: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC, 1908) की धारा 80(1) (सरकार या लोक अधिकारी के विरुद्ध वाद दायर करने से पूर्व दो माह का अनिवार्य वैधानिक नोटिस), भारत का संविधान के अनुच्छेद 12 (मूल अधिकारों के प्रवर्तन हेतु ‘राज्य’ की व्यापक परिभाषा) बनाम अनुच्छेद 300 (संघ और राज्यों के नाम से वाद व कार्यवाहियां), उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 (UP Industrial Area Development Act, 1976) के तहत गठित सांविधिक विकास प्राधिकरणों की स्वायत्त विधिक स्थिति, तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय यू.पी. स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम संत कबीर सहकारी कताई मिल्स लिमिटेड [(2005)] के सुस्थापित विधिक सिद्धांतों के तहत इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक व्यवस्था दी है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल (Justice Rohit Ranjan Agarwal) की एकल पीठ ने गौतमबुद्ध नगर के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) द्वारा पारित 18 अगस्त 2026 के आदेश को पूरी तरह निरस्त/रद्द (Set Aside) करते हुए वादी-याचिकाकर्ताओं की रिट याचिका को स्वीकार (Allowed) कर लिया। निचली अदालत ने मुंसरीम (Munsrim) की पूरक रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए वाद को केवल इसलिए दर्ज करने से इनकार कर दिया था क्योंकि वादी ने न्यू ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण (NOIDA) को प्रतिवादी संख्या 4 के रूप में पक्षकार बनाने से पहले CPC की धारा 80(1) के तहत दो महीने का अग्रिम नोटिस नहीं दिया था।
उच्च न्यायालय ने दो-टूक व्यवस्था दी कि यद्यपि नोएडा (NOIDA) संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों के हनन के संबंध में “राज्य” (State) अथवा राज्य का एक अभिकरण (Instrumentality of the State) हो सकता है, किंतु वह सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के अर्थों में न तो ‘राज्य सरकार’ (State Government) है और न ही ‘केंद्र सरकार’ (Central Government)। अतः उसके विरुद्ध दीवानी वाद दायर करने से पूर्व धारा 80(1) के तहत 60 दिनों का नोटिस देना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट को मूल वाद को तत्काल पंजीकृत करने और अंतरिम निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) अर्जी को प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के एक माह के भीतर निस्तारित करने का निर्देश दिया।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘अनुच्छेद 12 के तहत राज्य होना और धारा 80 CPC के तहत सरकार होना दो भिन्न विधिक संकल्पनाएं हैं’:
न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने सांविधिक निगमों और संप्रभु सरकार के विधिक भेद को रेखांकित करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट कहा: “यह स्पष्ट है कि यद्यपि नोएडा (NOIDA) भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में आएगा, किंतु यह न तो राज्य सरकार (State Government) है और न ही केंद्र सरकार (Central Government)।
नोएडा के लिए सीपीसी की धारा 80(1) की अनिवार्य आवश्यकता की अपेक्षा नहीं की जा सकती, और वादी-याचिकाकर्ताओं ने वाद संख्या 306/2006 को संस्थित करने के लिए विधिसम्मत कदम उठाया था; तथा अदालत द्वारा मुंसरीम की उस पूरक रिपोर्ट को स्वीकार करना पूरी तरह गलत था जिसके आधार पर दीवानी वाद को दर्ज करने से इनकार किया गया था।”
2. ‘1976 के अधिनियम से सृजित प्राधिकरण पर केवल सरकार का पर्यवेक्षी नियंत्रण; यह स्वयं सरकार नहीं’:
- अदालत ने उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 की विधिक संरचना का विश्लेषण करते हुए दर्ज किया:
- नोएडा की स्थापना विधायिका द्वारा 1976 में गौतमबुद्ध नगर क्षेत्र के सुनियोजित औद्योगिक विकास के लिए की गई थी।
- राज्य सरकार का इस प्राधिकरण पर केवल एक पर्यवेक्षी नियंत्रण (Supervisory Control) होता है।
- एक सांविधिक निकाय (Statutory Body Corporate) जिसका अपना पृथक विधिक अस्तित्व और ‘सार्वजनिक मुहर’ (Common Seal) हो, वह ‘सरकार’ (Government) की परिभाषा में नहीं आता।
3. सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की बाध्यकारी नज़ीरें:
- अदालत ने निम्नलिखित निर्णयों पर भरोसा जताया:
- U.P.S.E.B. बनाम संत कबीर सहकारी कताई मिल्स लिमिटेड: सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड भले ही अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ हो, किंतु वह सीपीसी के तहत ‘राज्य सरकार’ नहीं है।
- सिटी म्यूनिसिपल काउंसिल, भाल्की बनाम गुरप्पा (मृतक, विधिक वारिसों के माध्यम से): सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि किसी वैधानिक नगर निगम या नगरपालिका के अधिकारियों पर सीपीसी की धारा 80 लागू नहीं होती।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय की समन्वय पीठ तथा बॉम्बे उच्च न्यायालय ने भी सांविधिक निगमों के संबंध में इसी समान विधिक दृष्टिकोण को दोहराया है।
4. निचली अदालत को तत्काल पंजीकरण व 1 माह में व्यादेश तय करने का आदेश:
- अदालत ने 18 अगस्त 2026 के आक्षेपित आदेश को अवैध ठहराते हुए निरस्त किया और निचली अदालत को निर्देश दिया:
- वाद संख्या 306/2006 को तत्काल नियमित दीवानी वाद के रूप में पंजीकृत (Immediately Register the Suit) किया जाए।
- आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के एक महीने के भीतर (Within One Month) वादी द्वारा दायर अस्थायी निषेधाज्ञा (Order 39 Rules 1 & 2 CPC) के आवेदन पर सुनवाई कर गुण-दोष के आधार पर निर्णय दिया जाए।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज.
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2006–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| फोरम / न्यायालय | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (संवैधानिक पर्यवेक्षी रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 227) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल (Justice Rohit Ranjan Agarwal) (एकल पीठ) |
| निर्णय की तिथि | नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | वादी-याचिकाकर्ता बनाम प्रतिवादी संख्या 1 से 3 एवं न्यू ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण (नोएडा) [Civil Miscellaneous Writ Petition / 2026] |
| मूल दीवानी वाद | मूल वाद संख्या 306 / 2006 — घोषणा (Declaration) एवं स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) हेतु। |
| पक्षकारों की स्थिति | वादी-याचिकाकर्तागण; प्रतिवादी संख्या 1 से 3 (निजी पक्षकार); प्रतिवादी संख्या 4: न्यू ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण (NOIDA)। |
| मूल विचारण अदालत | सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गौतमबुद्ध नगर। |
| आक्षेपित आदेश | सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गौतमबुद्ध नगर द्वारा 18 अगस्त 2026 को पारित आदेश, जिसके तहत वाद को रजिस्टर में दर्ज करने से इनकार कर दिया गया था। |
| विवाद का प्रक्रियात्मक बिंदु | विचारण अदालत के मुंसरीम (Munsrim – कोर्ट का क्लर्क/जांच अधिकारी) ने एक सप्लीमेंट्री रिपोर्ट लगाई कि नोएडा ‘राज्य’ है, इसलिए सीपीसी की धारा 80(1) के तहत वाद दायर करने से पूर्व 2 महीने का वैधानिक नोटिस दिया जाना चाहिए था; नोटिस के अभाव में वाद अपोषणीय है। वादी ने आपत्ति दर्ज कराई कि नोएडा केवल एक सांविधिक निकाय है, न कि सरकार। अदालत ने वादी की आपत्ति ठुकरा दी थी। |
| याचिकाकर्ताओं के विधिक तर्क | नोएडा उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 के तहत गठित एक सांविधिक निगमित निकाय (Body Corporate) है; यह न तो राज्य सरकार है और न केंद्र सरकार; धारा 80 सीपीसी केवल संप्रभु सरकारों और लोक अधिकारियों पर लागू होती है, स्वायत्त प्राधिकरणों पर नहीं। |
| नोएडा (प्रतिवादी) का विधिक बचाव | नोएडा संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत ‘राज्य’ की परिभाषा में आता है और सार्वजनिक कार्यों का संपादन करता है; अतः उसे सरकार के समान संरक्षण प्राप्त होना चाहिए और 60 दिनों का नोटिस अनिवार्य है। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | रिट याचिका स्वीकृत (Allowed); 18 अगस्त 2026 का आदेश निरस्त; सिविल जज को वाद संख्या 306/2006 को तुरंत दर्ज कर 1 माह में अस्थायी व्यादेश अर्जी का निस्तारण करने का आदेश। |
विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: ‘धारा 80 CPC बनाम अनुच्छेद 12 – वैधानिक भेद’
- सीपीसी की धारा 80(1) का सख्त विधिक अधिदेश:
- धारा 80(1) सीपीसी यह अनिवार्य बनाती है कि:“केंद्र सरकार या राज्य सरकार के विरुद्ध, अथवा किसी लोक अधिकारी के विरुद्ध उसके पदीय कर्तव्य के संदर्भ में किए गए किसी कार्य के संबंध में कोई वाद तब तक संस्थित नहीं किया जाएगा, जब तक कि दो माह का लिखित नोटिस तामील न कर दिया गया हो…”
- धारा 80 का विधायी उद्देश्य सरकार को अनावश्यक मुकदमों से बचाना और विवाद की जांच कर अदालत के बाहर समाधान (Out of Court Settlement) का अवसर देना है।
- चूँकि यह धारा एक नागरिक के अदालत जाने के सामान्य विधिक अधिकार को 60 दिनों के लिए रोकती है, इसलिए न्यायशास्त्र का नियम है कि धारा 80 की व्याख्या अत्यंत संकीर्ण और शाब्दिक (Strict and Literal Interpretation) की जानी चाहिए। इसमें ‘सरकार’ शब्द का विस्तार सांविधिक प्राधिकरणों, निगमों या सरकारी कंपनियों तक नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 12 बनाम धारा 80 सीपीसी का अंतर:
- संविधान के अनुच्छेद 12 में ‘राज्य’ की परिभाषा केवल संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के प्रयोजनों के लिए गढ़ी गई है, ताकि राज्य की एजेंसियां रिट अधिकारिता (अनुच्छेद 226/32) की जवाबदेही से न बच सकें (अजय हसिया बनाम खालिद मुजीब [(1981) 1 SCC 722]).
- किंतु एक दीवानी मुकदमे में, किसी निकाय का अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य का अंग’ होना उसे सीपीसी की धारा 80 के तहत ‘सरकार’ का दर्जा नहीं देता।
- उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 की धारा 3 के तहत नोएडा एक ‘निगमित निकाय’ (Body Corporate) है जिसका शाश्वत उत्तराधिकार (Perpetual Succession) है और वह अपने नाम से मुकदमा कर सकता है तथा उस पर मुकदमा किया जा सकता है।
- मुंसरीम की रिपोर्ट और न्यायिक विवेक:
- मुंसरीम अदालत का एक प्रशासनिक अधिकारी होता है जिसका काम केवल कोर्ट फीस और औपचारिक प्रक्रियात्मक जांच करना है।
- सिविल जज ने मुंसरीम की कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण रिपोर्ट पर आंख मूंदकर भरोसा किया और वादी की वैध आपत्तियों को दरकिनार कर वाद दर्ज करने से इनकार कर दिया, जो क्षेत्राधिकार का प्रयोग न करने (Failure to Exercise Jurisdiction) का गंभीर दोष था।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (संवैधानिक पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 227)
- केस संदर्भ: वादी-याचिकाकर्ता बनाम प्रतिवादी संख्या 1 से 3 एवं नोएडा [Civil Misc. Writ Petition / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल (Justice Rohit Ranjan Agarwal) (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: रिट याचिका स्वीकृत; सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गौतमबुद्ध नगर का 18 अगस्त 2026 का आदेश निरस्त; वाद संख्या 306/2006 को तत्काल पंजीकृत करने और अंतरिम व्यादेश (Order 39 CPC) का निस्तारण 1 माह में करने का आदेश।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (वादियों) की ओर से: याचिकाकर्ताओं के विद्वान अधिवक्ता।
- प्रतिवादी संख्या 4 (नोएडा प्राधिकरण) की ओर से: नोएडा के स्थायी अधिवक्ता (Standing Counsel for NOIDA)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC, 1908):
- धारा 80(1) — सरकार या लोक अधिकारी के विरुद्ध नोटिस (दो माह की अनिवार्यता)
- आदेश 39 नियम 1 व 2 — अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 12 — ‘राज्य’ की परिभाषा (भाग III के प्रयोजनार्थ)
- अनुच्छेद 227 — उच्च न्यायालय की अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति
- उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 (UP Act No. 6 of 1976):
- धारा 3 — विकास प्राधिकरण का गठन एवं निगमित निकाय का स्वरूप
- धारा 12/17 — सरकार का पर्यवेक्षी नियंत्रण
- सर्वोच्च न्यायालय नज़ीरें:
- यू.पी. स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम संत कबीर सहकारी कताई मिल्स लिमिटेड [(2005)]
- सिटी म्यूनिसिपल काउंसिल, भाल्की बनाम गुरप्पा (मृतक, विधिक वारिसों के माध्यम से)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC, 1908):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सांविधिक विकास प्राधिकरण, अनुच्छेद 12 ‘राज्य’ बनाम CPC धारा 80 ‘सरकार’ का विधिक मानक: ‘संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों के संरक्षण हेतु किसी सांविधिक विकास प्राधिकरण (जैसे NOIDA) का ‘राज्य का अंग’ (Instrumentality of State) होना उसे सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 80 के अर्थों में ‘राज्य सरकार’ या ‘केंद्र सरकार’ का दर्जा प्रदान नहीं करता; सीपीसी की धारा 80(1) एक प्रतिबंधात्मक प्रक्रियात्मक उपबंध है जिसकी संकीर्ण और शाब्दिक व्याख्या की जानी चाहिए; यह केवल संप्रभु सरकारों और लोक अधिकारियों के विरुद्ध लागू होती है, न कि विधानमंडल द्वारा सृजित स्वायत्त निगमित निकायों (Statutory Bodies Corporate) पर; उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 के तहत गठित नोएडा प्राधिकरण पर राज्य सरकार का केवल पर्यवेक्षी नियंत्रण होता है और वह स्वयं ‘सरकार’ नहीं है; अतः नोएडा के विरुद्ध दीवानी वाद दायर करने से पूर्व धारा 80(1) के तहत दो माह का पूर्व नोटिस देना कतई अनिवार्य नहीं है; तथा अधीनस्थ अदालतों द्वारा मुंसरीम की त्रुटिपूर्ण आख्या के आधार पर ऐसे वादों को दर्ज करने से इनकार करना न्याय के स्थापित सिद्धांतों और क्षेत्राधिकार का घोर उल्लंघन है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गौतमबुद्ध नगर को वाद संख्या 306/2006 को अपनी नियमित वाद पंजिका में तुरंत दर्ज करना होगा; वादी की संपत्ति पर किसी तीसरे पक्ष के अतिक्रमण या निर्माण को रोकने संबंधी अस्थायी निषेधाज्ञा (Stay) की अर्जी पर 30 दिनों के भीतर सुनवाई कर आदेश पारित करना होगा। यह फैसला नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना एक्सप्रेसवे प्राधिकरण (YEIDA) और राज्य के अन्य विकास प्राधिकरणों के विरुद्ध मुकदमा करने वाले सभी नागरिकों और आवंटियों के लिए एक बहुत बड़ी विधिक राहत है, जिन्हें अब अदालत का दरवाजा खटखटाने से पहले 2 महीने के नोटिस का अनावश्यक इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
Noida Case: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल (Justice Rohit Ranjan Agarwal) |
| केस / प्रतिवादी | वादी-याचिकाकर्ता बनाम नोएडा प्राधिकरण व अन्य (NOIDA – Defendant No. 4) |
| संबंधित कानून/प्रावधान | CPC की धारा 80(1) (सरकार के खिलाफ मुकदमे का नोटिस), संविधान का अनुच्छेद 12 (राज्य की परिभाषा) एवं U.P. Industrial Area Development Act, 1976 |
| मूल विवाद | गौतम बुद्ध नगर की ट्रायल कोर्ट द्वारा नोएडा को ‘राज्य’ मानकर धारा 80 CPC के तहत 2 महीने का अग्रिम नोटिस न देने पर दीवानी मुकदमा (Suit No. 306 of 2006) दर्ज करने से इनकार करना। |
| अदालत का अंतिम आदेश | 18.8.2026 का आदेश रद्द: रिट याचिका स्वीकार; निचली अदालत को तुरंत मुकदमा पंजीकृत करने और 1 माह के भीतर अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) आवेदन का निपटारा करने का निर्देश। |

