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मामले की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
- अदालत कक्ष में हमला:7 नवंबर 2026 को झरीगाँव JMFC अदालत की कार्यवाही चल रही थी। आरोपी महिला सनमति माझी अपने बैग में लोहे की रॉड छिपाकर अदालत कक्ष में दाखिल हुई। उसने अचानक सहायक लोक अभियोजक (APP) प्रदीप पटनायक पर हमला कर दिया और उनके सिर पर लोहे की रॉड से वार किया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए।
- मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी का हस्तक्षेप:महिला मजिस्ट्रेट सुश्री स्मिता लाकड़ा ने एपीपी को बचाने और हमलावर महिला को रोकने का प्रयास किया, जिस दौरान महिला ने उन पर भी हमला कर दिया, जिससे मजिस्ट्रेट को मामूली चोटें आईं। शोर सुनकर बाहर आए कोर्ट सब-इंस्पेक्टर (CSI) ने महिला को शांत करने और पकड़ने की कोशिश की, तो हमलावर ने उनके सिर पर भी रॉड से प्रहार कर दिया, जिससे वे भी रक्तरंजित हो गए।
- सुरक्षा और जांच:अदालत में मौजूद अन्य कर्मियों और वकीलों ने महिला को काबू में कर पुलिस के हवाले किया। तीनों घायलों को तुरंत पास के अस्पताल ले जाया गया, जहाँ प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई। पुलिस हमले के कारणों और आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच कर रही है।
मुख्य विधिक व अदालत सुरक्षा न्यायशास्त्र निष्कर्ष
1. अदालत परिसरों की सुरक्षा (Court Infrastructure & Security Standards):
यह घटना देश के दूरदराज और जिला/तालुका स्तर के अदालतों में सुरक्षा व्यवस्था (Metal Detectors & Frisking) की कमी को उजागर करती है। सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार-बार अदालती परिसरों में न्यायाधीशों, वकीलों और वादियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था का निर्देश दिया है।
2. न्यायिक अधिकारियों पर हमलों के खिलाफ दंडात्मक प्रावधान:
न्यायिक कार्यवाही के दौरान पीठ पर आसीन न्यायाधीश या लोक सेवकों पर हमला करना BNS की धारा 132 (लोक सेवक पर हमला) और धारा 109 (हत्या का प्रयास) के तहत गैर-जमानती और गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
नबरंगपुर/कटक: भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 109 (हत्या का प्रयास—पूर्ववर्ती IPC धारा 307), धारा 132 (लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने हेतु हमला/आपराधिक बल—पूर्ववर्ती IPC धारा 353), धारा 121(1)/121(2) (लोक सेवक को कर्तव्य के दौरान स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना—पूर्ववर्ती IPC धारा 332/333), धारा 221 (न्यायिक कार्यवाही में बैठे लोक सेवक का जानबूझकर अपमान या कार्य में बाधा—पूर्ववर्ती IPC धारा 228), अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—न्याय प्रशासन में प्रत्यक्ष भौतिक हस्तक्षेप), तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों—प्रद्युम्न बिष्ट बनाम भारत संघ [(2021) SCC OnLine SC 1238] (देश की सभी जिला व अधीनस्थ अदालतों में त्रि-स्तरीय सुरक्षा घेरा, मेटल डिटेक्टर, सीसीटीवी और सशस्त्र सुरक्षा बल की अनिवार्यता) के विधिक परिप्रेक्ष्य में ओडिशा न्यायपालिका से एक स्तब्धकारी घटना सामने आई है।
ओडिशा के नबरंगपुर न्यायिक प्रभाग (Nabarangpur Judgeship) के अंतर्गत आने वाले प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC), झरीगांव (Jharigaon) के न्यायालय परिसर में 7 नवंबर 2026 (शनिवार) को अदालती कार्यवाही चलने के दौरान एक महिला वादकारी द्वारा लोहे की रॉड से महिला मजिस्ट्रेट, सहायक लोक अभियोजक (APP) और कोर्ट सब-इंस्पेक्टर (CSI) पर जानलेवा हमला कर दिया गया।
घटना उस समय घटी जब अदालत कक्ष में नियमित न्यायिक कार्य चल रहा था। आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाली सनमती माझी (Sanamati Majhi) नामक महिला एक थैले में लोहे की भारी रॉड छिपाकर कोर्ट रूम में दाखिल हुई। उसने बिना किसी पूर्व चेतावनी के सबसे पहले एपीपी प्रदीप पटनायक (APP Pradeep Patnaik) के सिर पर रॉड से वार कर उन्हें लहुलूहान कर दिया। बीच-बचाव करने उतरीं पीठासीन महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट स्मिता लाकड़ा (Ms. Smita Lakra, JMFC) पर भी हमला किया गया जिससे वे घायल हो गईं, जबकि शोर सुनकर पहुंचे कोर्ट सब-इंस्पेक्टर (CSI) के सिर पर भी रॉड मारकर गंभीर चोट पहुंचाई गई। तीनों घायलों को तुरंत स्थानीय अस्पताल पहुंचाया गया जहां प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई। इस घटना ने एक बार फिर अधीनस्थ अदालतों में बुनियादी सुरक्षा तंत्र और पुलिस जांच की पोल खोलकर रख दी है।
घटना का तथ्यात्मक विवरण एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (7 नवंबर 2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| घटना स्थल / न्यायालय | प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC), झरीगांव न्यायालय परिसर, नबरंगपुर जिला, ओडिशा। |
| घटना की तिथि व समय | 7 नवंबर 2026 (शनिवार) — अदालती कार्यवाही (Court in Session) के दौरान। |
| आरोपी महिला | सनमती माझी (Sanamati Majhi) — स्थानीय आदिवासी महिला एवं वादकारी (Woman Litigant)। |
| पीड़ित न्यायिक अधिकारी | सुश्री स्मिता लाकड़ा (Ms. Smita Lakra) — पीठासीन प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC), झरीगांव। |
| पीड़ित अभियोजक | प्रदीप पटनायक (Pradeep Patnaik) — सहायक लोक अभियोजक (Assistant Public Prosecutor – APP)। |
| पीड़ित पुलिस अधिकारी | कोर्ट सब-इंस्पेक्टर (Court Sub-Inspector – CSI) — झरीगांव कोर्ट ड्यूटी प्रभारी। |
| हमले का हथियार | थैले में छुपाकर लाई गई भारी लोहे की छड़ (Iron Rod)। |
| घटना का अनुक्रम | 1. अदालत चलने के दौरान आरोपी महिला थैले में लोहे की रॉड छिपाकर सीधे डायस और अभियोजक की टेबल तक पहुंच गई। 2. उसने बिना किसी कहा-सुनी के सीधे एपीपी प्रदीप पटनायक के सिर पर रॉड से प्रहार किया, जिससे गहरा घाव हुआ और खून बहने लगा। 3. हिंसा को रोकने और एपीपी की जान बचाने हेतु लेडी मजिस्ट्रेट स्मिता लाकड़ा तुरंत अपनी कुर्सी से आगे आईं; आरोपी ने मजिस्ट्रेट पर भी हमला किया जिससे उन्हें चोटें आईं। 4. शोर-शराबा सुनकर कोर्ट सब-इंस्पेक्टर अपने कार्यालय से बाहर आए और महिला को शांत करने का प्रयास किया; महिला ने उनके सिर पर भी रॉड से जोरदार प्रहार कर उन्हें लहुलूहान कर दिया। |
| चिकित्सकीय स्थिति | तीनों घायल अधिकारियों को तत्काल नजदीकी सरकारी अस्पताल ले जाया गया; प्राथमिक उपचार और पट्टी कराने के बाद उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया। |
| हमले का मकसद | हमले का वास्तविक कारण और महिला का कानूनी विवाद अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका है; पुलिस हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। |
| कानूनी कार्रवाई | झरीगांव पुलिस ने आरोपी महिला के खिलाफ हत्या के प्रयास (धारा 109 BNS) और लोक सेवकों पर हमले (धारा 121/132 BNS) सहित कई गैर-जमानती धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया है। |
उड़ीसा उच्च न्यायालय, कटक.
लागू होने वाली वैधानिक धाराएं एवं अपराधों का वर्गीकरण
इस गंभीर आपराधिक कृत्य के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) और विशेष कानूनों के अंतर्गत निम्नलिखित प्राथमिक धाराएं आकर्षित होती हैं:
| BNS 2023 धारा | पूर्ववर्ती IPC धारा | अपराध का विवरण | प्रकृति / विधिक परिणाम |
|---|---|---|---|
| धारा 109 | धारा 307 | हत्या का प्रयास (Attempt to Murder): सिर जैसे संवेदनशील और घातक अंग पर लोहे की रॉड से प्रहार करना जिससे जान जा सकती थी। | संज्ञेय, गैर-जमानती, सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय (आजीवन कारावास तक का दंड)। |
| धारा 121(2) | धारा 333 | लोक सेवक को उसके कर्तव्य के दौरान स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना: अदालत में कार्यरत जज, एपीपी और पुलिस अधिकारी पर हमला। | संज्ञेय, गैर-जमानती, 10 वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना। |
| धारा 132 | धारा 353 | लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने हेतु आपराधिक बल या हमला: न्यायिक कार्यवाही को बाधित करना और भयभीत करना। | संज्ञेय, गैर-जमानती, 5 वर्ष तक का कारावास। |
| धारा 221 | धारा 228 | न्यायिक कार्यवाही में बैठे लोक सेवक का जानबूझकर अपमान या बाधा: कोर्ट रूम के भीतर हिंसक कृत्य करना। | संज्ञेय, 6 माह तक का कारावास या जुर्माना। |
| अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 | धारा 2(c) | आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt of Court): न्यायाधीश और अदालत की गरिमा को शारीरिक हिंसा से कलंकित करना और न्याय प्रशासन को सीधे रोकना। | उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर दंडित किए जाने योग्य। |
विधिक एवं संस्थागत विश्लेषण: ‘कोर्ट रूम सुरक्षा, अधीनस्थ न्यायपालिका का संरक्षण और प्रद्युम्न बिष्ट नज़ीर’
- ‘प्रद्युम्न बिष्ट बनाम भारत संघ’ (Supreme Court) का बाध्यकारी अधिदेश:
- भारत के उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली की रोहिणी कोर्ट और झारखंड में जज उत्तम आनंद की हत्या की घटनाओं के बाद देश भर की अधीनस्थ अदालतों की सुरक्षा को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी किए थे।
- शीर्ष अदालत ने सभी राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों को आदेश दिया था कि:
- प्रत्येक अदालत परिसर के प्रवेश द्वार पर डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर (DFMD) और हैंड-हेल्ड मेटल डिटेक्टर (HHMD) अनिवार्य रूप से लगाए जाएं।
- वादकारियों और आगंतुकों के थैलों और बैगों की सामान स्कैनर (Baggage Scanner) या मैन्युअल रूप से गहन तलाशी ली जाए।
- अदालत कक्षों और गलियारों में 24 घंटे कार्यशील सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।
- झरीगांव (नबरंगपुर) की घटना यह दर्शाती है कि ओडिशा के दूरदराज के आदिवासी बहुल जिलों में सुप्रीम कोर्ट के इन सुरक्षा दिशानिर्देशों का जमीनी स्तर पर कोई पालन नहीं हो रहा है।
- लेडी मजिस्ट्रेट का असाधारण साहस बनाम सुरक्षा शून्य:
- न्यायिक मजिस्ट्रेट स्मिता लाकड़ा ने जिस प्रकार अपनी जान की परवाह किए बिना अपने अभियोजक को बचाने के लिए शारीरिक हस्तक्षेप किया, वह उनके उच्च कर्तव्यबोध को दर्शाता है।
- किंतु यह घटना इस कड़वे सच को उजागर करती है कि यदि अदालत कक्ष में कोई सिरफिरा हथियार लेकर घुस जाता है, तो पीठासीन न्यायिक अधिकारी पूरी तरह असुरक्षित और असहाय होते हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता तभी बनी रह सकती है जब न्यायाधीश बिना किसी शारीरिक भय के अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।
- आपराधिक अवमानना और त्वरित विचारण:
- न्यायालय कक्ष के भीतर पीठासीन न्यायाधीश और अधिकारियों पर किया गया यह हमला सीधे तौर पर ‘न्यायालय के चेहरे पर अवमानना’ (Contempt in the Face of the Court) का मामला बनता है।
- उड़ीसा उच्च न्यायालय इस मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेकर राज्य के गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक (DGP) और नबरंगपुर के पुलिस अधीक्षक से विस्तृत सुरक्षा रिपोर्ट तलब करने की पूर्ण संवैधानिक शक्ति रखता है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- अदालत / स्थान: प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) न्यायालय, झरीगांव, जिला नबरंगपुर, ओडिशा।
- न्यायिक प्रभाग: नबरंगपुर जिला एवं सत्र न्यायालय (Nabarangpur Judgeship / उड़ीसा उच्च न्यायालय के अधीक्षण के अधीन)।
- घटना की तिथि: 7 नवंबर 2026 (शनिवार)।
- पीड़ित अधिकारीगण:
- सुश्री स्मिता लाकड़ा (Ms. Smita Lakra) — न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC)।
- प्रदीप पटनायक (Pradeep Patnaik) — सहायक लोक अभियोजक (APP)।
- कोर्ट सब-इंस्पेक्टर (CSI) — झरीगांव कोर्ट पुलिस अधिकारी।
- अभियुक्त: सनमती माझी (Sanamati Majhi) — पुलिस हिरासत में।
- कानूनी स्थिति: BNS की धारा 109, 121, 132 व 221 के तहत आपराधिक मामला दर्ज; पुलिस द्वारा हथियार (लोहे की रॉड) बरामद; न्यायिक रिमांड प्रक्रिया जारी।
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अदालत कक्ष की सुरक्षा, न्यायिक अधिकारियों का संरक्षण और न्याय प्रशासन में हिंसक अवरोध का विधिक मानक: ‘न्यायालय कक्ष के भीतर पीठासीन न्यायिक अधिकारी, लोक अभियोजक अथवा अदालती कर्मचारियों पर किसी भी प्रकार का शारीरिक हमला केवल एक व्यक्तिगत अपराध नहीं है, बल्कि यह न्याय प्रशासन और संविधान द्वारा स्थापित विधि के शासन पर सीधा सशस्त्र हमला है; देश की अधीनस्थ अदालतों में न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को निर्भीक वातावरण प्रदान करना राज्य कार्यपालिका का प्राथमिक और अपरिवर्तनीय संवैधानिक दायित्व है; सर्वोच्च न्यायालय के प्रद्युम्न बिष्ट निर्णय के आलोक में प्रत्येक अदालत परिसर में प्रभावी सुरक्षा जांच और हथियारों के प्रवेश को रोकने के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए; अदालत कक्ष के भीतर लोहे की रॉड से सिर पर वार करना BNS की धारा 109 के तहत हत्या के प्रयास का स्पष्ट मामला बनता है; तथा ऐसे मामलों में बिना किसी नरमी के त्वरित और कठोरतम कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि न्यायिक संस्थानों की गरिमा और सुरक्षा अक्षुण्ण बनी रहे।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: झरीगांव पुलिस ने आरोपी महिला सनमती माझी को गिरफ्तार कर लिया है और उसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के समक्ष पेश करने की प्रक्रिया चल रही है; नबरंगपुर जिला बार एसोसिएशन ने घटना के विरोध में कार्य बहिष्कार और अदालतों में तत्काल केंद्रीय सुरक्षा बल या सशस्त्र पुलिस बल तैनात करने की मांग की है; वहीं उड़ीसा उच्च न्यायालय प्रशासन ने घटना का संज्ञान लेते हुए जिला जज से तत्काल रिपोर्ट तलब की है ताकि राज्य भर की अधीनस्थ अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन किया जा सके।
Courtroom Safety: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत/स्थान | JMFC कोर्ट, झरीगाँव (नबरंगपुर न्यायक्षेत्र, ओडिशा) |
| घटना की तिथि | 7 नवंबर 2026 |
| आरोपी | सनमति माझी (आदिवासी महिला याचिकाकर्ता) |
| पीड़ित न्यायिक/पुलिस अधिकारी | 1. सुश्री स्मिता लाकड़ा (JMFC / महिला मजिस्ट्रेट) 2. प्रदीप पटनायक (सहायक लोक अभियोजक – APP) 3. कोर्ट सब-इंस्पेक्टर (CSI) |
| प्रयुक्त हथियार | बैग में छिपाकर लाई गई लोहे की रॉड (Iron Rod) |
| संबंधित कानून/प्रावधान | भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 109 (हत्या का प्रयास), धारा 132 (लोक सेवक को रोकने हेतु हमला) एवं धारा 221 (न्यायिक कार्यवाही में बाधा) |
| वर्तमान स्थिति | आरोपी महिला गिरफ्तार; घायल मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारियों को प्राथमिक उपचार के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया। |

