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मामले की पृष्ठभूमि और विधिक तर्क
- मामले की पृष्ठभूमि और एफआईआर:पीड़िता के पिता ने 23 सितंबर 2023 को शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी 17 वर्षीय बेटी खेत में भाई को खाना देने जाने के बाद से लापता है। 29 सितंबर 2023 को पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया और IPC की धारा 363, 376(2)(n) तथा POCSO Act की धारा 6 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया।
- ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष और राज्य की अपील:विशेष अदालत ने सुनवाई के बाद आरोपी को बरी कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने पाया कि पीड़िता पिछले 2 वर्षों से आरोपी के संपर्क में थी, वह उसके शादीशुदा होने की जानकारी के बावजूद साथ गई, और उसके पिछले प्रेम प्रसंगों में भी पैसों के लेन-देन से समझौते की बात सामने आई। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील कर तर्क दिया कि POCSO Act की धारा 29 के तहत आरोपी के खिलाफ अपराध का कानूनी अनुमान (Presumption of Guilt) लागू होता है जिसे आरोपी खंडित नहीं कर पाया।
- अपीलीय न्यायालय और ‘निर्दोषता का दोहरा अनुमान’:उच्च न्यायालय ने राज्य के तर्कों को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Jafarudheen and others v. State of Kerala (2022) का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि जब ट्रायल कोर्ट किसी आरोपी को बरी कर देता है, तो आरोपी को प्राप्त “निर्दोष होने का अनुमान” समाप्त होने के बजाय दोगुना मजबूत (Double Presumption) हो जाता है। जब तक कि साक्ष्यों का मूल्यांकन पूरी तरह से विकृत न हो, अपीलीय अदालत को बरी के आदेश को पलटना नहीं चाहिए।
कलबुर्गी (गुलबर्गा): यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012) की धारा 6 (प्रवेशक प्रवेशन लैंगिक हमला / Aggravated Penetrative Sexual Assault) व धारा 29 (अभियुक्त के विरुद्ध अपराध की विधिक उपधारणा / Presumption of Guilt), भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 (अपहरण) एवं धारा 376(2)(n) (बार-बार दुष्कर्म), अपीलीय आपराधिक न्यायशास्त्र में ‘दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील के विधिक मानक’ (Appeals Against Acquittal), तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय जफरुद्दीन व अन्य बनाम केरल राज्य [(2022) 8 SCC 440] (दोषमुक्ति से उत्पन्न ‘दोहरी निर्दोषिता की उपधारणा’ / Double Presumption of Innocence) के विधिक सिद्धांतों के तहत कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आपराधिक अपील का निस्तारण किया है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय की कलबुर्गी पीठ के न्यायमूर्ति अशोक एस. किनागी (Justice Ashok S. Kinagi) और न्यायमूर्ति सुब्रमण्य (Justice Subramanya) की खंडपीठ (Division Bench) ने विचारण विशेष अदालत द्वारा अभियुक्त को अपहरण एवं बार-बार दुष्कर्म के आरोपों से बरी किए जाने के निर्णय के विरुद्ध कर्नाटक राज्य सरकार द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज (Dismissed) कर दिया।
उच्च न्यायालय ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों और गवाहियों की समग्र समीक्षा के बाद पाया कि घटना की कथित तिथि पर पीड़िता की आयु 17 वर्ष, 3 माह और 19 दिन थी। अदालत ने विचारण अदालत के निष्कर्षों से सहमति जताते हुए दर्ज किया कि तथ्यों से स्पष्ट होता है कि लड़की को “पर्याप्त सांसारिक ज्ञान” (Enough Worldly Knowledge) था, वह अपने लिए क्या सही और गलत है यह समझने की परिपक्व स्थिति में थी, तथा पूर्व में भी उसके प्रेम प्रसंग रहे थे जिनमें पैसे लेकर समझौते किए गए थे। अदालत ने सुस्थापित सिद्धांत दोहराया कि अपीलीय अदालत को विचारण अदालत द्वारा दी गई दोषमुक्ति को पलटने में “अपेक्षाकृत धीमा” (Relatively Slow) होना चाहिए, क्योंकि बरी होने का आदेश अभियुक्त की निर्दोषिता की उपधारणा को और अधिक सुदृढ़ करता है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘लड़की को सांसारिक ज्ञान था, अपने भले-बुरे को समझने की स्थिति में थी’:
न्यायमूर्ति अशोक एस. किनागी और न्यायमूर्ति सुब्रमण्य की खंडपीठ ने पीड़िता के आचरण और पृष्ठभूमि का विश्लेषण करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट कहा: “तथ्य स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि पीड़ित लड़की को पर्याप्त सांसारिक ज्ञान (Enough worldly knowledge) है और उसे प्रेम प्रसंग बनाने तथा पैसे ऐंठने की आदत है। उसने तुकाराम बकाड़े से पैसे ऐंठे थे। कथित अपराध की तिथि पर पीड़िता की आयु 17 वर्ष, 03 माह और 19 दिन थी, और वह यह समझने की स्थिति में थी कि उसके लिए क्या सही है और क्या गलत है (In a position to understand what is right and wrong for her)।”
2. ‘दोषमुक्ति का आदेश निर्दोषिता की उपधारणा को दोहरा मजबूत करता है’:
- राज्य की इस दलील को कि POCSO की धारा 29 के तहत अभियुक्त के विरुद्ध अपराध की वैधानिक उपधारणा लागू होती है, अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय जफरुद्दीन (2022) के आलोक में परखते हुए कहा:“विचारण अदालत द्वारा दोषमुक्ति (Acquittal) का आदेश अभियुक्त के पक्ष में निर्दोषिता की उपधारणा को और बढ़ा देता है। अतः अपीलीय अदालत को विचारण अदालत के दोषमुक्ति के आदेश को पलटने में ‘अपेक्षाकृत धीमा’ (Relatively slow) होना चाहिए।अभियुक्त के पक्ष में काम करने वाली उपधारणा कमजोर नहीं होती, बल्कि केवल मजबूत होती है। अभियुक्त के पक्ष में उत्पन्न होने वाली ऐसी ‘दोहरी उपधारणा’ (Double Presumption) को केवल स्वीकृत कानूनी मापदंडों पर गहन और सूक्ष्म जांच के माध्यम से ही विचलित किया जाना चाहिए।”
3. संदेह से परे अपराध साबित करने में अभियोजन की विफलता:
- अदालत ने नोट किया कि विशेष अदालत ने पूरे साक्ष्य का समग्रता में परीक्षण किया था:
- प्राथमिकी दर्ज कराने में अस्पष्टीकृत विलंब था;
- स्वतंत्र पंच गवाहों ने अभियोजन पक्ष के कथनों का समर्थन नहीं किया;
- पीड़िता स्वयं दो वर्षों से आरोपी के संपर्क में थी और यह जानते हुए भी कि वह पहले से विवाहित है, उसके साथ लंबे समय तक मेलजोल बनाए रखा;
- पूर्व में अन्य व्यक्ति (तुकाराम बकाड़े) के साथ प्रेम प्रसंग और उसके बाद वित्तीय समझौते का साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद था, जिससे अभियोजन का मामला उचित संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सका।
कर्नाटक उच्च न्यायालय.
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2023–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| फोरम / न्यायालय | कर्नाटक उच्च न्यायालय, कलबुर्गी खंडपीठ (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार) |
| पीठ | न्यायमूर्ति अशोक एस. किनागी (Justice Ashok S. Kinagi) एवं न्यायमूर्ति सुब्रमण्य (Justice Subramanya) (खंडपीठ) |
| निर्णय की तिथि | नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | कर्नाटक राज्य बनाम अभियुक्त [Criminal Appeal (Acquittal) / 2026] |
| अपीलार्थी पक्ष | कर्नाटक राज्य (अभियोजन विभाग — विशेष लोक अभियोजक के माध्यम से)। |
| प्रतिवादी पक्ष | अभियुक्त (The Accused) — विचारण अदालत द्वारा दोषमुक्त व्यक्ति। |
| कथित घटना का घटनाक्रम | पीड़िता के पिता ने 23 सितंबर 2023 को शिकायत दर्ज कराई कि उनकी 17 वर्षीय बेटी 20 सितंबर 2023 को अपने खेत में काम कर रहे भाई को खाना देने निकली थी, किंतु घर नहीं लौटी। पुलिस ने 29 सितंबर 2023 को आरोपी को गिरफ्तार किया और लड़की को दस्तयाब किया। |
| दर्ज आरोप पत्र (Chargesheet) | • भारतीय दंड संहिता (IPC): धारा 363 (अपहरण) एवं धारा 376(2)(n) (एक ही महिला के साथ बार-बार दुष्कर्म)। • POCSO अधिनियम, 2012: धारा 6 (गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला)। |
| विचारण अदालत की कार्यवाही (2023) | विशेष अदालत ने 2 दिसंबर 2023 को संज्ञान लिया और 12 दिसंबर 2023 को आरोप तय किए। विचारण के दौरान अभियोजन गवाह (PW.1 – पीड़िता) ने गवाही दी कि वह आरोपी से 2 साल से संपर्क में थी, आरोपी ने शादी का वादा कर प्रेम संबंध बनाए और यह जानते हुए भी कि वह विवाहित है, उसने संबंध स्थापित किए। |
| विशेष अदालत का बरी करने का आधार | 1. पंच गवाहों ने अभियोजन कथनों का समर्थन नहीं किया। 2. प्राथमिकी में 3 दिनों का अस्पष्टीकृत विलंब था। 3. यह साबित हुआ कि पीड़िता के पहले भी प्रेम संबंध रहे थे और उसने पैसे लेकर समझौते किए थे; अतः अभियोजन पक्ष अपना मामला उचित संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा। |
| राज्य (सरकार) के अपीलीय तर्क | POCSO अधिनियम की धारा 29 के तहत अभियुक्त के विरुद्ध अपराध की वैधानिक उपधारणा (Presumption of Guilt) लागू होती है, जिसे अभियुक्त विचारण के दौरान खंडित (Rebut) करने में विफल रहा; लड़की कानूनन नाबालिग (18 वर्ष से कम) थी, इसलिए उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | राज्य सरकार की आपराधिक अपील खारिज (Dismissed); विशेष विचारण अदालत द्वारा अभियुक्त को बरी किए जाने का फैसला बरकरार। |
विधिक एवं आपराधिक न्यायशास्त्र: ‘POCSO धारा 29 बनाम दोहरी निर्दोषिता उपधारणा’
- ‘जफरुद्दीन बनाम केरल राज्य’ [(2022) 8 SCC 440] का बाध्यकारी विधिक अधिदेश:
- भारत के उच्चतम न्यायालय ने आपराधिक न्याय के मूल सिद्धांत को स्पष्ट किया है कि प्रत्येक व्यक्ति तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि उसका अपराध सिद्ध न हो जाए।
- जब विचारण अदालत सभी गवाहों की विश्वसनीयता (Demeanour of Witnesses) को व्यक्तिगत रूप से देखकर अभियुक्त को बरी कर देती है, तो अभियुक्त के पक्ष में ‘दोहरी निर्दोषिता की उपधारणा’ (Double Presumption of Innocence) उत्पन्न हो जाती है।
- अपीलीय अदालत केवल इस आधार पर ट्रायल कोर्ट के फैसले को नहीं पलट सकती कि साक्ष्यों का कोई दूसरा दृष्टिकोण भी संभव था। जब तक कि ट्रायल कोर्ट का फैसला स्पष्ट रूप से विकृत (Perverse) या कानून के स्थापित सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत न हो, उच्च न्यायालय को दोषमुक्ति में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।
- POCSO अधिनियम की धारा 29 और 30 की सीमाएं:
- अभियोजन का तर्क था कि धारा 29 के तहत उपधारणा आरोपी के खिलाफ है।
- तथापि, सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में यह सुस्थापित किया है कि धारा 29 की रिवर्स बर्डन (Reverse Burden of Proof) उपधारणा स्वतः लागू नहीं होती; इसके संचालन के लिए अभियोजन को पहले अपने बुनियादी मामले के “आधारभूत तथ्यों” (Foundational Facts) को ठोस साक्ष्यों से स्थापित करना अनिवार्य है।
- जब पंच गवाह मुकर गए हों, लड़की के बयानों में भारी विरोधाभास हों और दुर्भावनापूर्ण वित्तीय लाभ के इतिहास का प्रमाण सामने आ जाए, तो धारा 29 की वैधानिक उपधारणा का कोई विधिक प्रभाव शेष नहीं रहता।
- आयु, सहमति और अभियोजन की विश्वसनीयता:
- यद्यपि POCSO अधिनियम में 18 वर्ष से कम आयु के मामले में सहमति अप्रासंगिक होती है, किंतु जब मामला शादी के झूठे वादे पर दुष्कर्म (Rape under false promise to marry) और अपहरण का हो, तो गवाह की विश्वसनीयता (Credibility of the Prosecutrix) तय करने के लिए अदालत पीड़िता की परिपक्वता, आचरण और पृष्ठभूमि का संज्ञान ले सकती है।
- कलबुर्गी खंडपीठ ने पाया कि 17 वर्ष 3 माह की किशोरी पूरी तरह समझदार थी और तथ्यों से यह प्रदर्शित होता था कि यह मामला किसी धोखे या जबरन यौन शोषण का नहीं, बल्कि बाद में विवाद उत्पन्न होने पर दर्ज कराया गया केस था।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: कर्नाटक उच्च न्यायालय, कलबुर्गी खंडपीठ (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: कर्नाटक राज्य बनाम अभियुक्त [Criminal Appeal No. … / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति अशोक एस. किनागी (Justice Ashok S. Kinagi) एवं न्यायमूर्ति सुब्रमण्य (Justice Subramanya) (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: राज्य सरकार की अपील खारिज; विशेष अदालत द्वारा पारित दोषमुक्ति का आदेश बहाल।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012):
- धारा 6 — गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला
- धारा 29 — कतिपय अपराधों के संबंध में उपधारणा
- धारा 30 — मानसिक स्थिति की उपधारणा
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC):
- धारा 363 — अपहरण
- धारा 376(2)(n) — एक ही महिला के साथ बार-बार दुष्कर्म
- आपराधिक प्रक्रिया संहिता / BNSS: दोषमुक्ति के विरुद्ध अपीलीय शक्तियां (पूर्ववर्ती CrPC धारा 378)
- सर्वोच्च न्यायालय नज़ीर: जफरुद्दीन व अन्य बनाम केरल राज्य [(2022) 8 SCC 440] — अपीलीय न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति के फैसलों में हस्तक्षेप के विधिक मानक।
- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील, POCSO धारा 29 की विधिक सीमाएं और अभियोजन साक्ष्य की विश्वसनीयता का विधिक मानक: ‘विचारण अदालत द्वारा दोषमुक्ति का निर्णय पारित किए जाने के उपरांत अभियुक्त के पक्ष में निर्दोषिता की उपधारणा समाप्त होने के बजाय दोगुनी सुदृढ़ (Double Presumption of Innocence) हो जाती है, और अपीलीय उच्च न्यायालय को ऐसे फैसलों को पलटने में अत्यधिक संयमित और धीमा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए; POCSO अधिनियम की धारा 29 के अंतर्गत अभियुक्त के विरुद्ध अपराध की वैधानिक उपधारणा केवल तभी आकर्षित होती है जब अभियोजन प्राथमिक आधारभूत तथ्यों को विश्वसनीय साक्ष्यों से सिद्ध कर दे; यदि स्वतंत्र गवाह मुकर जाएं, प्राथमिकी में अकारण विलंब हो और अभियोक्त्री के पूर्व आचरण से यह प्रकट हो कि उसे पर्याप्त सांसारिक समझ (Worldly Knowledge) थी और वह भले-बुरे को समझने में सक्षम थी तथा मामले में पूर्व वित्तीय लेन-देनों का इतिहास रहा हो, तो अभियोजन का मामला उचित संदेह से परे सिद्ध नहीं माना जा सकता; तथा जब तक विचारण अदालत का निष्कर्ष स्पष्ट रूप से विकृत या कानून के विपरीत न हो, दोषमुक्ति के आदेश में हस्तक्षेप करना न्यायसंगत नहीं है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: कर्नाटक उच्च न्यायालय की कलबुर्गी खंडपीठ के इस निर्णय के साथ विशेष POCSO अदालत का दोषमुक्ति आदेश अंतिम रूप से पुष्ट हो गया है; अभियुक्त को अब इस मामले में किसी आगे की न्यायिक हिरासत या विचारण का सामना नहीं करना पड़ेगा, और उस पर लगे सभी आपराधिक आरोप हमेशा के लिए समाप्त हो गए हैं।
POCSO Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court – Kalaburagi Bench) |
| पीठ | न्यायमूर्ति अशोक एस. किनागी एवं न्यायमूर्ति सुब्रमण्य |
| केस / पक्षकार | कर्नाटक राज्य बनाम [आरोपी] (State of Karnataka Appeal) |
| संबंधित कानून/प्रावधान | POCSO Act की धारा 6 व 29, IPC की धारा 363 व 376(2)(n) (BNS समकक्ष प्रावधान) |
| मूल विवाद | 17 वर्षीय नाबालिग के अपहरण व बलात्कार का आरोप; ट्रायल कोर्ट द्वारा पीड़िता के पुराने मामलों में पैसे ऐंठने, शिकायत में देरी और पंच गवाहों के मुकरने पर आरोपी को बरी करना। |
| अदालत का अंतिम आदेश | बरी का फैसला बरकरार (Acquittal Upheld): राज्य की अपील खारिज; निर्दोषता के दोहरे अनुमान और साक्ष्यों के अभाव में दखल से इनकार। |

