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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- ‘सुपर कॉप’ बनने की साजिश और घटनाक्रम:NIA के अनुसार, 16 साल के निलंबन (2004 से 2020) के बाद वाजे अपनी ‘सुपर कॉप’ छवि को पुनः स्थापित करना चाहता था। उसने मनसुख हिरेन की गाड़ी चुराकर, उसकी नंबर प्लेट बदलकर, उसमें जिलेटिन की छड़ें (Explosives) और धमकी भरा पत्र रखकर उसे उद्योगपति मुकेश अंबानी के आवास ‘एंटिलिया’ के बाहर पार्क करने की साजिश रची। इसके बाद टेलीग्राम चैनल पर एक आतंकी संगठन का नाम लेकर जिम्मेदारी का दावा कराया गया ताकि अमीर उद्योगपतियों में डर पैदा कर उनसे जबरन वसूली (Extortion Racket) की जा सके।
- अभूतपूर्व प्रभाव और गवाहों को धमकाने की आशंका:पीठ ने पाया कि एक एपीआई (Assistant Police Inspector) पद पर रहते हुए वाजे के पास महंगी लग्जरी गाड़ियां थीं, और वह इतना प्रभावशाली था कि अपने ही मामलों की जांच स्वयं को सौंप लेता था। पुलिस महकमे में उसका इतना प्रभाव था कि वह होटल और बार मालिकों से जबरन वसूली का रैकेट चला रहा था। ऐसी स्थिति में उसे जमानत पर रिहा करने से गवाहों के प्रभावित होने और निष्पक्ष सुनवाई पटरी से उतरने का गंभीर जोखिम है।
- UAPA की धारा 15 और 43D(5) का लागू होना:अदालत ने माना कि विस्फोटक से लदी गाड़ी को एक प्रमुख उद्योगपति परिवार के घर के बाहर पार्क करना न केवल जनता में दहशत फैलाने का कृत्य है, बल्कि यह देश की ‘आर्थिक सुरक्षा’ (Economic Security) को खतरे में डालने का प्रयास है। इस प्रकार UAPA की धारा 15 (आतंकी कृत्य) के प्राथमिक घटक सिद्ध होते हैं। UAPA की धारा 43D(5) के तहत यदि आरोप प्रथम दृष्टया सच्चे प्रतीत होते हैं, तो जमानत देने पर पूर्ण वैधानिक प्रतिबंध (Statutory Embargo) लागू होता है।
- विशेष अदालत की कड़ी आलोचना:हाईकोर्ट ने विशेष एनआईए जज द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण को ‘विचित्र’ और कानूनी सिद्धांतों के विपरीत बताया। विशेष जज की यह धारणा कि “आरोप तय (Framing of Charges) करने का मापदंड जमानत देने के मापदंड से कम सख्त है”, एक पूर्ण कानूनी विकृति है।
मुख्य विधिक व UAPA न्यायशास्त्र निष्कर्ष
1. UAPA के तहत ‘आर्थिक सुरक्षा’ और ‘आतंकी कृत्य’ की परिभाषा:
यह निर्णय स्थापित करता है कि आतंकवाद केवल सीमाओं या सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमला नहीं है। देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों को डराना या उनकी सुरक्षा को खतरे में डालना सीधे तौर पर भारत की आर्थिक सुरक्षा (Economic Security) पर हमला है, जो UAPA की धारा 15 के दायरे में आता है।
2. वर्दीधारी अधिकारियों की आपराधिक संलिप्तता:
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कानून का रक्षक ही नागरिकों के अधिकारों को कुचलने और आतंकी साजिश रचने का मुख्य सूत्रधार बन जाए, तो न्याय प्रणाली को ‘कठोर हाथों’ (Iron Hands) से निपटना चाहिए। ऐसे मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जनहित और राज्य की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी।
मुंबई: गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) की धारा 15 (आतंकवादी कृत्य / Terrorist Act—देश की ‘आर्थिक सुरक्षा’ और संप्रभुता को खतरा पहुंचाना), धारा 43D(5) (आरोपों के प्रथम दृष्टया सत्य प्रतीत होने पर जमानत पर पूर्ण वैधानिक प्रतिबंध), भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 120B व विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, कानून के शासन में ‘वर्दीधारी लोक सेवक द्वारा पद का दुरुपयोग’ (Abuse of Police Power & Clout), तथा जमानत न्यायशास्त्र में विशेष अदालतों की कानूनी विकृति (Perversity of Lower Court Findings) के सिद्धांतों के तहत बॉम्बे उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक एंटीलिया विस्फोटक कांड में एक अत्यंत कठोर और युगांतकारी निर्णय सुनाया है।
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी (Justice Girish Kulkarni) और न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले (Justice Dr. Neela Gokhale) की खंडपीठ ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की अपील स्वीकार करते हुए 5 नवंबर 2026 को सुनाए गए 86 पृष्ठों के विस्तृत निर्णय में बर्खास्त पुलिस अधिकारी सचिन वाझे (Sachin Waze) को विशेष एनआईए अदालत द्वारा दी गई नियमित जमानत को पूरी तरह निरस्त/रद्द (Quashed and Set Aside) कर दिया।
उच्च न्यायालय ने विशेष अदालत के इस तर्क को “विचित्र, असामान्य और कानूनी रूप से विकृत” करार दिया जिसमें कहा गया था कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है जिससे साबित हो कि अंबानी परिवार इस घटना से भयभीत हुआ था। खंडपीठ ने दो-टूक व्यवस्था दी कि देश का कोई भी नागरिक—चाहे वह एक आम आदमी हो या देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाला कोई प्रतिष्ठित उद्योगपति—आतंक के लेशमात्र खतरे का शिकार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने पाया कि वाझे ने 16 साल के निलंबन के बाद खुद को दोबारा “सुपर कॉप” के रूप में स्थापित करने, उद्योगपतियों से सुरक्षा के नाम पर जबरन वसूली करने और आम जनता में आतंक फैलाने के उद्देश्य से जिलेटिन की छड़ों से भरी गाड़ी एंटीलिया के बाहर खड़ी की थी और मनसुख हिरेन की हत्या की साजिश रची थी।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘आतंक का शिकार व्यक्ति ही उसकी भयावहता समझ सकता है; जमानत देना कानून के शासन को खतरे में डालेगा’:
विशेष अदालत के उस निष्कर्ष को खारिज करते हुए कि अंबानी परिवार के ‘आतंकित’ होने का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था, खंडपीठ ने कड़े शब्दों में दर्ज किया: “इस देश का कोई भी नागरिक, और विशेषकर वर्तमान मामले की तरह एक प्रतिष्ठित उद्योगपति जो राष्ट्र और उसकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, आतंक के लेशमात्र खतरे (Remotest threat of terror) का शिकार नहीं बनाया जा सकता। जो व्यक्ति आतंक के खतरे को झेलता है, वही गैर-कानूनी कृत्यों में लिप्त व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न की गई प्रतिकूलताओं और भयावहता की कल्पना कर सकता है। जमानत के संदर्भ में, यदि ऐसे कृत्यों से कानून के आदेशानुसार सख्ती और लोहे के हाथों (Dealt with iron hands) से नहीं निपटा गया, तो स्वयं ‘विधि का शासन’ (Rule of law) खतरे में पड़ जाएगा। अतः, वाझे को जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता। उसे जमानत देना व्यापक सार्वजनिक हित (Larger public interest) के सर्वथा विपरीत होगा।”
2. ’16 साल सस्पेंड रहे अफसर ने “सुपर कॉप” बनने व वसूली हेतु सेल्यूलॉइड/फिल्मी साजिश रची’:
- एनआईए के आरोपों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों का विश्लेषण करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
- वाझे मार्च 2004 से जून 2020 तक (16 वर्षों तक) पुलिस सेवा से निलंबित रहे थे। बहाली के बाद वे खुद को एक “सुपर कॉप” के रूप में पुनर्जीवित करने के लिए आतुर थे।
- अदालत ने पाया कि वाझे ने मनसुख हिरेन की स्कॉर्पियो कार को चुराया हुआ दिखाने, उसकी नंबर प्लेट बदलने, उसमें विस्फोटक (जिलेटिन की छड़ें) भरने और कार के अंदर धमकी भरा पत्र रखकर उसे अंबानी के आवास के बाहर पार्क करने की पूरी साजिश रची।
- इसके बाद उन्होंने टेलीग्राम चैनल पर एक ज्ञात आतंकी संगठन के नाम से फर्जी जिम्मेदारी का दावा प्रकाशित कराया (जिसका उस आतंकी समूह ने तुरंत खंडन किया), ताकि आम जनता में आतंक पैदा हो सके और फिर वाझे स्वयं “सुपर कॉप” बनकर उद्योगपति को सुरक्षा देने के नाम पर उनसे करोड़ों की वसूली कर सकें।
- खंडपीठ ने कहा: “यह पूरी योजना भले ही किसी सेल्यूलॉइड (सिनेमाई/फिल्मी कहानी) जैसी प्रतीत होती हो, तथापि इसके परिणाम अत्यंत गंभीर अपराधों के गठन के रूप में सामने आए हैं।”
3. ‘वाझे का पुलिस महकमे में असामान्य दबदबा (Clout), लग्जरी गाड़ियां और गवाहों को प्रभावित करने की क्षमता’:
- अदालत ने एक सहायक पुलिस निरीक्षक (API) के रूप में वाझे के असाधारण प्रभाव पर टिप्पणी की:“एक साधारण एपीआई होने के बावजूद, उनके पास हाई-एंड लग्जरी कारें थीं और वे इतने प्रभावशाली थे कि जिन मामलों में वे स्वयं संलिप्त थे, उनकी जांच सीधे अपने ही पास करवा लेते थे—भले ही वे मामले अन्य थाना क्षेत्रों के क्यों न रहे हों। पुलिस तंत्र में उनके दबदबे (Clout) को कमतर नहीं आंका जा सकता।उच्च अधिकारियों के साथ उनकी निकटता और जिस निर्लज्जता व बेखौफ अंदाज में वे होटलों व बार मालिकों से वसूली का रैकेट चला रहे थे, वह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि वे गवाहों को प्रभावित करने और साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की पूरी क्षमता रखते हैं। किसी भी मानक से वाझे को एक ईमानदार लोक सेवक नहीं माना जा सकता।”
4. UAPA की धारा 15 व 43D(5) का विधिक अवरोध पूर्णतः लागू:
- अदालत ने माना कि उद्योगपति परिवार को निशाना बनाना सीधे तौर पर देश की ‘आर्थिक सुरक्षा’ (Economic Security) को खतरे में डालने के कृत्य के रूप में UAPA की धारा 15 को आकर्षित करता है।
- अभियोजन पक्ष की सामग्री प्रथम दृष्टया सत्य प्रतीत होती है, जिसके चलते UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत पर सांविधिक प्रतिबंध (Statutory Embargo) पूरी शक्ति के साथ लागू होता है।
5. विशेष न्यायाधीश की ‘कैजुअल और विकृत’ कार्यप्रणाली की तीखी निंदा:
- उच्च न्यायालय ने विशेष एनआईए अदालत द्वारा जमानत दिए जाने के ढंग को न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के खिलाफ पाया:“विशेष न्यायाधीश द्वारा की गई ऐसी टिप्पणियां न्यायिक तर्क के मूलभूत सिद्धांतों से सर्वथा परे और असामान्य प्रतीत होती हैं। यह समझ से परे है कि विशेष न्यायाधीश ऐसी विचित्र टिप्पणियां (Bizarre observations) करके वास्तव में क्या साबित करना चाहते थे।विशेष न्यायाधीश का यह निष्कर्ष कि ‘आरोप तय (Framing of Charges) करने के लिए जमानत की तुलना में कम संतुष्टि की आवश्यकता होती है’, पूर्ण रूप से कानूनी विकृति (Absolute legal perversity) है। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि विशेष अदालत ने स्थापित विधिक मानकों को पूरी तरह ताक पर रख दिया था।”

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2021–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | बॉम्बे उच्च न्यायालय, अपीलीय क्षेत्राधिकार (NIA अपीलीय पीठ) |
| पीठ | न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी (Justice Girish Kulkarni) एवं न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले (Justice Dr. Neela Gokhale) |
| निर्णय की तिथि | 5 नवंबर 2026 (गुरुवार) (निर्णय का विवरण 86 पृष्ठों में दर्ज) |
| केस संदर्भ | राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) बनाम सचिन हिंदुराव वाझे व अन्य [Criminal Appeal / Bail Cancellation / 2026] |
| अपीलार्थी पक्ष | राष्ट्रीय जांच एजेंसी (National Investigation Agency – NIA)। |
| प्रतिवादी (अभियुक्त) | सचिन हिंदुराव वाझे (Sachin Hindurao Waze) — मुंबई पुलिस के पूर्व सहायक पुलिस निरीक्षक (API) एवं बर्खास्त एनकाउंटर स्पेशलिस्ट। |
| मूल घटना (25 फरवरी 2021) | दक्षिण मुंबई में उद्योगपति मुकेश अंबानी के बहुमंजिला आवास ‘एंटीलिया’ के बाहर एक लावारिस स्कॉर्पियो कार पाई गई, जिसमें 20 जिलेटिन की छड़ें (विस्फोटक) और एक धमकी भरा पत्र रखा हुआ था। |
| मनसुख हिरेन हत्याकांड (मार्च 2021) | उक्त वाहन के वास्तविक मालिक मनसुख हिरेन ने कार चोरी होने की सूचना दी थी; 5 मार्च 2021 को ठाणे की खाड़ी (Creek) से हिरेन का शव रहस्यमय परिस्थितियों में बरामद हुआ। एनआईए जांच में खुलासा हुआ कि वाझे ने राज खुलने के डर से अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर हिरेन की हत्या कराई। |
| विशेष अदालत का विवादित जमानत आदेश | सितंबर 2026 में मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने वाझे को नियमित जमानत दे दी थी। विशेष अदालत ने यह विचित्र टिप्पणी की थी कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि उद्योगपति परिवार इस घटना से ‘आतंकित’ हुआ था और UAPA के तहत प्रथम दृष्टया आतंकी कृत्य नहीं बनता। |
| एनआईए का उच्च न्यायालय में आक्षेप | 1. वाझे का पुलिस तंत्र और सत्ता के गलियारों में अत्यधिक प्रभाव है; वे गवाहों को धमका सकते हैं। 2. देश के शीर्ष औद्योगिक घराने पर हमला भारत की ‘आर्थिक सुरक्षा’ पर आतंकी हमला है। 3. UAPA की धारा 43D(5) की कठोर शर्तों को विशेष अदालत ने दरकिनार किया। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | अपील स्वीकृत (Allowed); विशेष एनआईए अदालत द्वारा दिया गया जमानत आदेश पूरी तरह रद्द (Quashed and Set Aside); सचिन वाझे ठाणे सेंट्रल जेल में ही न्यायिक हिरासत में रहेंगे। |
विधिक विश्लेषण: ‘UAPA धारा 15(1)(a)(iiia) – आर्थिक सुरक्षा, धारा 43D(5) और जहूर अहमद वटाली नज़ीर’
- UAPA की धारा 15 और ‘आर्थिक सुरक्षा’ (Economic Security) का दायरा:
- संसद ने 2013 में UAPA की धारा 15 में संशोधन कर ‘आर्थिक सुरक्षा’ को आतंकवादी कृत्य की परिभाषा में शामिल किया था।
- बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस विधायी आशय का विस्तार करते हुए व्यवस्था दी कि भारत के प्रमुख औद्योगिक घरानों, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP), रोजगार और वैश्विक आर्थिक साख की रीढ़ हैं, को बम विस्फोट की धमकी देकर आतंकित करना केवल एक साधारण जबरन वसूली (IPC 384) का अपराध नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक ताने-बाने को अस्थिर करने का सुनियोजित आतंकवादी कृत्य है।
- धारा 43D(5) और ‘जहूर अहमद वटाली’ [(2019) 5 SCC 1] का सख्त परीक्षण:
- सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी बनाम जहूर अहमद शाह वटाली में यह स्पष्ट किया था कि विशेष अदालतों को जमानत के चरण पर गवाहों के बयानों की विश्वसनीयता या साक्ष्यों के सूक्ष्म मूल्यांकन (Mini-Trial) में नहीं पड़ना चाहिए।
- यदि अभियोजन की सामग्री यह दर्शाती है कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया आधार मौजूद हैं—जैसे कि वाझे द्वारा विस्फोटक मंगाना, फर्जी नंबर प्लेट लगवाना और कार पार्क करवाना—तो धारा 43D(5) अदालत के हाथ बांध देती है और जमानत देने पर पूर्ण विधिक रोक लग जाती है। विशेष अदालत ने यह कहकर कि “अंबानी के डरने का सबूत नहीं है”, कानून की इस वैधानिक सीमा का खुला उल्लंघन किया था।
- वर्दी में अपराध और संस्थागत विश्वास का क्षरण:
- अदालत ने माना कि जब कानून का रक्षक ही वर्दी की आड़ में अपराधी बन जाता है और 16 साल के सस्पेंशन के बाद भी अपनी काली कमाई से लग्जरी लाइफस्टाइल जीता है, तो न्यायपालिका को ऐसे मामलों में अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए।
- यदि ऐसे प्रभावशाली पूर्व अधिकारियों को रिहा किया जाएगा तो आम गवाह (विशेषकर वे कनिष्ठ पुलिसकर्मी जिनका वाझे ने इस्तेमाल किया था) कभी भी अदालत में सच बोलने का साहस नहीं जुटा पाएंगे।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय, अपीलीय क्षेत्राधिकार (विशेष एनआईए अपीलीय खंडपीठ)
- केस संदर्भ: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) बनाम सचिन हिंदुराव वाझे व अन्य [Criminal Appeal / Bail Cancellation / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी (Justice Girish Kulkarni) एवं न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले (Justice Dr. Neela Gokhale)
- निर्णय की तिथि: 5 नवंबर 2026 (गुरुवार) (86 पृष्ठीय विस्तृत निर्णय)
- कार्यवाही का परिणाम: एनआईए की अपील स्वीकृत; विशेष अदालत द्वारा सचिन वाझे को दिया गया जमानत आदेश पूरी तरह निरस्त/रद्द (Quashed and Set Aside); वाझे की न्यायिक हिरासत बरकरार।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA):
- धारा 15 — आतंकवादी कृत्य की परिभाषा (आर्थिक सुरक्षा को खतरा)
- धारा 16 — आतंकवादी कृत्य हेतु दंड
- धारा 18 — आतंकवादी साजिश रचना
- धारा 43D(5) — जमानत पर सांविधिक प्रतिबंध (प्रथम दृष्टया सत्यता का परीक्षण)
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC):
- धारा 302 — हत्या (मनसुख हिरेन हत्याकांड)
- धारा 120B — आपराधिक षड्यंत्र
- धारा 201 — साक्ष्य मिटाना
- धारा 384/386 — जबरन वसूली
- विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 (Explosive Substances Act) — धारा 3 व 4 (जिलेटिन छड़ों का अवैध संधारण)
- गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- आतंकवाद, आर्थिक सुरक्षा, प्रभावशाली लोक सेवकों द्वारा पद का दुरुपयोग और UAPA जमानत का विधिक मानक: ‘संविधान के अंतर्गत देश का प्रत्येक नागरिक—चाहे वह साधारण जन हो अथवा राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला शीर्ष उद्योगपति—आतंक और भय से मुक्त वातावरण में जीवन जीने का मौलिक अधिकार रखता है; किसी प्रमुख औद्योगिक घराने के निवास के बाहर विस्फोटक रखकर भय उत्पन्न करना देश की आर्थिक सुरक्षा (Economic Security) और अखंडता पर प्रहार होने के कारण UAPA की धारा 15 के तहत ‘आतंकवादी कृत्य’ के दायरे में आता है; जहाँ अभियोजन के साक्ष्य प्रथम दृष्टया आरोपी की संलिप्तता प्रमाणित करते हों, वहाँ UAPA की धारा 43D(5) का सांविधिक प्रतिबंध पूर्ण बल के साथ लागू होता है और विशेष अदालतें ‘पीड़ित के भयभीत होने के प्रमाण के अभाव’ जैसी विचित्र और विकृत दलीलों के आधार पर जमानत नहीं दे सकतीं; एक पुलिस अधिकारी द्वारा 16 वर्षों के निलंबन के बाद स्वयं को ‘सुपर कॉप’ के रूप में पुनर्जीवित करने और अवैध वसूली सिंडिकेट चलाने हेतु रची गई सेल्यूलॉइड जैसी आपराधिक साजिश विधि के शासन पर सीधा प्रहार है; तथा ऐसे अत्यधिक प्रभावशाली और संपन्न अभियुक्त को जमानत पर रिहा करना गवाहों को धमकाने और विचारण की प्रक्रिया को दूषित करने का गंभीर जोखिम उत्पन्न करता है, जो व्यापक लोकहित के सर्वथा प्रतिकूल है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: बॉम्बे उच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय के साथ विशेष अदालत द्वारा 29 सितंबर 2026 को दिया गया जमानत आदेश निष्प्रभावी हो गया है; सचिन वाझे ठाणे केंद्रीय कारागार में ही बंद रहेंगे; इस फैसले से विशेष एनआईए अदालत के उस विवादित दृष्टिकोण को कड़ा झटका लगा है जो आतंकवादी कृत्यों में उद्योगपतियों के विरुद्ध रची गई साजिशों को केवल सामान्य आपराधिक विवाद के रूप में आंकने की भूल कर रहा था।
Bail Ban: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court – Division Bench) |
| पीठ | न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी एवं न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले |
| केस / पक्षकार | राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) बनाम सचिन हिंदूराव वाजे |
| आरोपी | सचिन वाजे (बर्खास्त सहायक पुलिस निरीक्षक – API, मुंबई पुलिस) |
| संबंधित कानून/प्रावधान | गैर-कानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA की धारा 15 एवं धारा 43D(5)) तथा BNS / IPC के तहत हत्या व षड्यंत्र |
| विशेष कोर्ट की त्रुटि | विशेष जज का यह मानना कि “अंबानी परिवार के आतंकित होने का प्रत्यक्ष सबूत नहीं है” और हाईकोर्ट द्वारा नए सिरे से आवेदन की छूट को जमानत देने का लाइसेंस मान लेना। |
| अदालत का अंतिम आदेश | विशेष अदालत का जमानत आदेश रद्द: UAPA धारा 43D(5) का वैधानिक प्रतिबंध पूरी ताकत से लागू; सचिन वाजे को जेल में रखने का आदेश। |

