Sunday, November 8, 2026
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Rubber Stamp Order: जनवरी से 500 से अधिक आदेश रद्द हो चुके हैं; संज्ञान अपराध का लेते हैं न कि अपराधी का, मजिस्ट्रेटों के न्यायिक प्रशिक्षण के दिए निर्देश

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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क

  1. मामले का घटनाक्रम:अगस्त 2025 में गचीबोवली पुलिस ने शिकायतकर्ता के आधार पर आरोपी संख्या 1 से 7 के खिलाफ BNS की धारा 109 (हत्या का प्रयास) के तहत FIR दर्ज की थी। जांच के बाद पुलिस ने धाराओं को संशोधित कर BNS की धारा 122(2) (गंभीर चोट) में बदलकर जुलाई 2026 में फाइनल रिपोर्ट दायर की। ट्रायल कोर्ट के मजिस्ट्रेट ने एक रबर स्टैंप आदेश के जरिए बिना तारीख का उल्लेख किए सीधे आरोपियों के खिलाफ समन जारी कर दिया।
  2. शिकायतकर्ता की चिंता और विधिक जोखिम:शिकायतकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि मजिस्ट्रेट की इस प्रक्रियात्मक त्रुटि को सुधारा नहीं गया, तो पूरा मुकदमा (Trial) पूरा होने और दोषसिद्धि होने के बाद भी आरोपी इस संज्ञान आदेश की वैधता को उच्च न्यायालय में चुनौती देकर पूरे मुकदमे को रद्द करवा सकते हैं। इससे शिकायतकर्ता को अपूरणीय क्षति होगी और मुकदमों का बहुस्तरीय दौर (Multiple Rounds of Litigation) शुरू हो जाएगा।
  3. सर्वोच्च न्यायालय के नज़ीरों का संदर्भ:अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसलों—Sunil Bharti Mittal (2015), GHCL Employees Stock Option Trust (2013), और Chief Enforcement Officer v. Videocon International Limited (2008)—का हवाला देते हुए दोहराया कि “संज्ञान हमेशा अपराध का लिया जाता है, न कि अपराधी का” और समन जारी करने का चरण न्यायिक विवेक के प्रयोग की मांग करता है।
  4. न्यायिक अकादमी को संस्थागत निर्देश:अदालत ने अपने आदेश की प्रति निदेशक, तेलंगाना राज्य न्यायिक अकादमी (Secunderabad) को भेजने का निर्देश दिया, ताकि न्यायिक अधिकारियों (विशेषकर मजिस्ट्रेटों) के लिए कानूनी संज्ञान लेने और स्वतंत्र समाधान दर्ज करने से संबंधित विषयों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा सकें।

मुख्य विधिक व आपराधिक न्यायशास्त्र निष्कर्ष

1. संज्ञान बनाम समन जारी करने का विधिक अंतर:

यह फैसला स्थापित करता है कि आपराधिक प्रक्रिया के तहत ‘संज्ञान लेना’ (Taking Cognizance) और ‘समन/प्रक्रिया जारी करना’ (Issuance of Process) दो अलग-अलग चरण हैं। संज्ञान मामले के तथ्यों में अपराध के अस्तित्व को स्वीकार करने की न्यायिक क्रिया है, न कि किसी व्यक्ति विशेष को आरोपी ठहराने का शुरुआती आदेश।

2. न्यायिक समय की बचत और संस्थागत अनुशासन:

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेटों की लापरवाही के कारण 500 से अधिक मामलों का उच्च न्यायालय तक पहुंचना न्यायिक संसाधनों का अपव्यय है। अदालतों का यह प्राथमिक दायित्व है कि शुरुआती चरण में ही त्रुटिहीन कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।

हैदराबाद: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 210 (मजिस्ट्रेट द्वारा अपराधों का संज्ञान लिया जाना—पूर्ववर्ती CrPC धारा 190), धारा 227 (आरोपी के विरुद्ध आदेशिका / समन जारी करना—पूर्ववर्ती CrPC धारा 204), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 122(2) (उकसावे पर स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना) व पूर्ववर्ती धारा 109 (हत्या का प्रयास), तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों—सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई [(2015) 4 SCC 609], जीएचसीएल एम्प्लॉइज स्टॉक ऑप्शन ट्रस्ट बनाम इंडिया इंफोलाइन लिमिटेड [(2013) 4 SCC 505] एवं चीफ एनफोर्समेंट ऑफिसर बनाम वीडियोकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड [(2008) 3 SCC 492]—के स्थापित विधिक सिद्धांतों के तहत तेलंगाना उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायपालिका द्वारा अपनाई जा रही ‘रबर स्टैंप’ कार्यशैली पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए संस्थागत सुधारात्मक कदम उठाए हैं।

तेलंगाना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे. श्रीनिवास राव (Justice J. Sreenivas Rao) की एकल पीठ ने रंगा रेड्डी जिले की जूनियर फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट (JFMC) अदालत द्वारा पारित संज्ञान आदेश को रद्द (Set Aside) करते हुए यह स्तब्ध करने वाला खुलासा किया कि जनवरी 2026 से अब तक उच्च न्यायालय अधीनस्थ अदालतों के 500 से अधिक त्रुटिपूर्ण संज्ञान आदेशों को रद्द कर चुका है।

उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि मजिस्ट्रेट स्वतंत्र न्यायिक विवेक (Application of Mind) का प्रयोग किए बिना रबर स्टैंप का उपयोग कर संक्षिप्त और यांत्रिक आदेश पारित कर रहे हैं। वर्तमान मामले में मजिस्ट्रेट ने कानून के बुनियादी सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए संज्ञान ‘अपराध’ (Offence) का लेने के बजाय सीधे ‘अभियुक्तों’ (Accused) के विरुद्ध ले लिया और आदेश पर तारीख तक अंकित नहीं की। उच्च न्यायालय ने रजिस्ट्री और तेलंगाना राज्य न्यायिक अकादमी (Telangana State Judicial Academy) को न्यायिक अधिकारियों के लिए विशेष संवेदीकरण प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के संस्थागत निर्देश जारी किए।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘जनवरी 2026 से 500 से अधिक संज्ञान आदेश रद्द; न्यायिक समय की भारी बर्बादी’:

न्यायमूर्ति जे. श्रीनिवास राव ने अधीनस्थ मजिस्ट्रेटों की यांत्रिक कार्यप्रणाली पर कड़ा क्षोभ व्यक्त करते हुए दर्ज किया: “जनवरी 2026 से, इस न्यायालय ने 500 से अधिक संज्ञान आदेशों (More than 500 cognizance orders) को रद्द किया है। उन मामलों में, अभियुक्तों ने आपराधिक याचिकाएं दायर कर इस आधार पर कार्यवाहियों की वैधानिकता को चुनौती दी कि विद्वान मजिस्ट्रेटों ने कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना संज्ञान लिया था। जब भी ऐसे संज्ञान आदेशों को रद्द कर मामलों को विचारण अदालतों को वापस भेजा (Remitted) जाता है, तो पूरी कार्यवाही प्रारंभिक चरण से पुनः शुरू करनी पड़ती है, जिसमें अभियुक्तों को नए सिरे से समन जारी करना भी शामिल है। इसके परिणामस्वरूप, उन प्रक्रियात्मक त्रुटियों को सुधारने में अत्यधिक न्यायिक समय नष्ट (Considerable judicial time is consumed) होता है जिन्हें प्रारंभिक स्तर पर ही टाला जा सकता था।”

2. ‘संज्ञान “अपराध” का लिया जाता है, न कि “अपराधी” का’:

  • सर्वोच्च न्यायालय के सुनील भारती मित्तल और GHCL निर्णयों का हवाला देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया:“सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित कानून शीशे की तरह साफ है कि ‘संज्ञान अपराध का लिया जाता है, न कि अपराधी का’ (Cognizance is taken of the offence and not of the offender)।प्रस्तुत मामले में, मजिस्ट्रेट के डॉकेट आदेश से स्पष्ट है कि संज्ञान BNS की धारा 122(2) के अपराध का लेने के बजाय प्रतिवादी संख्या 2 से 8 (अभियुक्त संख्या 1 से 7) के विरुद्ध व्यक्तिगत रूप से ले लिया गया, और यहाँ तक कि समन जारी करते समय संज्ञान लेने की तारीख तक का उल्लेख नहीं किया गया।”

3. समन जारी करना गंभीर न्यायिक दायित्व; संक्षिप्त और गुप्त आदेश अस्वीकार्य:

  • शीर्ष अदालत के वीडियोकॉन इंटरनेशनल (2008) फैसले का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा:“संज्ञान लेना (Taking Cognizance) और आदेशिका जारी करना (Issuance of Process) दो अलग-अलग विधिक चरण हैं। किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी करने का कार्य एक अत्यंत गंभीर विषय है। ऐसे आदेश किसी गूढ़, संक्षिप्त या रबर-स्टैंप (Cryptic/Rubber stamp) आदेशों के आधार पर पारित नहीं किए जा सकते; आदेश में पीठासीन अधिकारी द्वारा स्वतंत्र प्रथम दृष्टया संतुष्टि और विवेक के प्रयोग (Due application of mind) का स्पष्ट प्रतिबिंब होना अनिवार्य है।”

4. तेलंगाना राज्य न्यायिक अकादमी को अनिवार्य प्रशिक्षण के निर्देश:

  • पीठ ने आदेश की प्रति रजिस्ट्रार (न्यायिक) और तेलंगाना राज्य न्यायिक अकादमी, सिकंदराबाद के निदेशक को भेजने का आदेश दिया:“न्यायिक अकादमी के निदेशक को निर्देश दिया जाता है कि वे संबंधित न्यायिक अधिकारियों के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करें—विशेष रूप से संज्ञान लेने को नियंत्रित करने वाले कानूनी प्रावधानों, सिद्धांतों और आपराधिक मामले में आगे बढ़ने से पहले स्वतंत्र प्रथम दृष्टया संतुष्टि (Independent prima facie satisfaction) दर्ज करने की अनिवार्यता पर।इन निर्देशों का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत मामलों के प्रक्रियात्मक दोषों को सुधारना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ऐसी त्रुटियां दोबारा न हों, जिससे अनावश्यक मुकदमेबाजी रुके, उच्च न्यायालय का बोझ घटे, अभियुक्तों व पीड़ितों के हितों की रक्षा हो और मूल्यवान न्यायिक समय व सार्वजनिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग हो सके।”

तेलंगाना उच्च न्यायालय, हैदराबाद, AI generated

तेलंगाना उच्च न्यायालय, हैदराबाद.

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयतेलंगाना उच्च न्यायालय, हैदराबाद (आपराधिक क्षेत्राधिकार — धारा 528 BNSS / 482 CrPC)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति जे. श्रीनिवास राव (Justice J. Sreenivas Rao) (एकल पीठ)
आदेश की तिथिनवंबर 2026
केस संदर्भडी फैक्टो शिकायतकर्ता बनाम तेलंगाना राज्य व अन्य [Criminal Petition / 2026]
याचिकाकर्ता पक्षमूल शिकायतकर्ता (De facto Complainant)।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ताअधिवक्ता वी.एस.आर.एम.वी. प्रसाद सनका (Advocate VSRMV Prasad Sanaka)।
प्रतिवादी पक्ष1. तेलंगाना राज्य (गृह विभाग व पुलिस)
2. प्रतिवादी संख्या 2 से 8 (अभियुक्त संख्या 1 से 7)।
अभियोजन पक्ष (राज्य)अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) जितेंद्र राव वीरमल्ला (Advocate Jithendar Rao Veeramalla)।
संबंधित पुलिस स्टेशनगाचीबोवली पुलिस स्टेशन (Gachibowli Police Station), साइबराबाद कमिश्नरेट।
मूल प्राथमिकी (अगस्त 2025)शिकायतकर्ता की सूचना पर अगस्त 2025 में 7 आरोपियों के विरुद्ध BNS की धारा 109 (हत्या का प्रयास / पूर्ववर्ती IPC 307) पठित धारा 3(5) (साझा आशय) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जांच के उपरांत पुलिस ने धाराओं को बदलकर BNS की धारा 122(2) (उकसावे पर गंभीर चोट पहुंचाना / पूर्ववर्ती IPC 335) कर दिया।
अंतिम रिपोर्ट (जुलाई 2026)जांच अधिकारी (IO) ने गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद जुलाई 2026 में रंगा रेड्डी जिले की संबंधित विचारण अदालत (JFMC) में अंतिम आरोप पत्र प्रस्तुत किया।
मजिस्ट्रेट का त्रुटिपूर्ण संज्ञान आदेशमजिस्ट्रेट ने बिना यह दर्ज किए कि संज्ञान किस तारीख को लिया गया, रबर स्टैंप और प्रिंटेड प्रोफार्मा का उपयोग करते हुए सीधे अभियुक्तों के विरुद्ध संज्ञान ले लिया और समन जारी कर दिए। आदेश में किसी स्वतंत्र न्यायिक विवेक या अपराध के घटकों का कोई विश्लेषण नहीं था।
वादी की विधिक आशंकाशिकायतकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि इस त्रुटिपूर्ण संज्ञान आदेश के आधार पर पूरा मुकदमा चल भी गया और आरोपी दोषी ठहराए गए, तो वे बाद में उच्च अदालत में इस प्रक्रियात्मक अवैधता के आधार पर पूरी सुनवाई को शून्य घोषित करवा लेंगे, जिससे पीड़ित को अंतहीन कानूनी मुकदमों का सामना करना पड़ेगा। राज्य के एपीपी ने भी स्वीकार किया कि मजिस्ट्रेट को संज्ञान अपराध का लेना चाहिए था, न कि अभियुक्तों का।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णयआपराधिक याचिका स्वीकृत/निस्तारित; आक्षेपित संज्ञान आदेश रद्द (Set Aside); मजिस्ट्रेट को विधि सम्मत रूप से नए सिरे से संज्ञान लेने का निर्देश; तेलंगाना स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी को सभी न्यायिक अधिकारियों हेतु विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल चलाने का संस्थागत आदेश।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘BNSS धारा 210/227, संज्ञान का दायरा और यांत्रिक आदेशों का निषेध’

  • ‘संज्ञान’ (Cognizance) की विधिक अवधारणा और सर्वोच्च न्यायालय के मानक:
    • संहिता में ‘संज्ञान’ शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है, किंतु न्यायिक निर्णयों के अनुसार इसका अर्थ है: “न्यायिक मस्तिष्क का किसी कथित अपराध के तथ्यों के प्रति यह तय करने हेतु प्रवृत्त होना कि क्या आगे की विधिक कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं या नहीं”।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई [(2015) 4 SCC 609] और आर.आर. चारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [AIR 1951 SC 207] में सुस्थापित किया है कि मजिस्ट्रेट कभी भी किसी व्यक्ति विशेष या अभियुक्त का संज्ञान नहीं लेता, बल्कि वह उस अपराध का संज्ञान लेता है जो पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया घटित प्रतीत होता है। कौन-कौन व्यक्ति उस अपराध में शामिल हैं, यह संज्ञान के बाद समन (Process) जारी करने का विषय है।
  • रबर स्टैंप और मुद्रित प्रोफार्मा पर रोक:
    • कई अधीनस्थ अदालतों में मुकदमों के भारी बोझ के कारण मजिस्ट्रेट्स ने एक खतरनाक शॉर्टकट विकसित कर लिया है—आदेश पत्र (Order Sheet) पर पहले से छपे हुए रबर स्टैंप लगा दिए जाते हैं: “Cognizance taken against accused, issue summons”।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने पेप्सी फूड्स लिमिटेड बनाम स्पेशल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट [(1998) 5 SCC 749] में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि किसी भी नागरिक को आपराधिक मुकदमे के कटघरे में खड़ा करना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक प्रतिष्ठा पर गहरा आघात है। मजिस्ट्रेट को यह लिखना चाहिए कि उसने पुलिस रिपोर्ट और गवाहों के बयानों को देखा है और वह संतुष्ट है कि अमुक धारा के तहत अपराध बनता है। रबर स्टैंप लगाना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि न्यायाधीश ने अपना दिमाग लगाया ही नहीं।
  • संस्थागत विफलता और मुकदमों का चक्रव्यूह:
    • जब मजिस्ट्रेट ऐसा त्रुटिपूर्ण आदेश पारित करता है, तो आरोपी हाईकोर्ट जाकर उसे रद्द करवा लेता है। हाईकोर्ट केस वापस भेजता है, फिर नए सिरे से समन जारी होते हैं।
    • इस प्रक्रियागत लापरवाही के कारण एक ही मुकदमे में 2 से 3 साल का समय केवल संज्ञान के स्तर पर ही नष्ट हो जाता है। तेलंगाना हाईकोर्ट का 500 से अधिक आदेशों का आंकड़ा यह सिद्ध करता है कि यह कोई छिटपुट गलती नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित संस्थागत विफलता (Systemic Institutional Failure) बन चुकी थी, जिसे ठीक करने के लिए न्यायिक अकादमी द्वारा प्रशिक्षण देना अपरिहार्य हो गया था।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: तेलंगाना उच्च न्यायालय, हैदराबाद (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: डी फैक्टो शिकायतकर्ता बनाम तेलंगाना राज्य व अन्य [Criminal Petition No. … / 2026]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति जे. श्रीनिवास राव (Justice J. Sreenivas Rao) (एकल पीठ)
  • आदेश की तिथि: नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: आपराधिक याचिका निस्तारित; रंगा रेड्डी जिले की जेएफएमसी अदालत का संज्ञान आदेश रद्द; मजिस्ट्रेट को नए सिरे से विधि सम्मत संज्ञान लेने का निर्देश; न्यायिक अकादमी, सिकंदराबाद को राज्य के सभी मजिस्ट्रेटों हेतु संज्ञान और विवेक के प्रयोग पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने का आदेश।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (मूल शिकायतकर्ता) की ओर से:
    • अधिवक्ता: वी.एस.आर.एम.वी. प्रसाद सनका (Advocate VSRMV Prasad Sanaka)।
  • प्रतिवादी तेलंगाना राज्य की ओर से:
    • अतिरिक्त लोक अभियोजक (Additional Public Prosecutor – APP) जितेंद्र राव वीरमल्ला (Advocate Jithendar Rao Veeramalla)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
      • धारा 210 — मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान (पूर्ववर्ती CrPC धारा 190)
      • धारा 227 — आदेशिका/समन जारी किया जाना (पूर्ववर्ती CrPC धारा 204)
      • धारा 528 — उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां (पूर्ववर्ती CrPC धारा 482)
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
      • धारा 122(2) — प्रकोपन पर स्वेच्छा से गंभीर उपहति कारित करना (पूर्ववर्ती IPC धारा 335)
      • धारा 109 — हत्या का प्रयास (पूर्ववर्ती IPC धारा 307)
    • सर्वोच्च न्यायालय नज़ीरें:
      • सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई [(2015) 4 SCC 609]
      • GHCL एम्प्लॉइज स्टॉक ऑप्शन ट्रस्ट बनाम इंडिया इंफोलाइन लिमिटेड [(2013) 4 SCC 505]
      • चीफ एनफोर्समेंट ऑफिसर बनाम वीडियोकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड [(2008) 3 SCC 492]
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • आपराधिक संज्ञान, रबर स्टैंप आदेशों की शून्यता और न्यायिक प्रशिक्षण का विधिक मानक: ‘आपराधिक न्यायशास्त्र में यह सुस्थापित विधिक सिद्धांत है कि संज्ञान अपराध का लिया जाता है, न कि अपराधी का (Cognizance is taken of the offence and not of the offender); अधीनस्थ मजिस्ट्रेटों द्वारा रबर स्टैंप, मुद्रित प्रोफार्मा या यांत्रिक भाषा का प्रयोग करते हुए संज्ञान आदेश पारित करना स्वतंत्र न्यायिक विवेक के प्रयोग (Application of Mind) के पूर्ण अभाव को दर्शाता है और ऐसा आदेश विधि की दृष्टि में टिकने योग्य नहीं होता; किसी अभियुक्त को आपराधिक विचारण का सामना करने हेतु समन जारी करना एक गंभीर न्यायिक दायित्व है जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर अपनी स्वतंत्र प्रथम दृष्टया संतुष्टि (Independent Prima Facie Satisfaction) दर्ज करना अनिवार्य है; ऐसी प्रक्रियात्मक त्रुटियों के कारण उच्च न्यायालयों द्वारा आदेश रद्द किए जाने से पूरी प्रक्रिया पुनः शुरू करनी पड़ती है जिससे भारी न्यायिक समय नष्ट होता है और पीड़ितों व अभियुक्तों दोनों को अपूरणीय क्षति होती है; तथा इन व्यवस्थित संस्थागत त्रुटियों को रोकने हेतु राज्य न्यायिक अकादमी द्वारा न्यायिक अधिकारियों को संज्ञान और आदेशिका जारी करने के विधिक सिद्धांतों पर निरंतर और अनिवार्य प्रशिक्षण प्रदान किया जाना न्याय प्रशासन के हित में अपरिहार्य है।’
  • वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: तेलंगाना उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद रंगा रेड्डी जिले के संबंधित मजिस्ट्रेट को पुलिस की अंतिम रिपोर्ट और गवाहों के बयानों का नए सिरे से स्वयं अध्ययन करना होगा और यह दर्ज करते हुए नया सकारण आदेश पारित करना होगा कि धारा 122(2) BNS के तहत अपराध का संज्ञान लिया जाता है; इसके साथ ही, तेलंगाना राज्य न्यायिक अकादमी, सिकंदराबाद द्वारा राज्य के सभी नवनियुक्त और सेवारत मजिस्ट्रेटों के लिए विशेष संज्ञान कार्यशालाओं (Workshops on Cognizance & Issuance of Process) की रूपरेखा तैयार की जा रही है ताकि भविष्य में ऐसी यांत्रिक गलतियों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

Rubber Stamp Order: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालततेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति जे. श्रीनिवास राव (Justice J. Sreenivas Rao)
केस / पक्षकारपीड़ित/मूल शिकायतकर्ता बनाम तेलंगाना राज्य व अन्य
संबंधित पुलिस थानागचीबोवली पुलिस स्टेशन, साइबरबाद
संबंधित कानून/प्रावधानभारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 109 (हत्या का प्रयास) को बदलकर धारा 122(2) (उकसावे पर गंभीर चोट पहुंचाना)
प्रतिनिधित्वयाचिकाकर्ता पक्ष: अधिवक्ता वी.एस.आर.एम.वी. प्रसाद सनका | राज्य पक्ष: अतिरिक्त लोक अभियोजक जीतेंदर राव वीरामल्ला
अदालत का अंतिम आदेशसंज्ञान आदेश रद्द व संस्थागत निर्देश: त्रुटिपूर्ण संज्ञान आदेश निरस्त; मजिस्ट्रेट को नए सिरे से संज्ञान लेने का निर्देश; तेलंगाना राज्य न्यायिक अकादमी को मजिस्ट्रेटों के लिए विशेष प्रशिक्षण आयोजित करने का आदेश।
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