Saturday, September 19, 2026
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SC news: सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे को फटकारा: कहा- हम फूलों जैसे नाजुक नहीं

SC news: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम यह मानते हैं कि अदालतें फूलों जैसी नाजुक नहीं हैं, जो ऐसे बेतुके बयानों से मुरझा जाएं।

दुबे के बयान न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंची: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना पर गंभीर आरोप लगाए थे। कोर्ट ने कहा कि दुबे के बयान न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं और सुप्रीम कोर्ट की साख को कम करने की कोशिश करते हैं। हालांकि कोर्ट ने उनके खिलाफ अवमानना की याचिका खारिज कर दी, लेकिन अपने आदेश में तीखी टिप्पणी की। CJI संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने 5 मई को इस मामले की सुनवाई की थी।

यह कहा था निशिकांत दुबे ने

दुबे ने वक्फ एक्ट के खिलाफ दायर याचिकाओं की सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट देश को अराजकता की ओर ले जा रहा है और देश में जो गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन रही है, उसके लिए CJI जिम्मेदार हैं।

कोर्ट ने क्या कहा

बेंच ने कहा कि दुबे के बयान न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिश भी करते हैं। यह बयान न्यायपालिका और उसके न्यायाधीशों पर संदेह पैदा करने की कोशिश है।

बयान से झलकती है संवैधानिक जिम्मेदारियों की अनदेखी

कोर्ट ने कहा कि सांसद के बयान से यह साफ होता है कि उन्हें संवैधानिक अदालतों की भूमिका और उनके कर्तव्यों की समझ नहीं है। यह बयान न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट की छवि खराब करने की कोशिश है।

नफरत फैलाने की कोशिशों पर सख्त रुख

CJI ने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई व्यक्ति सांप्रदायिक नफरत फैलाने या हेट स्पीच में शामिल होता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में ‘आयरन हैंड’ यानी सख्ती से निपटना जरूरी है।

यह निकला कोर्ट में निष्कर्ष

हालांकि कोर्ट ने दुबे के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई नहीं की, लेकिन अपने आदेश में साफ कर दिया कि इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयानों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे बयान जनता के बीच न्यायपालिका की साख को कमजोर करने की कोशिश हैं, लेकिन इससे अदालतों की विश्वसनीयता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

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