केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | इलाहाबाद उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल |
| संबंधित कानून | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 180 |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | 1. बयान गवाह की अपनी भाषा/संस्करण में दर्ज हो। 2. आरोपी के खिलाफ उकसाने वाले सूचक प्रश्न न पूछे जाएं। |
| डीजीपी यूपी को निर्देश | राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों/जांच अधिकारियों को इस संबंध में सर्कुलर जारी करें। |
| तकनीकी निर्देश | MedLEapr प्लेटफॉर्म को CCTNS और CIS के साथ एकीकृत करने पर विचार। |
Dowry Death: नए भारतीय आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत पुलिस जांच प्रक्रिया और गवाहों के बयान दर्ज करने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक दिशा-निर्देश जारी किया है।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने दहेज हत्या (Dowry Death) से जुड़े एक मामले में अभियुक्त की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस महानिदेशक (DGP), उत्तर प्रदेश को पूरे राज्य के पुलिस अधिकारियों के लिए तत्काल कड़े निर्देश जारी करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि धारा 180 BNSS (जो पूर्ववर्ती CrPC की धारा 161 के समतुल्य है) के तहत बयान दर्ज करते समय जांच अधिकारी (IO) गवाहों को आरोपी के खिलाफ उकसाने वाले या दोषारोपण करने वाले सूचक प्रश्न (Inculpatory Leading Questions) नहीं पूछ सकते। पुलिस को गवाह का बयान उसकी अपनी भाषा और विवरण के अनुसार ही रिकॉर्ड करना होगा।
विधिक पृष्ठभूमि: ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग में पुलिस की मनमानी
- यह मामला दहेज हत्या के एक आरोपी की जमानत याचिका से जुड़ा है, जिसमें कोर्ट ने धारा 180 BNSS के तहत प्रथम सूचनाकर्ता (शिकायतकर्ता) और उसकी पत्नी के ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग साक्ष्यों का अवलोकन किया।
- जांच अधिकारी की अनुचित कार्यप्रणाली: कोर्ट ने पाया कि ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग के दौरान जांच अधिकारी ने गवाहों से घटना का स्वतंत्र विवरण दर्ज करने के बजाय उन्हें ऐसे सूचक प्रश्न (Leading Questions) पूछे जो आरोपी को जबरन दोषी ठहराने की ओर संकेत करते थे।
- तथ्यों की विसंगति: मामले में मृतका की मौत जहरीला पदार्थ खाने से हुई थी और विसरा रिपोर्ट मिलने के लगभग 3 महीने बाद एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसकी देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं था।
- कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) का अभाव: शिकायतकर्ता का दावा था कि घटना से एक दिन पहले मृतका ने अपनी ननद को फोन करके दहेज उत्पीड़न की बात कही थी। हालांकि, कोर्ट के कड़े रुख के बाद जब जांच अधिकारी ने CDR निकाला, तो उसमें ऐसा कोई कॉल रिकॉर्ड नहीं मिला।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “आपराधिक न्याय का मकसद निर्दोष को बचाना भी है”
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने पुलिस जांच के इस तरीके को “पूर्णतः अनुचित” (Absolutely Incorrect) करार देते हुए कहा, आपराधिक न्याय प्रशासन का उद्देश्य केवल दोषी को सजा देना ही नहीं, बल्कि निर्दोष व्यक्ति को बचाना भी है। इसलिए, पुलिस को गवाहों को अभियुक्त के खिलाफ सामग्री सुझाने (Suggest) का प्रयास नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, धारा 180 BNSS के तहत बयान गवाह द्वारा बताई गई भाषा और संस्करण में ही लिखा जाना चाहिए, सिवाय कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगने के।
तकनीकी एकीकरण और जमानत आदेश
- अभियुक्त को जमानत स्वीकृत: कोर्ट ने साक्ष्यों में विरोधाभास, एफआईआर में देरी और CDR साक्ष्य न मिलने के आधार पर मामले के गुणों पर कोई अंतिम राय व्यक्त किए बिना आवेदक को जमानत (Bail) प्रदान कर दी।
- MedLEapr और CCTNS का एकीकरण: कोर्ट ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्रदान करने वाला डिजिटल प्लेटफॉर्म MedLEapr अभी तक पुलिस के CCTNS (अपराध और अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क एवं सिस्टम) से पूरी तरह एकीकृत नहीं है।
- अगली तारीख पर विशेषज्ञ पेशी: इस तकनीकी खामी को दूर करने के लिए कोर्ट ने मामले को लंबित रखते हुए NIC (नई दिल्ली) के उप महानिदेशक और यूपी पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (तकनीकी) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अगली सुनवाई पर पेश होने का अनुरोध किया है।

