केस का संक्षिप्त ब्योरा (Case Snapshot)
| पहलू | विधिक विवरण |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एम. धंदापानी (Justice M Dhandapani) |
| साइटेशन (Citation) | मद्रास हाईकोर्ट बनाम तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग एवं अकबर अहमद |
| याचिकाकर्ता | रजिस्ट्रार जनरल, मद्रास उच्च न्यायालय |
| प्रतिवादी | तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग एवं अकबर अहमद |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या जजों का वेतन विवरण और प्रशासनिक समितियों की जानकारी RTI एक्ट की धारा 8 के तहत छूट प्राप्त है? |
| अदालत का निर्णय | याचिका खारिज; 2 सप्ताह के भीतर वेतन और समिति विवरण की RTI जानकारी देने का निर्देश। |
Judges’ Salary Under RTI: मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) ने सूचना के अधिकार (RTI) और न्यायपालिका में पारदर्शिता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
जस्टिस एम. धंदापानी (Justice M Dhandapani) की पीठ ने माना कि चूंकि जजों को वेतन भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) यानी जनता के पैसे से दिया जाता है, इसलिए देश के किसी भी नागरिक को यह जानकारी प्राप्त करने से रोका नहीं जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया है कि न्यायाधीशों (Judges) के वेतनमान (Pay Scale) और वेतन विवरण (Salary Details) से जुड़ी जानकारी RTI अधिनियम की धारा 8 के तहत छूट प्राप्त श्रेणी (Exempted Category) में नहीं आती है।
मद्रास हाई कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
RTI एक्ट और जजों के वेतन का विवरण
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वेतन सार्वजनिक कोष (Public Fund) से दिया जाता है प्रशासनिक समितियों की जानकारी गोपनीय नहीं
• भारत की संचित निधि से वेतन मिलने के कारण नागरिक • इन-पर्सन समिति (Party-in-person Committee) के
को विवरण जानने का पूरा अधिकार है। सदस्यों की योग्यता और अधिकार बताना गोपनीय नहीं।
जजों के वेतन पर RTI अधिनियम की धारा 8 की रोक नहीं
अदालत ने हाई कोर्ट रजिस्ट्री की याचिका को खारिज करते हुए अपने फैसले में कहा, वेतनमान/वेतन विवरण सार्वजनिक रिकॉर्ड (Public Record) का मामला है। चूंकि जजों को भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से वेतन मिलता है और यह भुगतान सार्वजनिक धन से होता है, इसलिए भारत के किसी भी नागरिक को इसका विवरण जानने से वंचित नहीं किया जा सकता। RTI अधिनियम की धारा 8 के तहत इस जानकारी को देने पर कोई कानूनी प्रतिबंध (Embargo) नहीं है।
प्रशासनिक समितियों (Committees) का गठन संवेदनशील नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट की प्रशासनिक समितियों या ‘पार्टी-इन-पर्सन’ (Party-in-person) समिति की संरचना, उनके सदस्यों की योग्यता, अनुभव और शक्तियों की जानकारी साझा करने में कोई गोपनीयता या संवेदनशीलता शामिल नहीं है। यह एक प्रशासनिक कार्य है और इसे उजागर करने से हाई कोर्ट का प्रशासनिक कामकाज किसी भी तरह प्रभावित नहीं होगा।
याचिका का संक्षिप्त इतिहास और पृष्ठभूमि
[RTI आवेदन (अकबर अहमद)] ──► [PIO व प्रथम अपीलीय प्राधिकारी द्वारा रद्द] ──► [राज्य सूचना आयोग का आदेश (जानकारी दें)] ──► [हाई कोर्ट रजिस्ट्री की चुनौती] ──► [हाई कोर्ट का अंतिम फैसला (2 सप्ताह में दें जानकारी)]
- RTI आवेदन: आवेदक अकबर अहमद (Akbar Ahamed) ने RTI दायर कर ‘मद्रास उच्च न्यायालय (स्वयं पैरवी/पार्टी-इन-पर्सन कार्यवाही) नियम 2019’ के तहत गठित समिति के सदस्यों के नाम, योग्यता, अनुभव, वेतनमान/वेतन विवरण और प्रशासनिक समिति की शक्तियों व जिम्मेदारियों की जानकारी मांगी थी।
- रजिस्ट्री का इनकार: जन सूचना अधिकारी (PIO) और प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने इसे आंतरिक प्रशासन और धारा 8 के तहत गोपनीय बताते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया था।
- राज्य सूचना आयोग (State Information Commission) का आदेश: आवेदक की दूसरी अपील पर तमिलनाडु सूचना आयोग ने हाई कोर्ट रजिस्ट्री को सभी मांगी गई जानकारियां देने का निर्देश दिया।
- हाई कोर्ट रजिस्ट्री की याचिका: रजिस्ट्री ने राज्य सूचना आयोग के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसे जस्टिस एम. धंदापानी ने खारिज करते हुए आयोग के आदेश को बरकरार रखा और 2 सप्ताह के भीतर आवेदक को सूचना प्रदान करने का निर्देश दिया।
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला न्यायपालिका के भीतर पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह साफ करता है कि सार्वजनिक कोष से दिए जाने वाले वेतन या प्रशासनिक समितियों की संरचना से जुड़ी सामान्य जानकारी को ‘गोपनीय’ बताकर RTI के तहत छिपाया नहीं जा सकता।

