Thursday, July 2, 2026
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JUSTICE KAUL: समानता की राह में न्यायपालिका को उत्प्रेरक बनना होगा: जस्टिस संजय किशन कौल

JUSTICE KAUL: पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस (रिटायर्ड) संजय किशन कौल ने कहा कि LGBTQIA+ समुदाय के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका को उत्प्रेरक की भूमिका निभानी चाहिए।

राधिका यादव हत्याकांड का जिक्र किया

जस्टिस कौल ने कहा, भारत में LGBTQIA+ समुदाय की पहचान को लेकर कानूनों में कुछ प्रगति जरूर हुई है, लेकिन अब भी कई अहम खामियां हैं। ‘क्वीयर’ शब्द की अब तक भारतीय कानून में कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है और ‘एसेक्शुअल’ व्यक्तियों को नीति निर्माण में पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। राधिका यादव हत्याकांड का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि समाज में आज भी महिला की अपनी पसंद से रिश्ते चुनने की आजादी को स्वीकार नहीं किया जाता। अंतरजातीय विवाहों को लेकर अब भी समाज में हिंसा होती है। हाल ही में एक पिता ने अपनी बेटी की हत्या कर दी। जब हम बदलाव की बात करते हैं, तो हमें समाज के इस रवैये को भी बदलना होगा।

सरकार के कदम सराहनीय, लेकिन अधूरे

उन्होंने बताया कि इस साल फरवरी में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने LGBTQIA+ जोड़ों के लिए कुछ प्रशासनिक सुविधाएं शुरू की थीं, जैसे राशन कार्ड, जॉइंट बैंक अकाउंट और साथी की मृत्यु पर शव का दावा करने का अधिकार (यदि कोई निकट संबंधी न हो)। लेकिन ये अधिकार केवल प्रशासनिक आदेशों तक सीमित हैं, इन्हें कानून में जगह नहीं मिली है। जस्टिस कौल ने कहा कि आज के समय में भेदभाव विरोधी कानून की जरूरत और भी ज्यादा है। बिजनेस शुरू करना, घर खरीदना या बैंक अकाउंट खोलना जैसी सामान्य चीजें भी LGBTQIA+ समुदाय के लिए मुश्किल हैं, क्योंकि दस्तावेजों में जेंडर पहचान से मेल खाना जरूरी होता है।

कानूनी अधिकारों में देरी से नुकसान

उन्होंने कहा कि LGBTQIA+ समुदाय को विवाह, गोद लेने और संपत्ति में अधिकार जैसे मुद्दों पर अब भी कानूनी स्पष्टता नहीं मिली है। कानून बनाने में सुस्ती और समाज में अब भी मौजूद रूढ़िवादी सोच इस समुदाय की स्वीकार्यता में बाधा बन रही है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि देश प्रगतिशील दिशा में बढ़ रहा है। शहरी इलाकों और युवा पीढ़ी में स्वीकार्यता बढ़ रही है, जबकि ग्रामीण और पारंपरिक समाज अब भी विरोधी है। लेकिन मुझे भरोसा है कि भविष्य अतीत से बेहतर होगा। जैसा कि हार्वे मिल्क ने कहा था – ‘उम्मीद कभी खामोश नहीं रहेगी।

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