Wednesday, August 5, 2026
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Gift Deed: पति की मौत के बाद 2BHK फ्लैट पर पत्नी का हक…क्या बेटे को ‘गिफ्ट डीड’ करने के लिए बेटी से NOC लेना जरूरी है? जानें कानूनी बारीकियां

Gift Deed: क्या किसी संयुक्त संपत्ति (Joint Property) में पति की मृत्यु के बाद पत्नी अपने बेटे को गिफ्ट डीड (Gift Deed) या बिक्री (Sale Deed) के जरिए मकान ट्रांसफर कर सकती है?

क्या इसके लिए विदेश में रह रही या अलग रह रही बेटी से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेना अनिवार्य है? जानिए कानूनी स्थिति, सोसाइटी नॉमिनेशन की सीमाएं और प्रोबेट (Probate) से जुड़े नए नियम पर विधि विशेषज्ञ व तिलकामाझी भागलपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के HOD प्रो डॉ राजेश कुमार तिवारी की राय।

क्या है मामला? आम नागरिकों के मन में उठते बड़े सवाल

अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता के नाम पर मौजूद प्रॉपर्टी या 2BHK/3BHK फ्लैट्स में एक पार्टनर की मृत्यु के बाद संपत्ति का मालिकाना हक (Ownership) हस्तांतरित करने को लेकर परिवार में भ्रम और विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है।

हाल ही में एक प्रॉपर्टी मालिक ने कानूनी विशेषज्ञों के सामने अपनी चिंता रखी।

“मैं और मेरी पत्नी एक 2BHK फ्लैट के संयुक्त मालिक (Joint Owners) हैं। हमारे दो बच्चे हैं जो विदेश में बसे हुए हैं। मेरी मृत्यु के बाद, हाउसिंग सोसाइटी नॉमिनेशन और मेरी अनरजिस्टर्ड वसीयत (Unregistered Will) के आधार पर फ्लैट मेरी पत्नी के नाम ट्रांसफर कर देगी। क्या ट्रांसफर के बाद मेरी पत्नी बच्चों की NOC के बिना फ्लैट बेच सकती है? या फिर क्या वह बेटी की NOC के बिना बेटे को गिफ्ट डीड (Gift Deed) के जरिए फ्लैट ट्रांसफर कर सकती है?”

हाउसिंग सोसाइटी में ‘नॉमिनी’ बनने का मतलब मालिकाना हक नहीं

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, आम लोगों में सबसे बड़ी गलतफहमी यह होती है कि यदि हाउसिंग सोसाइटी ने शेयर सर्टिफिकेट पर नॉमिनी (Nominee) का नाम दर्ज कर लिया, तो वह व्यक्ति संपत्ति का पूर्ण और एकमात्र मालिक बन गया।

कानूनी हकीकत

  • सोसाइटी का सीमित अधिकार: हाउसिंग सोसाइटी का प्रबंध तंत्र (Managing Committee) केवल एक प्रशासनिक निकाय है। उसके पास वसीयत की वैधता जांचने या उत्तराधिकार तय करने की न्यायिक (Judicial) शक्ति नहीं होती।
  • नॉमिनी केवल ट्रस्टी/संरक्षक है: कानून की नज़र में नॉमिनी केवल एक ‘संरक्षक’ (Trustee/Custodian) होता है, जो मूल मालिक के सभी कानूनी वारिसों (Legal Heirs) का प्रतिनिधित्व करता है।
  • स्वामित्व अनुपात (Ownership Ratio): यदि फ्लैट पति और पत्नी के संयुक्त नाम पर है और सेल डीड में हिस्सेदारी तय नहीं है, तो दोनों का हिस्सा 50-50% माना जाता है। पति की मृत्यु पर सोसाइटी शेयर सर्टिफिकेट से मृतक का नाम हटाकर पत्नी का नाम नॉमिनी के रूप में दर्ज कर सकती है, लेकिन इससे पत्नी स्वतः ही पूरी संपत्ति की एकमात्र विधिक मालिक (Sole Legal Owner) नहीं बन जाती।

क्या बेटी की NOC के बिना बेटे को हो सकती है गिफ्ट डीड?

इस सवाल का जवाब दो मुख्य चरणों पर निर्भर करता है।

चरण 1: पत्नी का ‘सोल ओनर’ (Sole Owner) बनना

यदि पति ने एक अलोपकृत या अनरजिस्टर्ड वसीयत (Unregistered Will) छोड़ी है, तो पत्नी को कानूनन एकल मालिक बनने के लिए अदालत से प्रोबेट (Probate) या ‘लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ प्राप्त करना होता है।

  • सहमति शपथ पत्र (Consent Affidavit): प्रोबेट प्रक्रिया के दौरान अदालत मृतक के सभी प्रथम श्रेणी कानूनी वारिसों (जैसे विदेश में रह रहे बेटे और बेटी) को नोटिस जारी करती है।
  • NOC/सहमति की भूमिका: इस चरण में बेटी और बेटे को यह शपथ पत्र (Consent Affidavit) देना होगा कि उन्हें पिता की वसीयत पर कोई आपत्ति नहीं है और वे प्रोबेट प्रक्रिया से सहमत हैं।

चरण 2: सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में ‘ट्रांसफर डीड’ का रजिस्ट्रेशन

एक बार जब अदालत से प्रोबेट ऑर्डर जारी हो जाता है, तो पत्नी सब-रजिस्ट्रार कार्यालय (Sub-Registrar Office) में जाकर अपने नाम पर रजिस्टर्ड ट्रांसफर डीड (Transfer Deed) निष्पादित कराएगी। इसके बाद वह संपत्ति की ‘सोल ओनर’ (Sole Legal Owner) बन जाती है।

मुख्य कानूनी निष्कर्ष: जब पत्नी कानूनन प्रोबेट और रजिस्टर्ड ट्रांसफर डीड के माध्यम से सोल ओनर (एकमात्र मालिक) बन जाती है, तो उसके पास संपत्ति को बेचने, दान करने (Gift Deed) या हस्तांतरित करने का पूर्ण स्वतंत्र अधिकार होता है। उस स्थिति में, बेटी या किसी भी अन्य बच्चे से अलग से NOC लेने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

4. प्रोबेट (Probate) के नियमों में बड़ा बदलाव: 2025 का नया कानून

भारत सरकार द्वारा पारित निरसन और संशोधन अधिनियम (Repealing and Amending Act, 2025) के तहत भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) की धारा 213 के तहत अनिवार्य प्रोबेट की शर्त में बड़ा सुधार किया गया है।

पहलूपुराना नियम (दिसंबर 2025 से पहले)नया नियम (2025-2026 से लागू)
प्रोबेट की अनिवार्यतामुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे प्रेसिडेंसी शहरों में वसीयत पर अनिवार्य था।धारा 213 के तहत अनिवार्य प्रोबेट की शर्त हटाई गई।
रजिस्ट्रार कार्यालय की भूमिकाबिना प्रोबेट सब-रजिस्ट्रार प्रॉपर्टी ट्रांसफर दर्ज नहीं करते थे।अधिकारी वसीयत की प्रामाणिकता से संतुष्ट होकर ट्रांसफर डीड दर्ज कर सकते हैं।
सुरक्षा एवं कानूनी विवादन्यायालयीन सत्यापन के कारण विवाद की गुंजाइश खत्म होती थी।ऐच्छिक प्रोबेट (Voluntary Probate) ही भविष्य के टाइटल विवादों से सुरक्षा देता है।

ऐच्छिक प्रोबेट (Voluntary Probate) क्यों है अभी भी जरूरी?

भले ही कानूनन अनिवार्य प्रोबेट की शर्त हटा दी गई है, फिर भी कानूनी विशेषज्ञ रजिस्टर्ड वसीयत और ऐच्छिक प्रोबेट प्राप्त करने की सलाह देते हैं। इसका कारण यह है कि सब-रजिस्ट्रार कार्यालय को वसीयत की असलियत से संतुष्ट होना पड़ता है। यदि कल को कोई वारिस वसीयत को फर्जी या दबाव में बनाई गई बताकर चुनौती देता है, तो बिना प्रोबेट वाली संपत्ति पर कानूनी संकट आ सकता है।

विशेषज्ञों की सलाह: भविष्य के विवादों से बचने के 4 अचूक उपाय

  1. वसीयत को पंजीकृत (Register) कराएं: अपने जीवनकाल में ही वसीयत को सब-रजिस्ट्रार के पास पंजीकृत करवाएं और उसमें दो स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर करवाएं।
  2. संयुक्त स्वामित्व में स्पष्टता रखें: सेल डीड में ही स्पष्ट करें कि दोनों मालिकों का हिस्सा क्या है और मृत्यु के बाद मालिकाना हक किसे मिलेगा।
  3. वारिसों का सहमति पत्र (Consent/NOC): यदि वसीयत अनरजिस्टर्ड है, तो जीवनकाल में ही बच्चों से सहमति पत्र बनवाकर रख लें या वसीयत में उनका उल्लेख स्पष्ट करें।
  4. गिफ्ट डीड का उचित पंजीकरण: माता द्वारा बेटे को संपत्ति देते समय विधिवत स्टाम्प ड्यूटी देकर ‘Gift Deed’ पंजीकृत कराई जानी चाहिए, ताकि बाद में कोई अन्य वारिस उस पर दावा न ठोक सके।

डिस्कलेमर: यह लेख केवल कानूनी जागरूकता और सूचनात्मक उद्देश्य के लिए तैयार किया गया है। किसी भी संपत्ति हस्तांतरण या कानूनी निर्णय से पूर्व अपने वकील या कानूनी विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।

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