MV ACT: सुप्रीम कोर्ट ने मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 163A को लेकर एक अहम कानूनी सवाल बड़ी बेंच को भेजा है।
मुआवजा देने का प्रावधान पर चर्चा
यह धारा सड़क हादसों में बिना किसी की गलती साबित किए मुआवजा देने का प्रावधान करती है। अब यह तय किया जाएगा कि इस धारा के तहत मुआवजा सिर्फ थर्ड पार्टी को मिलेगा या वाहन के ड्राइवर, मालिक या उनके कानूनी वारिस भी इसके हकदार हो सकते हैं। यह फैसला जस्टिस एस. धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने 13 फरवरी 2025 को सुनाया। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले के फैसलों में विरोधाभास है और अब इसकी स्पष्ट व्याख्या जरूरी है।
यह है धारा 163A का मकसद
धारा 163A का मकसद है कि सड़क हादसे के पीड़ितों को जल्दी राहत मिले, इसके लिए उन्हें यह साबित नहीं करना होता कि गलती किसकी थी। लेकिन लंबे समय से यह बहस चल रही है कि अगर हादसे में सिर्फ एक ही वाहन शामिल हो और ड्राइवर की मौत हो जाए, तो क्या उसके परिवार को भी मुआवजा मिलना चाहिए।
2004 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
2004 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर धारा 166 (जिसमें गलती साबित करनी होती है) के तहत दावा खारिज हो जाए, तो फिर धारा 163A के तहत मुआवजा नहीं मिल सकता। अब कोर्ट ने इस सोच पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने कहा कि यह सीमित व्याख्या कई मामलों में पीड़ितों और उनके परिवारों को मुआवजे से वंचित कर रही है, खासकर तब जब हादसे में किसी बाहरी की गलती नहीं होती।
खुद का वाहन चला रहे लोग भी होते हैं हादसे का शिकार
कई मामलों में जब खुद का वाहन चला रहे लोग हादसे का शिकार होते हैं, खासकर कम आय वाले या स्वरोजगार करने वाले लोग, तो उनके परिवारों को मुआवजा नहीं मिल पाता। आलोचकों का कहना है कि यह धारा 163A के कल्याणकारी उद्देश्य के खिलाफ है। अब यह मामला बड़ी बेंच के पास जाएगा, जिससे बीमा कंपनियों, नीति निर्माताओं और कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस पर बड़ी बहस शुरू हो सकती है। यह भारत में सड़क हादसों से जुड़े मुआवजा कानूनों में बदलाव की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।
बड़ी बेंच के फैसले से यह बदलाव संभव
- ड्राइवर और मालिक के परिवारों को भी मुआवजा मिलने का रास्ता खुलेगा
- बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी बढ़ेगी, जिससे पॉलिसी और क्लेम की प्रक्रिया में बदलाव आ सकता है
- हाई कोर्ट्स में इस मुद्दे पर चल रहे विरोधाभासी फैसलों को एकरूपता मिलेगी

