Bar Body: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, केवल किसी हलफनामे का सत्यापन (अटेस्टेशन) करने मात्र से कोई अधिवक्ता उस हलफनामे की सामग्री का पक्षकार नहीं हो जाता।
वकील के खिलाफ निरर्थक (फ्रिवोलस) शिकायत को स्वीकार कर लिया
अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल (BCMG) पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया, क्योंकि उसने एक वकील के खिलाफ निरर्थक (फ्रिवोलस) शिकायत को स्वीकार कर लिया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि बार काउंसिल द्वारा शिकायत दर्ज करने का निर्देश देना और उसे अनुशासन समिति के पास जांच के लिए भेजना अवैध था और “विकृत” (perversity) की श्रेणी में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला विपक्षी पक्षकार के इशारे पर अधिवक्ता के खिलाफ की गई दुर्भावनापूर्ण मुकदमेबाजी (malicious prosecution) का उदाहरण है।
चार सप्ताह के भीतर बॉम्बे हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा कराएं
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश उस अपील पर सुनाया, जिसे महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल ने दायर किया था। इसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें अधिवक्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही पर रोक लगाई गई थी। अदालत ने कहा कि रिट क्षेत्राधिकार में शिकायत रद्द करने का आदेश किसी भी प्रकार की कानूनी खामी से ग्रस्त नहीं है। पीठ ने कहा, “शिकायतकर्ता और उसके बाद BCMG ने प्रतिवादी अधिवक्ता को अपार मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न पहुँचाया है। शिकायतकर्ता-पिटीशनर बंसीधर अन्नाजी भकड़ और BCMG पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाता है। यह राशि चार सप्ताह के भीतर बॉम्बे हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा कराई जाएगी, जहाँ से यह प्रतिवादी अधिवक्ता को अदा की जाएगी।”
यह है पूरा मामला
यह मामला एक शिकायत से जुड़ा है, जो महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल के समक्ष दायर की गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि एक अधिवक्ता ने 1985 के एक दीवानी वाद में समझौते की शर्तों को लेकर कदाचार (misconduct) किया था, जिसमें वह अधिवक्ता वादी की ओर से पेश हुआ था। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया था कि शिकायत में नामित अधिवक्ता कथित धोखाधड़ी वाले लेन-देन के सीधे लाभार्थी होने के कारण दोषी हैं।

